0
Advertisement

अब ना रुकूँगी !

अब ना रुकूँगी !
बहुत रुक चुकी,
इस इंतजार में,
कि लौटोगे तुम
अब ना रुकूँगी !
तो साथ चलेंगे ।

डोर से कटी पतंग सी
कट चुकी,
फट चुकी
ये जिंदगी !
भागते-भागते उस
कटी पतंग के पीछे,
गुजरे दिन, महीने, साल !


चलो कोई नहीं,
अब तो लूट ही लिया उसे
आ गई है डोर हाथों में,
फटी ही सही,
हाथ तो आ गई
पतंग जिंदगी की !

जोड़ भी लूँगी
प्यार का गोंद मिल गया है,
विश्वास की तीलियाँ भी हैं,
जोड़ ही लूँगी !

अब ना रुकूँगी,
बहूँगी नदिया - सी ।
मिलना हो तो पहुँचो,
सागर किनारे !
अब वहीं मिलूँगी,
अब ना रुकूँगी !
----------------------------------------

ना जाने क्यों...


ना जाने क्यों, खिंचा चला
आता है कोई....

ना है सूरत का पता,
और ना ही सीरत का,
कोई जान ना पहचान,
पर अहसान मानता है कोई ।

वक्त की उँगलियों ने
तार कौन से छेड़े ?
आज मन का मेरे
सितार बजाता है कोई ।
श्रीमती मीना शर्मा
श्रीमती मीना शर्मा

नहीं मिला जो ढूँढ़ने से
सारी दुनिया में,
आज अंतर से क्यूँ
पुकार लगाता है कोई ।

ताउम्र बहे अश्क,
पर समेट लिए अब,
उनकी कीमत जो
मोतियों से लगाता है कोई ।

ना जाने क्यों खिंचा चला
आता है कोई ।।

कवि की कविता

मन के एकांत प्रदेश में,
मैं छुपकर प्रवेश कर जाती हूँ.
जीवन की बगिया से चुनकर
गीतों की कलियाँ लाती हूँ।।

तुम साज सजाकर भी चुप हो
मैं बिना साज भी गाती हूँ
जो बात तुम्हारे मन में है
मैं कानों में कह जाती हूँ।।

तुम कलम उठा फिर रख देते
मैं ठिठक खड़ी रह जाती हूँ
तुम कवि, तुम्हारी कविता मैं
शब्दों का रस बरसाती हूँ।।

जब शब्दकोश के मोती चुन
तुम सुंदर हार बनाओगे
वह दोगे भला किसे बोलो
मुझको ही तो पहनाओगे।।

रचनाकार परिचय 
श्रीमती मीना शर्मा. 
           मुंबई में शिक्षिका.
रुचियाँ :बच्चों, पक्षियों, पौधों व         
           प्रकृति से विशेष लगाव.
निजी ब्लॉग : चिड़िया.
URL :      meenasharmma.blogspot.com 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top