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मेरे प्रेम की जीत होगी

उस दिन
बड़े गौर से आज मैने तुम्हारे आँखो को देखा था ,
आकाश के विस्तार सा
मेरा सब अपने आगोश मे रखने के लिये जैसे वचनबद्ध हो
मेरी आँखे झुक गयी ,
साधना सिंह
साधना सिंह 
मै इस विस्तार का आखिरी सिरा छुने को बेताब
अपना हद ढुढने का प्रयास करती
तरह तरह की कयास लगाने लगी..
पर सब मृगमरीचिका ही थी
तुम्हारे कहे बाते से इतर
तुम्हारा सत्य खोजने को आतुर मेरा कमजोर अविश्वास
हमेशा परास्त होता रहा
और मै विजयी
जैसे तुमने अनन्त युगो से मेरे गिर्द अपने प्रेम का
लक्छमन रेखा खीच रखा हो
और मै हर जन्म उसी दायरे मे अपना सर्वस्व समर्पित करती हूँ ...
मै अतृप्त ही तृप्त रहती हूँ ये सोच
कि तुम्हारा कोई सिरा भले ही मेरे पँहुच से परे हो
पर मुझसे अलग नही
हर कोना मुझ पर आकर अपना अर्थ पाता है
और ये सोच मेरा रोम रोम
गर्वान्वित हो उठता है
तुम्हारे सामने मेरी झुकी आँखे मेरे प्रेम के विजय की प्रतीक है तो जाओ..
फैलाओ अपना विस्तार आकाश के उस पार
मेरा प्रेम तुम्हारी धमनियों मे प्रवाहित हो
तुम्हे संबल ही देगी....
और वही मेरे प्रेम की जीत होगी ।।

साधना सिंह
 गोरखपुर 

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