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जानकी

जानकी इस नाम से मैं ना जाने कितने स्कूल , वृद्धाआश्रम व सराय खोल चूका हूँ ।ये नाम मुझमें अंदर तक पैठा हुआ है क्योंकि ये नाम मेरी माँ का है ।वो माँ जिसने मुझे जन्म नहीं दिया लेकिन माँ के उस रूप से परिचित
जानकी
कराया जिससे सिर्फ वही परिचित करा सकती थी ।बात पच्चीस साल पुरानी है जब मैं दस साल का था ।मेरे पिता व चाचा एक साथ रहते थे ।चाचा के तीन बच्चे थे जबकि मैं अपने जमीदार पिता की इकलौती संतान हूँ ।चाचा का बर्ताव अपनी पत्नी व बच्चों के साथ बहुत बुरा था  , वे जब तब उन्हें मारते रहते थे ।मेरे पिता उन्हें बहुत समझाते लेकिन वह एक न सुनते ।मेरे पिता अपने परिवार से बहुत प्रेम करते थे और सबके हित के विषय मे सोचते थे इसलिए मेरे दादाजी अपनी लगभग तमाम जमीन - जायदाद मेरे पिता के नाम कर गए थे ।वो जानते थे मेरे चाचा नशे व जुए के आदि हैं और उनके हाथों अपनी खून - पसीने की कमाई करना मतलब खुद अपने हाथों अपना टेटवा दबाने जैसा है ।
                           मेरे चाचा जानते थे कि पिताजी सीधे व भले इंसान है , इसलिए अपनी झूठी भावुकता भरी बातों से वो उनसे रूपय ऐठते रहते थे लेकिन एक दिन घर के बाहर कई लोग चाचा से अपने रूपय वसूलने के लिए हंगामा करने लगे जो उन्होंने जुए मे गवाये थे ।पिताजी ने उन सबको उनके रूपय देकर विदा किया और उस दिन के बाद पिताजी ने चाचा को एक भी रूपया देना बंद कर दिया ।चाचा को बहुत गुस्सा आता था वे अब बात बेबात पिताजी को गालीयाँ देते व अपमानित करते ।
                  ऐसे ही दिन गुजरते जा रहे थे और मेरे स्कूल की गर्मीयों की छुट्टियाँ भी आ गई ।मेरे मामा मुझे लेने आ गए ताकि कुछ दिन मैं उनके साथ गुजार सकूँ ।अभी मुझे गए हुए चंद दिन ही हुए थे कि मुझे जरूरी काम का कहकर मामा वापस घर की तरफ दौड़े ।घर पहुँचकर देखा तो आंगन मे मजमा लगा हुआ था , वही खून से लथपथ माँ व पिताजी पड़े थे और चाचा - चाची छाती पीट - पीट कर रो रहे थे ।मैं ये नजारा देखकर अवाक था ।पता चला रात को चोर घर मे आए थे और रूपय जेवर ले जाने के साथ - साथ उन्होंने मेरे माँ - बाप की जान को भी नहीं बखसा ।
                      मेरी तो जैसे दुनिया ही उजड गई थी ।अब मैं चाचा पर आश्रित था और उनके द्वारा दी गई यातना झेलने वालों मे से एक ।फिर एक दिन वह हुआ जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था ।चाचा मुझे अपने साथ शहर ले गए और मुझे दो हजार रूपय मे बेच दिया ।उसके बाद मैंने चाचा की सूरत नहीं देखी लेकिन वो जिन लोगों के पास मुझे छोड़ गए थे वो भी कम जालिम नहीं थे ।वो मुझे शहर से दूर एक तहखाने मे मुझे ले गए ।वहाँ मुझ जैसे ही न जाने कितने बच्चे थे ।वो लोग सबसे भीख मंगवाते थे ।अगले दिन उन लोगों ने हमें एक बड़ी गाड़ी मे भरा व शहर मे अपने ठिकानों पर छोड़ दिया ।मेरे साथ जो बच्चे थे उनमें से एक ने बताया कि इन लोगों की नजर से कोई नहीं बच सकता ।उसने भी दो एक बार भागने की कोशिश की थी लेकिन उन लोगों ने उसे पकड़ लिया ।सजा के तौर पर भूखा रखा और बहुत पीटाई की , उसके बाद उसने भागने के बारे मे सोचा भी नहीं ।
                              लेकिन मैंने आज अभी वहाँ से भागने का मन बना लिया था , इसलिए मैंने सबसे पहले चोरी - छीपे उस बाजार से निकलने का मन बनाया ।बाजार से निकलकर मैं बहुत ही संकरी गलियों से होता हुआ एक मंदिर मे पहुँचा ।अब तक भागते - भागते मैं बहुत थक गया था और हाफ्ने लगा था ।मैं मंदिर के फर्श पर पसर गया ।कुछ देर बाद मेरे पास एक औरत आई और बोली - "क्या हुआ तुम्हें तुम ठीक तो हो ना ।"
                           मेरी आँखें नहीं खुल रही थी , कई दिनों से मैंने ठीक से कुछ नहीं खाया था ।भूख , प्यास और थकान ने मुझे निढाल कर दिया था ।वह औरत भाग कर मेरे लिए पानी लाई और मुझे पिलाया ।अब मुझे कुछ राहत मिली ।
उसने मेरे सर पर प्रेम से हाथ रखा और बोली - "क्या तुम कुछ खाओगे ।"
मैं कुछ नहीं कहा बस मूक बनकर उसे देखता रहा ।वह मेरे लिए कुछ फल लेकर आई ।मेरी आँखों से आँसू बहने लगे और मैं उससे माँ कहकर लिपटकर रोने लगा ।उसने मुझे चुप कराया और अपने हाथों से मुझे फल खिलाए ।वह देखने मे गरीब और बहुत साधारण औरत थी ।वह उस वक्त मेरे लिए देवी तुल्य थी ।फल खाकर मैं वही फर्श पर लेट गया ।उसने मुझे एक चादर उढा दी ।मुझे कब नींद आ गई पता नहीं लेकिन जब उठा तो उसने मुझे चाय व बुखार की दवा दी ।उसने मुझे छू कर देख लिया था कि मुझे बुखार है ।मैंने उससे अपना सब हाल कह सुनाया कि कैसे माँ व पिताजी का कत्ल हुआ और अत्याचारी चाचा ने मुझे बेच दिया और भीख मांगने के लिए मजबूर हुआ ।उसकी आँखों से झर - झर आंसू बहने लगे ।उसने कहा तुम मेरे साथ चलो हम दोनों का ही इस दुनिया मे कोई नहीं हैं ।
         उसका नाम जानकी था ।वह एक विधवा औरत थी ।इस मंदिर की साफ - सफाई करने आती थी ।बदले मे उसे कुछ रूपय व खाने - पीने का सामान भी मिल जाता था , उसी से उसकी गुजर - बसर होती थी ।मंदिर के पास ही उसकी फूस की झोपड़ी थी , वह मुझे वहाँ ले गई ।उसने संदूक से एक रूमाल निकाला जिसमें कुछ रूपय बंधे हुए थे ।वह कुछ देर का कहकर वहाँ से चली गई और जब वह लौटी तो उसके हाथ मे मेरे लिए नए कपड़े थे ।उसने नहाने के लिए मुझे गर्म पानी दिया ।
पुष्पा सैनी
पुष्पा सैनी
     अगले दिन उसने मेरा पास के सरकारी स्कूल मे दाखिला करवाया और मैं कक्षा पाँच मे बैठ गया ।अपने ऊपर पड़े दुःखों ने मुझे समय से पहले परिपक्व कर दिया था ।मैं जानता था कि वह मेरी माँ के सभी फर्ज पूरे कर रही है , कितनी सिद्धत से मेरी सभी जरूरतें पूरी कर रहीं है इसलिए मैंने भी पढ़ाई मे दिन - रात एक कर दिए ।जब मैं कक्षा आठ मे आया तो माँ का हाथ बटाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा ।माँ के संस्कारों का ही असर था कि मैं सुबह जल्दी उठकर उनके साथ मंदिर जाने लगा ।धीरे - धीरे कई साल गुजर गए और मेरी पढ़ाई क्मप्लिट हो गई ।मुझे एक कंपनी मे अच्छी नौकरी मिल गई ।अब मेरे पास अपना फ्लैट था ।मेरी सफलता देखकर माँ की आँखें छलक गई , उन्होंने मुझे बहुत आशिष दी ।अब मैं और माँ अपने नए घर मे रहने लगे लेकिन अब भी माँ प्रतिदिन मंदिर की साफ - सफाई व पूजा - अर्चना करने जरूर जाती थी और मैं भी उनके साथ जाता था ।
               समय बितने के साथ जहाँ मैं तीस बरस का हो गया , वही माँ बुजुर्ग ।मैं जब भी उन्हें खासते और हाफते देखता तो चिंतित हो उठता ।उनका हर तरह से इलाज भी चल रहा था ।मैं दिन - रात उनकी लंबी उम्र के लिए दुआ मांगता क्योंकि मैं माँ को खोना नहीं चाहता था ।लेकिन डेढ़ साल के बाद वह मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई ।उनकी प्रत्येक सीख मैंने आत्मसात कर ली ।एक सबक जो हमेशा याद रहेगा , जो उन्होंने सीखाया नहीं बल्कि उन्हें देखकर मैं खुद ही सीखा हूँ  ,वो ये कि माँ जैसी माँ से भी बढ़कर होती है ।माँ तो अपने जन्म दिए बच्चे को पालती है और भविष्य मे उससे सेवा , त्याग जैसी ना जाने कितनी उम्मीद लगाती है लेकिन जानकी माँ ने मुझे निःस्वार्थ भाव से मातृत्व स्नेह दिया ।   

यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।          

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