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विस्‍तार

विस्‍तार अगर पाना है तो
ख़ुद को लघुतम करना ही होगा
वृक्ष रूप को पाना है तो
ख़ुद बीज रूप में ढलना ही होगा
और महामानव बनना ही है तो
मानव-अणु  बनना ही होगा ।
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बाती
बाती

जगर-मगर कर जगर-मगर
जल-जल बुझती मन की बाती
कभी जलाती होली सी और
कभी सुहाती दीवाली सी बाती
तन-रूपी माटी के दीपक में
प्रकाश-पुंज सी सिमटी बाती
आकाश-रूप में सूरज ही बन
तन से उड़ जाती
औचक ही बाती ।


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यह रचना पुष्पलता शर्मा 'पुष्पी' जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी आपकी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में सम-सामयिक लेख ( संस्‍कारहीन विकास की दौड़ में हम कहॉं जा रहे हैं, दिल्‍ली फिर ढिल्‍ली, आसियान और भारत, युवाओं में मादक-दृव्यों का चलन, कारगिल की सीख आदि ) लघुकथा / कहानी ( अमूमन याने....?, जापान और कूरोयामा-आरी, होली का वनवास आदि ), अनेक कविताऍं आदि लेखन-कार्य एवं अनुवाद-कार्य प्रकाशित । सम्‍प्रति रेलवे बोर्ड में कार्यरत । ऑल इंडिया रेडियो में ‘पार्ट टाइम नैमित्तिक समाचार वाचेक / सम्‍पादक / अनुवादक पैनल में पैनलबद्ध । कविता-संग्रह ‘180 डिग्री का मोड़’ हिन्‍दी अकादमी दिल्‍ली के प्रकाशन-सहयोग से प्रकाशित हो चुकी है । Email - platasharma6gmail.com ,http://pushpi6.blogspot.in/

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