2
Advertisement

भारतीय रुपये का इतिहास 

रुपया शब्द का उद्गम संस्कृत के शब्द ‘रुप्’ या ‘रुप्याह्’ में निहित है, जिसका अर्थ चाँदी होता है और ‘रूप्यकम्’ का अर्थ चाँदी का सिक्का होता है। मुद्राओं के रंग-रूप और मूल्य कई बार बदले गये हैं. उनमें
रुपया
जालसाजी रोकने के लिए सुरक्षा के उपाय किये जाते रहे हैं. भारत में पहले चीन में चंगेज खां के पोते कुबलाई ख़ान (1260-1264) के शासन में 'छाओ' नामक सांकेतिक काग़ज़ी मुद्रा चलती थी.दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने पहली बार साल 1329-1330 में टोकन करेंसी चलाई थी. उन्होंने चीन के नोटों से प्रभावित होकर सोने-चांदी के सिक्कों की जगह तांबे-पीतल के सिक्के चलाए थे. उनका यह प्रयोग बुरी तरह नाकाम रहा.रुपया शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम शेरशाह सूरी ने भारत मे अपने शासन 1540-1545 के दौरान किया था. शेरशाह सूरी ने अपने शासन काल में जो रुपया चलाया वह एक चाँदी का सिक्का था, जिसका भार 178 ग्रेन (11.534 ग्राम) के लगभग था. उसने तांबे का सिक्का जिसे ‘दाम’ तथा  सोने  का सिक्का जिसे ‘मोहर’ कहा जाता था, को भी चलाया. कालांतर में मुगल शासन के दौरान पूरे उपमहाद्वीप में मौद्रिक प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए तीनों धातुओं के सिक्कों का मानकीकरण किया गया.     शेरशाह सूरी के शासनकाल के दौरान आरम्भ किया गया 'रुपया' आज तक प्रचलन में है. भारत में ब्रिटिश राज के दौरान भी यह प्रचलन में रहा, इस दौरान इसका भार 11.66 ग्राम था और इसके भार का 91.7 प्रतिशत तक शुद्ध चाँदी थी.19 वीं शताब्दी के अंत में रुपया प्रथागत ब्रिटिश मुद्रा विनिमय दर, के अनुसार एक शिलिंग और चार पेंस के बराबर था. यह एक पाउण्ड स्टर्लिंग का 1/15 भाग था.19वीं सदी मे जब दुनिया में सबसे सशक्त अर्थव्यवस्थाएं स्वर्ण मानक पर आधारित थीं, तब चाँदी से बने रुपये के मूल्य में भीषण गिरावट आई. संयुक्त राज्य अमेरिका और विभिन्न यूरोपीय उपनिवेशों में विशाल मात्रा में चाँदी के स्त्रोत मिलने के परिणामस्वरूप चाँदी का मूल्य सोने के अपेक्षा बहुत गिर गया. अचानक भारत की मानक मुद्रा से अब बाहर की दुनिया से अधिक खरीद नहीं की जा सकती थी.इस घटना को 'रुपये की गिरावट' के रूप में जाना जाता है. पहले रुपया (11.66 ग्राम) 16 आने या 64 पैसे या 192 पाई में बाँटा जाता था. रुपये का दशमलवीकरण 1957 में भारत मे, 1869 में सीलोन (श्रीलंका) में और 1961 में पाकिस्तान में हुआ.इस प्रकार भारतीय रुपया 100 पैसे में विभाजित हो गया. भारत में पैसे को पहले नया पैसा नाम से जाना जाता था.भारत में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा जारी की जाती है, जबकि पाकिस्तान में यह स्टेट बैंक आफ़ पाकिस्तान के द्वारा नियंत्रित होता है.

ब्रिटिश बैंकों ने पहले छापे नोट :-

 मुद्रा के तौर पर आज हम जिस रुपये का प्रयोग करते हैं उसका चलन भारत में सदियों से है. फर्क सिर्फ इतना है कि तब भारत में मुद्रा के तौर पर चांदी और सोने के सिक्के चलन में थे. यह चलन 18वीं सदी के पूर्वार्ध तक बरकरार था. लेकिन जब यूरोपीय कंपनियां व्यापार के लिए भारत में आयीं तब उन्होंने अपनी सहूलियत के लिए यहां निजी बैंक की स्थापना की. और फिर इसके बाद से ही चांदी और सोने की मुद्रा की जगह कागजी मुद्रा का चलन शुरू हो गया. भारत की सबसे पहली कागजी मुद्रा कलकत्ता के बैंक ऑफ हिंदोस्तान ने 1770 में जारी की थी. इन ब्रिटिश कंपनियों का व्यापार जब बंगाल से बढ़कर मुंबई, मद्रास तक पहुंच गया, तब इन जगहों पर अलग-अलग बैंकों की स्थापना शुरू हुई. इसके भारत में काग़ज़ का नोट सबसे पहले जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार ने 1773 में शुरू किया था.इसके बाद बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बंबई और बैंक ऑफ मद्रास ने कागजी मुद्राएं जारी की.इन बैंकों को अपने-अपने सर्किल में नोट जारी करने के अधिकार एक चार्टर के तहत दिया गया था.बैंक ऑफ़ बंगाल की स्थापना 50 लाख रुपए की पूंजी के साथ 1806 में बैंक ऑफ कलकत्ता के रूप में की गई थी.इस बैंक की ओर से जारी नोट पर बैंक का नाम और नोट की क़ीमत (100, 250, 500 रुपए) तीन लिपियों उर्दू, बांग्ला और नागरी में छापी गई थीं.

अंगरेजी शासन ने कानून बनाया :-

 कागजी मुद्रा अधिनियम, 1861 के साथ भारत सरकार को नोट जारी करने का एकाधिकार दिया गया. इसके साथ ही प्रेसिडेंसी बैंकों के नोट ख़त्म हो गए.भारत में सरकारी काग़ज़ी मुद्रा शुरू करने का श्रेय पहले वित्त सदस्य जेम्स विल्सन को जाता है. उनकी असामयिक मौत के कारण भारत में सरकारी काग़ज़ी मुद्रा जारी करने का काम सैम्युल लाइंग ने संभाला.अँग्रेजी राज में कागजी मुद्रा का कामकाज टकसाल मास्टरों, महालेखाकारों और मुद्रा नियंत्रक को दिया गया.ब्रिटिश इंडिया के पहले नोटों के सेट पर रानी विक्टोरिया की तस्वीरें थीं. इसमें 10, 20, 50, 100, 1000 रुपए के नोट जारी किए गए.1886 में प्रेसिडेंसी बैंक की स्थापना हुई. अब जब देश में बैंक बढ़े, तो कागजी मुद्रा का चलन भी आम हो गया. बैंक ऑफ बंगाल द्वारा तीन सीरीज में नोट छापे गये. पहली सीरीज एक स्वर्ण मुद्रा के रूप में छापी गयी यूनिफेस्ड सीरीज थी. यही सीरीज कलकत्ता में सिक्सटीन सिक्का रुपये के तौर पर छापी गयी. दूसरी सीरीज कॉमर्स सीरीज थी, जिस पर एक तरफ नागरी, बंगाली और उर्दू में बैंक का नाम लिखने के साथ ही एक महिला की तसवीर भी छपी थी और दूसरी तरफ बैंक का नाम लिखा था. तीसरी सीरीज 19वीं सदी के अंत में छापी गयी, जिसे ब्रिटैनिका सीरीज कहा गया. उसके पैटर्न में बदलाव हाने के साथ ही कई रंगों का प्रयोग किया गया. अब तक ये सारे रुपये राज्यों और ब्रिटिश व्यापारियों के सहयोग से स्थापित बैंकों द्वारा जारी किये जा रहे थे. इस मुद्रा को जारी करने के साथ ही ब्रिटिश सरकार ने देश के एक बड़े हिस्से को अलग-अलग मुद्रा क्षेत्र में बांट दिया. इस प्रकार सरकार द्वारा चलायी गयी कागजी मुद्रा इन क्षेत्रों में मान्य थी. ये क्षेत्र - कलकत्ता, बाम्बे, मद्रास, रंगून, कानपुर, लाहौर और कराची थे. जैसे-जैसे भारतवर्ष में ब्रिटिश साम्राज्य अपने पैर फैलाता गया, न सिर्फ रुपये के बनावट में बदलाव आया, बल्कि इस पर अलग-अलग कई भाषाओं में रुपये का नाम भी लिखा जाने लगा. वर्ष 1903-1911 के बीच 5, 10, 50 और 100 रूपए के नोट रद्द कर दिए गए. पहले विश्व युद्ध के कारण वर्ष 1917 में पहली बार अंग्रेज़ राजा के चित्र वाले एक रुपए और दो रुपए आठ आने के नोट और 1923 में दस रुपए के नोट छापे गए.साल 1932 से नासिक के सिक्योरिटी प्रेस में पूरे भारत के लिए बहुरंगी नोट छपने लगे.अंग्रेज़ सरकार भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना होने तक नोट जारी करती रही. वर्ष 1923 में ब्रिटिश सरकार की कागजी मुद्रा पर किंग जॉर्ज पांच का चित्र भी छपा, यह चलन आगे चल कर भी बरकरार रहा.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया :-

 वर्ष 1935 में ब्रिटिश सरकार ने रुपये जारी करने का अधिकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को दे दिया. इसके बाद रिजर्व बैंक द्वारा 1938 में पहली बार नोट जारी किया गया. यहां यह जानना भी जरूरी है कि 1928 में नासिक में भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस लगाये जाने के पहले तक सारी कागजी मुद्राएं बैंक ऑफ इंग्लैंड से छप कर आती थीं.

आजाद भारत और कागजी मुद्रा :-

आधुनिक भारत के रुपये का इतिहास 1947 में आजादी के बाद से शुरू होता है. आजाद भारत का पहला नोट एक रुपये का था, जिसे1949 में जारी किया गया था. इस नोट पर सारनाथ का अशोक स्तंभ अंकित था. इसके बाद नोट में कई बदलाव हुए और उस पर गेटवे ऑफ इंडिया, बृहदेश्वर मंदिर के चित्र भी छापे गये. वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा जो नोट छापा गया उस पर हिंदी भाषा में भी लिखा गया. इन नोटों के जारी होने के दशकों बाद 1996 और 2005 में जारी नोट पर महात्मा गांधी की फोटो छपनी शुरू हुई. इसके बाद रुपये की नकल को रोकने के लिए उसमें कई सारे सिक्योरिटी फीचर्स डाले गये. दृष्टिहीनों की सहूलियत के लिए भी आज के नोट में कई फीचर्स डाले गये हैं. आज की अगर बात करें, तो 5, 10, 20, 50, 100, 500 और 2000 के कागजी नोट चलन में हैं.

रुपये की यात्रा :-

 औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने कागजी मुद्रा कानून, 1861 के साथ मुद्रा उत्पादन का काम अपने हाथ में ले लिया और आज के रुपये की यात्रा शुरू हुई. अब सिर्फ शासन ही मुद्राएं जारी कर सकता था, बैंक नहीं. यह कानून इंडिया काउंसिल के वित्त सदस्य जेम्स विल्सन के विचारों पर आधारित था जो भारत में अंगरेजों के सलाहकार थे.वर्ष 1928 में नासिक में मुद्रालय खोले जाने से पहले सभी नोट बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा छापे जाते थे. चार सालों के भीतर सभी भारतीय नोट इसी जगह से छापे जाने लगे थे. वर्ष 1935 में भारतीय धन के प्रबंधन की पूरी जिम्मेवारी नये बने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के सुपुर्द कर दी गयी. वर्ष 1944 में जापानियों द्वारा नकली नोट बनाये जाने के डर से रिजर्व बैंक ने नोटों में पहली बार सुरक्षा धागे और वाटरमार्क का प्रयोग हुआ.वर्ष 1949 में स्वतंत्र भारत का पहला नोट एक रुपये की मुद्रा के रूप में छापा गया. इसके ऊपर सारनाथ के सिंहों वाले अशोक स्तंभ की तसवीर थी जो बाद में भारत का राष्ट्रीय चिह्न भी बना.नहीं पढ़ पानेवाले लोगों की सहूलियत के लिए 1960 के दशक में अलग-अलग रंगों में नोट छापे जाने लगे. वर्ष 1980 के बाद नोटों पर कला, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान से संबंधित चित्र व्यापक तौर पर छापे जाने लगे. उससे पहले कुछ राष्ट्रीय स्मारकों के चित्र छापे गये थे.वर्ष 2011 में नोटों पर रुपये के नये चिह्न  का प्रयोग प्रारंभ हुआ. पिछले दिनों जारी 2000 और 500 के नोटों पर ‘स्वच्छ भारत’ अभियान का चिह्न है. पांच सौ के भूरे नोट पर लाल किला और दो हजार के गुलाबी नोट पर मंगलयान मुद्रित है.

भारतीय इतिहास में विविध काल में प्रचलन में नोट :-

1.पुर्तगालियों ने गोवा में चलाया अपना नोट :- पश्चिम भारत में गोवा क्षेत्र को पुर्तगालियों ने वर्ष 1510 में अपने
डा.राधेश्याम द्विवेदी
डा.राधेश्याम द्विवेदी
कब्जे में ले लिया था. भारत से होने वाले व्यापार में उस समय पुर्तगालियों का एकाधिकार था और और डच व अंगरेजों के भारत आने से पहले एक शताब्दी से भी ज्यादा समय तक यह कायम रहा. गोवा, दमन और दीव क्षेत्र वर्ष 1961 तक पुर्तगालियों के अधीन था. पेपर करेंसी के तौर पर जारी किये गये पहले इंडो-पुर्तगीज नोट को ‘रुपिया’ कहा गया था, जो वर्ष 1883 के करीब चलन में आया था.इन नोटों में पुर्तगाल के राजा का पार्ट्रेट दर्शाया गया था. इन्हें 5, 10, 20, 50, 100 और 500 के मूल्य में जारी किया गया था. वर्ष 1906 में पुर्तगाल के कब्जेवाले भारतीय इलाकों में पेपर मनी जारी करने की जिम्मेवारी ‘बैंको नेशनल अल्ट्रामरीनो’ की थी. आरंभिक समय में इन नोटों पर जारी करनेवाले बैंक की मोहर होती थी. कुछ नोट्स में भारतीय सभ्यता और संस्कृति से संबंधित प्रतीकों को भी दर्शाया गया था.
2.फ्रांसीसी करेंसी :- केरल का माहे, तमिलनाडु के कराइकल, पुद्दुचेरी, आंध्र प्रदेश का यनम और पश्चिम बंगाल का चंद्र नगर फ्रांस के उपनिवेश थे. इन्हें ‘इस्टेब्लिशमेंट्स फ्रांसिसेज डेंस ल’इंडे’ यानी भारत में फ्रांसीसी इस्टेब्लिशमेंट कहा जाता था. इन फ्रेंच कॉलोनियों में पेपर मनी जारी करने की जिम्मेवारी बैंक ऑफ इंडोशाइन को सौंपी गयी थी.इसमें एक रुपये के नोट प्रथम विश्व युद्ध के बाद और पांच रुपये के नोट वर्ष 1937 के बाद जारी किये गये थे. इनमें मोजियर डुप्ले (भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य के संस्थापक) के नाम से जारी किये गये 50 रुपये के नोट को खास तरीके से डिजाइन किया गया था.
3.हैदराबाद ने भी रुपया जारी किया :- हैदराबाद एक मात्र ऐसा राज्य था, जिसके पास वर्ष 1916 से ही पेपर करेंसी थी और वह 1952 तक प्रचलन में थी. ये नोट वर्ष 1939 तक प्रिंट किये गये थे, जिनमें ‘हिजरी’ युग से जुड़े हुए और डेक्कन इलाके में प्रचलित ‘फासली’ वर्षों का इस्तेमाल किया गया था. ये नोट उर्दू और वहां की अन्य स्थानीय भाषाओं (कन्नड़, तेलुगु, मराठी आदि) में प्रिंट किये गये थे.
4.बर्मा में जापानी रुपया चला :- बर्मा की कठपुतली सरकार ने भारतीय रुपयों का इस्तेमाल शुरू किया, जो जापान की इंपीरियल सरकार द्वारा जारी किये गये थे. म्यांमार (बर्मा) जब ब्रिटिश शासन के अधीन था, उस समय वहां भारतीय रुपया प्रचलन में था और जापान के आक्रमण तक इस देश में यही स्थिति थी. ये अलग-अलग मूल्य के थे और एक, पांच और 10 रुपये के रूप में जारी किये गये थे.
5.भारतीय रिजर्व बैंक :- 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय कार्यालय का कलकत्ता में उद्घाटन हुआ. बंबई, मद्रास, रंगून, कराची, लाहौर और कानपुर में इसकी शाखाएं खुली.साल 1938 में जार्ज छठे के चित्र के साथ पहली बार पांच रूपए के नोट और बाद में 10 रूपए, 100 रूपए, 1,000 रूपए और 10,000 रूपए के नोट जारी किए गए.दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान भारत का जाली नोट छाप कर बाज़ार में न उतार दे, इसलिए नोट पर वाटरमार्क लगाया गया.इतना ही नहीं, सुरक्षा उपाय के रूप में पहली बार नोट में सुरक्षा धागा लगाया गया.भारतीय संविधान के लागू होने तक रिज़र्व बैंक से जारी अंग्रेज़ राजा की नोट ही चलते रहे.

स्वतंत्र भारत में :-

 नोटों पर प्रतीकों का चयन एक महत्त्वपूर्ण बात रही है. भारतीय नोट पर अंग्रेज़ राजा के चित्र को हटाकर महात्मा गांधी का चित्र छापने के हिसाब से डिज़ाइन बनाया गया.पर अंत में सारनाथ के सिंह और अशोक स्तंभ पर आम राय बनी.साल 1954 में दोबारा 1,000 रुपए, 5,000 रूपए और 10,000 रुपए के नोट शुरू किए गए.छठे दशक की मंदी की शुरुआत में बचत के लिहाज से 1967 में नोटों का आकार छोटा कर दिया गया.रिजर्व बैंक ने वर्ष 1972 में 20 रुपए और 1975 में 50 रुपए के नोटों की शुरुआत की.साल 1946 के बाद 1978 में एक बार फिर बड़े नोटों का विमुद्रीकरण किया गया.अस्सी के दशक में पूरी तरह से नए नोटों के सेट जारी किए गए. इन नोटों पर भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को दिखाया गया. इसके अलावा 20 रुपए और 10 रुपए के नोटों पर कोणार्क चक्र और मोर के चित्र छापे गए. साल 1987 में महात्मा गांधी के चित्र के साथ 500 रुपए का नोट पहली बार जारी हुआ.  500₹ का पहला नोट 1987 में और 1,000₹ का पहला नोट सन् 2000 में बनाया गया था. फिलहाल 1,000₹ का नोट बंद हो चुका है.और 500₹ का नया नोट मार्केट में आ रहा है.भारतीय रुपया 1000 ₹ पहली बार 1954 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पेश किया गया था. जनवरी 1978 में सभी उच्च संप्रदाय पैसों        (₹ 1000, ₹ 5000, और ₹ 10,000) बेहिसाब पैसा  अंकुश लगाने के लिए रद्द किए थे. आदेश में मुद्रास्फीति नोट नवंबर 8 मार्च, 2016 को 2000 में फिर से शुरू किया गया था की वजह संचलन में पैसों की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा की 1000 की मुद्दे को बंद किया जाये जिससे वह भष्ट्राचार को रोख सखे. पांच सौ और हजार के पुराने नोटों को हटा कर पांच सौ और दो हजार के नये नोटों का जारी होना भारत में कागजी मुद्रा के ढाई सदियों के इतिहास का नवीनतम चरण है. इस इतिहास में मुद्राओं के रंग-रूप और मूल्य कई बार बदले गये हैं तथा उनमें जालसाजी रोकने के लिए सुरक्षा के उपाय किये जाते रहे हैं. 

डा.राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.ए. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य तथा ग्रंथालय विज्ञान की डिग्री तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) की डिग्री उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम.ए.डिग्री तथा’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। बस्ती ’जयमानव’ साप्ताहिक का संवाददाता, ’ग्रामदूत’ दैनिक व साप्ताहिक में नियमित लेखन, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, बस्ती से प्रकाशित होने वाले  ‘अगौना संदेश’ के तथा ‘नवसृजन’ त्रयमासिक का प्रकाशन व संपादन भी किया। सम्प्रति 2014 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्यरत हैं। प्रकाशित कृतिः ”इन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू द डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं। 

एक टिप्पणी भेजें

  1. बढ़िया जानकारी, सभी को अपने रूपये के इतिहास के बारेमें जानकारी होनी चाहिये.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही उम्दा .... Sundar lekh ... Thanks for sharing this nice article!! :) :)

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top