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मोहब्बत

लकीरे खीचते जाओगे तो कैसे मोहब्बत हो ,
मोहब्बत
खुदी को इतना चाहोगे तो कैसे ये मोहब्बत हो ।
किताबों मे जो रखे फूल उनको तुम निहारो तो ,
कभी जो दूर हम जाएँ प्यार से तुम पुकारो तो ,
खुदी मे गुम हो जाओगे तो कैसे ये मोहब्बत हो ।
कभी नजरें जो मिल जाएँ तो मुस्काने लगो ना तुम ,
कभी रूठे जो हम तुम से तो मनाने लगो ना तुम ,
खुदी के नाज उठाओगे तो कैसे ये मोहब्बत हो ।
तड़प हो प्यार मे इतनी की भूलो ये जहाँ दौलत,
जहाँ की नैमते सारी मिलेंगी प्यार की बदौलत,
खनक सिक्कों की चाहोगे तो कैसे ये मोहब्बत हो ।

यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।          

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