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विकास ज़ोरों -शोरों पर 

शहर में भवनों-इमारतों का निर्माण
और शहर का विकास
ज़ोरों-शोरों पर है।

वहां काम करती औरत
और उसकी पीठ पर बंधा बच्चा
औरत का कराहना
बच्चे का रोना-चिल्लाना
ज़ोरों-शोरों पर है।
औरत
काम से हटकर उस औरत का
रोते-चिल्लाते बच्चे को
अपनी सूखी छाती से दूध पिलाना
बच्चे का सूखी छाती से दूध को चूसना
ज़ोरों-शोरों पर है।

रोज़ शाम को थक-हारकर
औरत का अपनी टूटी-फूटी
झोंपड़ी में लौटना
कच्चे चूल्हें पर रखी हांडी में
उस औरत का चावलों को घोटना
चावलों का घुटना
ज़ोरों-पर है।

इस तरह शहर में एक माँ
और बच्चे का विकास
ज़ोरों-शोरों पर है।

नाम-आमिर
पता-जामिया मिल्लिया इस्लामिया, विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110025

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  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति हरिवंश राय 'बच्चन' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आमिर जी, रचना लाजवाब हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. wahh बहुत ही खुबसूरत रचना की प्रस्तुति आप ने की हैं..
    आमिर जी धन्यवाद आपका तहेदिल से

    उत्तर देंहटाएं

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