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सगुन के पैसे        

सुबह का समय था| में उठकर बैठा ही था कि एक पारिवारिक मित्र के घर से उनकी पत्नी का फोन आ गया| वो घबरायी हुई बोली, “आप थोड़ी देर के लिए घर आ जाइये”| मैंने उत्सुकता से पूछा, “क्यों क्या हुआ”| वो जल्दी से बोली, “आप यही आ जाइये फोन पर नही बता सकती”| मैंने जल्दी जल्दी कपड़े पहने और उनके घर रवाना हो
पैसे
गया.
उनके घर पहुंचा तो मालूम पड़ा कि पारवारिक मित्र सुरेश के बेटे रवीश ने रात में दारु पीकर एक लेडी कांस्टेबल से बदतमीजी कर दी है| उस लेडी ने रिपोर्ट दर्ज करा दी और रवीश को पुलिस उठाकर ले गयी| रवीश के पिता सुरेश अपनी ड्यूटी पर लखनऊ में थे, इसलिए मुझे बुलाया गया क्योकि अधिकतर लोग लेडिज वाला मामला समझ कर पास आना नही चाहते थे| उनका सोचना था कि उसने लेडी पुलिस से बदतमीजी की है, हम गये तो हम भी पकड़े जायेंगे| अंत में मेरा नाम ध्यान आया, सोचा होगा ये कब काम आएगा|
मैने जब पूरा मामला सुना तो मुझे रवीश पर बहुत गुस्सा आया, क्योंकि दारू(जिसे मैंने कभी छुआ तक नही था) पीकर किसी महिला से झगड़ने का क्या मतलब? लेकिन दोस्ती का फर्ज तो निभाना ही था| सुरेश की पत्नी बोली, “आप थाने चले जाईये, जाकर देखिये क्या स्थिति है वहां पर, हमें जाने में तो डर लगता है”| मैंने कहा, “ठीक है”|
एक डरपोक और मेरे साथ भेज दिया जो रास्ते से बहाना बनाकर भाग आया| में सुरेश के छोटे लडके को लेकर थाने गया, उस लडके ने रास्ते से लॉकअप में बंद अपने भाई के लिए तीन चार चाय और दो बिस्किट ले लिए| थाने पहुंचकर में जैसे ही अंदर जाने लगा तो पुलिस वाला जोर से चिल्ला पड़ा, “कहाँ जा रहा वे”| में सकपका गया, उसके बोलने का तरीका ही ऐसा था, आज तक मेरे घर वालों ने मुझसे इतनी बदतमीजी से न बोला था|
मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, “जी सर रवीश नाम का जो लड़का रात पकड़कर लाया गया है उससे मिलना है”| पुलिस वाला अकड कर बोला, “चल बाहर निकल, दोपहर में आना”| में पीछे लौट पड़ा तो बोला, “इधर सुन”| में उसके पास गया, उसकी नजर मेरे हाथ में लगी चाय की थैली और बिस्किट पर थी, बोला, “कौन है बो तेरा”| में बोला, “ऐसे ही जानने वाला है”| यह सुन उसने कहा, “ठीक है लेकिन मिलना क्यों है”| में बोला, “बस चाय वगैरह देनी थी और हालचाल जानना था”|
पुलिस वाला बोला, “इतनी चाय पीलेगा वो”| जब उसने चाय वाली बात बोली तो में समझ गया कि ये चाय पीना
धर्मेन्द्र राजमंगल
धर्मेन्द्र राजमंगल 
चाहता है, उसका मुंह देखकर भी ऐसा लग रहा था कि अगर मैंने उसे चाय न दी तो उसकी लार टपक पड़ेगी|
में उसे मक्खन लगाते हुए बोला, “सर थोड़ी आपके लिए भी लाये थे”| यह सुनकर पुलिस वाला फूलकर गदगद हो गया, एक तो मैंने उसे सर बोल दिया और ऊपर से उसके लिए चाय ले आया, वह बोला, “तो फिर देर किस बात की है पिलाओ|”
यह कहकर उसने मेरे हाथ से चाय की पैकिट और बिस्किट छीन लिए| उस दिन मुझे पता पड़ा हमारी पुलिस कितनी कष्ट में रहती है, बेचारों को सरकार से चाय पानी भी नही मिलता| उसने चाय गिलास में डाली, फिर बिस्किट का पैकिट खोला और हो गया शुरू| एक गिलास, दो गिलास और तीन गिलास, एक पैकिट बिस्किट और दूसरे में से आधे बिस्किट चट कर डाले|
बाकी बचे आधा गिलास चाय और आधा पैकिट बिस्किट देकर बोला, “लो उसे दे आओ और मिलकर बात करो जितनी देर चाहो, जाओ”| उसने यह कहकर डकार ली और बोला, “ओम सियाराम, तेरी माया”| में इतना सब देखकर मुह फाड़े खड़ा था, मानो कोई बिचित्र चीज देख ली हो| पुलिस वाला बड़ा अजीब आदमी था| लेकिन मुझे महात्मा बुद्ध की वह कथा याद आ गयी, जिसमे उन्होंने कहा था कि पहले पेट भर खाना खिलाओ फिर शिक्षा दो|
में अंदर गया, रवीश लॉकअप में था| सारी रात मच्छरों ने काटा, पुलिस वालों ने गलियां दी, थोड़ी मार भी पड़ी| सुबह तक सारा नशा हिरन हो चुका था, मुझे देखकर बोला, “भईया गुटखा खाना है”| में नाराज हो बोला, “चुप करो और चाय पीओ”| रवीश बोला, “नही ये सब नही खाना”|
पुलिस वाला खड़ा सुन रहा था, बोला, “लॉकअप में गुटखा खाना सख्त मना है”| फिर मेरे पास आया और बोला, “पचास का नोट दो इसके लिए गुटखा मंगवाए देता हूं”| मेरा मन न करता था लेकिन रवीश की रोनी सूरत देख मैंने पचास का नोट पुलिस वाले को दे दिया| उसने नोट हाथ में से ऐसे खींचा मानो में दोबारा जेब में रख लूँगा|
थोड़ी देर में 'एसओ' साहब आ गये, में अन्दर केविन में गया, नमस्ते की| आदमी अच्छे थे बोले, “बैठिये”| मैंने सारा हाल उन्हें बताया तो बोले, “आज दोपहर में इसकी जमानत करवा लेना मजिस्ट्रेट के यहाँ से”| इसके बाद में थाने से चलने लगा तो बही पुलिस वाला फिर मिल गया, बोला, “चल दिए, थोड़ी देर में फिर मुलाक़ात होगी, रवीश को लेकर आयेगे पेशी के लिए”| में बोला, “जी आपका इन्तजार रहेगा|”
इसके बाद में सुरेश के घर गया, सारी बात बताई| तुरंत भगदड़ मच गयी, एक वकील कर लिया गया, दो आदमी जमानत के लिया भाड़े पर ले लिया गया, जो पैसा लेकर जमानत लेते थे| में, सुरेश की पत्नी और उनके दो चार मिलने वाले कलेक्ट्रेट पहुंच गये| वकील सारी तैयारी कर चुका था| उधर थाने से रवीश कलेक्ट्रेट लाया जा चुका था, रवीश के चेहरे का रंग उतर चुका था, मुझे यह देखकर अच्छा लगा था| सोचा अब यह दारू न पिएगा, और न किसी औरत से बदतमीजी करेगा|
सब लोग अंदर पहुचे, सामने न्याय अधिकारी बैठे थे, दरवाजे के पास अर्दली बैठा था, मुंह में पान या गुटखा लग रहा था और होट लाल लाल| दरवाजे के किनारे पर पीक मार रहा था| मुझे घिन आई, उसने कई बार पीक मारी, लेकिन क्या कर सकता था, में आम आदमी वो अधिकारी का अर्दली|
जमानत हुई, वकील आकर पैसे ले गया, बोला, “अंदर बाबुओं का हिसाब करना है, हिसाब किताब मेरे हाथ में था”| इसलिए मैंने पूछा, “क्यों क्या कलेक्ट्रेट प्राइवेट हो गयी है”| वकील हैरत से बोला, “क्यों”| में बोला, “आप कह रहे हो कि बाबुओ को पैसा देना पड़ता है, लेकिन मैंने तो सुना है कि इन लोगों को सरकार पैसा देती है”| वकील बोला, “अरे ये तो रस्म है उनका मान रखने के लिए, वरना क्या जमानत इतनी आसानी से हो जाती|”
मैंने पैसे दे दिए, इतने में आदेश हुआ, “रवीश की हथकड़ी खोल दी जाय”| पुलिस वाले आये और बोले, “पहले तो हमारा भाडा दो, रवीश को टेम्पो से लेकर आये है क्योंकि जीप थाने पर नही थी”| में बोला, “ क्यों सरकार पैसा नही देती अपराधी को लाने का”| पुलिस वाला बोला, “हमे क्या पता, हमे तो मिलता ही, नही शायद साब लोग चटकार जाते होंगे, तुम जल्दी से तीन सौ रू निकालो|”
सुरेश की पत्नी खड़ी देख रहीं थी, इशारा किया दे दो तो मेने पैसे दे दिए| इतने में वकील रवीश के जमानत के पेपर ले कर आ गया, वकील ने पुलिस वालों को पेपर दिए और हथकड़ी खोलने की कहकर अपने स्थान पर चला गया|
पुलिस वाले रवीश को लेकर हमारे पास आये और बोले, “पैसे दो रवीश की हथकड़ी खुलनी है, पूरे पांच सौ रूपये निकालो”| मैंने सुरेश की पत्नी की तरफ देखा, वह चुप खड़ी थी, फिर मेने आश्चर्य से पुलिस वालों से पूछा, “अरे सर ये पैसे क्यों”| पुलिसवाला अकड कर बोला, “क्यों का क्या मतलब, क्या पहली बार जमानत करा रहे हो, ये हथकड़ी खुलाई है, ये तो रस्म है यहाँ की, सब देते हैं राजा रंक फकीर|”
में हतप्रभ खड़ा था, समझ में नही आता था कि इक्कीसवी सदी में ऐसा होता है, कोर्ट आरोपी को छोड़ने का आदेश देती है और पुलिस उसे छोड़ने की रस्म भराई कराते है| मैंने तो पहली बार ऐसा देखा कि आदमी इतना बेशर्म होकर पैसे मांग रहा होता है, जिन पर कि उसका अधिकार ही नही है|
आखिरकार बहस हुई, सुरेश की पत्नी और पुलिस वालों में, पैसे की घिसामिड़ी होने लगी, पांच सौ कम होते हुए तीन सौ पर आ गये, लेकिन सुरेश की पत्नी सिर्फ सौ रूपये देने पर तैयार थी| रवीश की हथकड़ी तो खोल दी गयी, अब केवल हथकड़ी खुलाई पर बहस हो रही थी|
सुरेश की पत्नी सौ का नोट पुलिस वालों के हाथ में रखते हुए चलने लगी| में आश्चर्य का मारा दोनों पक्षों का मुंह ताक रहा था, आखिर किस चीज के पैसों पर घिसामिडी हो रही थी? क्योंकि रवीश तो हथकड़ी खुलते ही अपने छोटे भाई के साथ भाग गया था, रात से परेशान जो था|
अब केवल में और सुरेश की पत्नी ही बचे थे और पुलिस वाला था कि पीछा ही नही छोड़ता था| सुरेश की पत्नी ने मुझे हक्का बक्का देखा तो जोर से बोली, “अरे आप रुक क्यों जाते है, जल्दी चलिए इन लोगों की तो ये आदत होती है|”
हम लोग तेजी से चलकर ऑटो में बैठ गये, पुलिस वाला भी ऑटो में बैठ गया, उसका तो किराया भी फ्री होता है, ऐसा नही कि ऑटो वाले पैसा नही लेते, इसलिए कि पुलिस वाले पैसे देते ही नही| इस कारण बेचारे ऑटो वाले ने किराया फ्री कर दिया|
ऑटो में बैठकर पुलिस वाला सुरेश की पत्नी के पीछे पड गया, उसने ऑटो रुकवा लिया| अब सुरेश की पत्नी को गुस्सा आ गया और बोली, “में नही देती एक भी पैसा जाओ”| काफी लोग ऑटो में बैठे थे, पुलिस वाला समझ गया कि पैसा मिलना मुश्किल हो रहा है, तो बोला, “चलो सौ रूपये ही दे दो, बात खत्म”| सुरेश की पत्नी ने बटुबे से सौ का गाँधी छाप नोट निकाल कर पुलिस वाले के ऊपर फेंक दिया, उसने नोट लिया और चलता बना|
समझ में नही आता कि सच्चाई और ईमानदारी के प्रतीक गाँधी बापू का ही इन बुरे कामों में इस्तेमाल क्यों होता है| शायद बापू को दिखाना चाहते होंगे कि देखो तुम ज्यादा ईमानदारी की दुहाई देते थे, लो अब तुम्हारे ही फोटो से बेईमानी का खेल खेलते हैं|
पुलिस वाले के उतरते ही ऑटो चल पड़ा| एक बुजुर्ग मेरे पास बैठे थे, उनकी समझ में कहानी न आई, बोले, “बेटे क्या बात है, किस चीज के पैसे मांग रहा था ये”| मैंने ज्यादा लम्बी कहानी न सुनाकर संक्षिप्त में बताया, “कुछ नही चचा ये 'सगुन के पैसे' मांग रहा था”| ऑटो चला जा रहा था, लेकिन मेरा मन इन बातों से अलग न होता था, ऑटो के पहिये की गति के साथ बार बार यही बात दिमाग में घूम रही थी कि आखिर कब ये सगुन के पैसे देने का रिवाज़ बंद हो पायेगा|

 रचनाकार परिचय
लेखक का नाम---धर्मेन्द्र राजमंगल
जन्मतिथि—28 जून 1993 -जिला हाथरस(उप्र)
भाषा—हिंदी
विधाएँ—कहानी, उपन्यास, कविता
मुख्य कृतियाँ—
प्रकाशित उपन्यास— मंगल बाज़ार (जुलाई 2016) ब्लू रोज पब्लिशर्स-दिल्ली|
कहानी संग्रह—कितनी हैं, मेरी बीस कहानियां, चिल्ड्रन बाबा|
कविता—पापा मुझे पूंछा तो होता, माँ मुझे माफ़ कर दोगी, में आत्महत्या न करता तो क्या करता, हाल चाल, पापा में इतनी भी बुरी नही हूँ, मुझे अकेले छोड़कर, मेरे साथ चल, फटाफट चल पड़, बच्चों बारिश आएगी|
ईमेल—authordharmendrakumar@gmail.com
                   

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  1. भ्रष्टाचार पर अच्छा कटाक्ष है.

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  2. आँखें खोलनेवाला वृतांत

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  3. आज कल तो हर जगह भ्रष्टाचार और बेमानी चल रही हैं. लेकिन इस हमें ही रोकना होंगा. शुरुवात खुद से ही करनी होंगी.

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