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कितना बदल चुका है मायावती जी की बसपा 

बसपा के संस्थापक कांशीराम के समय के अधिकतर बसपा नेता आज या तो खुद बाहर का रास्ता पकड़ लिये हैं या बसपा से बाहर किए जा चुके हैं. कुछ बसपा नेता एसे हैं जो बाहर जाकर वापस लौट आए हैं. लेकिन उनकी
मायावतीजी
मायावतीजी
पार्टी में अभी भी दोयम दर्जे की हैसियत है.नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे कांशीराम के इक्का-दुक्का साथी अगर अभी भी बसपा में बने हुए हैं, तो उसकी वजह उनका सिर्फ आज्ञाकारी कार्यकर्ता बने रहना तथा मुस्लिम कार्ड की तरह इस्तेमाल किये जाने की उनकी उपयोगिता है. अधिकतर बसपा नेताओं को पार्टी से निकाले जाने की वजह यही थी कि वे स्वामीभक्त ना रहकर खुद को नेता समझने लगे थे.

दीनानाथ भास्कर का मामला:-

कौन भूल सकता है उस दुबले-पतले दाढ़ी वाले फायरब्रांड नौजवान दीनानाथ भास्कर को जिसने 1991 चुनाव में वाराणसी संसदीय क्षेत्र की मतगणना के दौरान दूरदर्शन पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व पुलिस महानिदेशक श्रीश चंद्र दीक्षित को करारा जवाब देकर चुप करा दिया था. 1993 में वह सपा-बसपा की गठबंधन सरकार में मंत्री बने. लेकिन 1996 में उन्हें मायावती का प्रकोप झेलना पड़ा. वह कुछ समय सपा में बिताकर 2009 में वापस बसपा में पुनः शामिल हो गये थे. लेकिन वह मायावती का विश्वास जीत पाने में नाकाम रहे. पिछले साल वो बीजेपी में शामिल हो गए. लेकिन इन सबके बीच 1996 से पहले वाला दीनानाथ भास्कर कहीं गुम होकर रह गया और बहुत कुछ बदला हुआ भास्कर रह गया है.

डाक्टर मसूद अहमद का मामलाः-

 अब शायद ही किसी को डाक्टर मसूद अहमद की याद आ रही होगी? वे मुलायम सिंह के मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री थे. 1994 जून में तत्कालीन बसपा महासचिव मायावतीजी से उनके मतभेद हो गए थे .न चाहते हुए भी मुलायम सिंह जी को उन्हें न सिर्फ अपने मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा बल्कि मायावतीजी के दबाव में आधी रात को सरकारी बंगले से मसूद अहमद का सामान निकालवा कर फिंकवाना पड़ा. बाद में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई लेकिन आज तक एक भी सीट नहीं जीत पाए.

कांशीरामजी के करीबियों को बाहर का रास्ता मिला:-

बसपा के संस्थपक माननीय कांशीरामजी के करीबी माने जाने वाले सुधीर गोयल को आज तक पता नहीं है कि उन्हें बसपा से क्यों निकाला गया ? शायद वह मायावतीजी का विश्वास नहीं जीत पाए थे.इसी तरह का हाल बरखूराम वर्मा का भी हुआ जो लंबे समय तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे. एक दिन अचानक पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में पार्टी से निकाल दिए गए.काफी समय बाद उनकी बसपा में वापसी तो हुई लेकिन पिछले साल उनकी मृत्यु हो गई. यही हाल जंगबहादुर पटेल और सोनेलाल पटेल का हुआ. सोनेलाल ने अपनी पार्टी अपना दल बनाई लेकिन राज्य की राजनीति को कभी बहुत प्रभावित नहीं कर पाए.हाँ, उनकी बेटी अनुप्रिया जरूर बीजेपी के साथ गठबंधन कर 2014 में लोकसभा की दो सीटें जीतने में सफल रहीं. वह आज केन्द्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बन गई है. एसा नहीं है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से बसपा को झटका नहीं लगा. पर बसपा इसे झेलते हुए अपना वजूद बचा भी रख सकती है. जब इतने ढेर सारे पटेल और वर्मा नेताओं को निकालने के बाद भी वो 2007 में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने में सफल रहीं, तो उसे 2017 में एक दो मौर्य जैसे नेताओं के जाने से ज्यादा चिंता नहीं होगी. अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मायावतीजी ने 26 प्रभावशाली नेताओं को निकाल बाहर किया. इनमें 13 मंत्री और दूसरे मंत्री स्तर के दर्जा प्राप्त लोग, सांसद और विधायक थे. 

बहन मायावतीजी के अन्दाज जुदाः- 

बसपा के कुछ सूत्र बताते हैं कि बहनजी की डिक्शनरी में माफी शब्द नहीं है. पार्टी या सरकार की छवि को धक्का पहुंचाने वालों को वह बर्दाश्त नहीं करतीं. हालांकि निकालने से पहले चेतावनी जरूर दे देती हैं. उन्होंने अपनी ही पार्टी के सांसद उमाकांत यादव को मुलाकात के लिए मुख्यमंत्री आवास बुलाया और एक पुराने आपराधिक मामले में वहीं से गिरफ्तार करा दिया.चाहें उनके चहेते सांसद धनंजय सिंह हों या विधायक योगेंद्र सागर, वह किसी को नहीं बख्शतीं हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल लाने वाले एनआरएचएम घोटाले के चलते जिसमें दो-दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या कर दी गई थी, मायावती ने अपने सबसे नजदीकी मंत्री बाबू सिंहजी कुशवाहा को भी एक झटके में मंत्रिमंडल से निकाल बाहर कर दिया था.कुशवाहा के साथ ही स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्र से भी इस्तीफा ले लिया गया था.हाल ही में सीतापुर जिले के पूर्व मंत्री अब्दुल मन्नान, उनके भाई अब्दुल हन्नान, राज्य सभा सदस्य रहें नरेंद्र कश्यप हों या एमएलए रामपाल यादव, मायावतीजी की पसंदीदा लोगों की सूची से बाहर होते ही सबके सब पार्टी से बाहर कर दिए गए.कांशीराम के साथी रहे दद्दू प्रसाद, राज बहादुर, राम समुझ, हीरा ठाकुर और जुगल किशोर जैसे नेता भी मायावती के प्रकोप से नहीं बच पाए. यहां तक कि स्टेट गेस्ट हाउस हमले के समय मायावती का साथ देने वाले कैप्टन सिकंदर रिजवी को भी बहनजी ने बर्दाश्त नहीं किए हैं. 

मायावतीजी के निर्देशों का पालन करनेवालों की पार्टी:-

आज की बसपा कांशीराम की नहीं, मायावती की बसपा है. इसे सतीश मिश्र, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, रामवीर उपाध्याय, सुखदेव राजभर, जयवीर सिंह, रामअचल राजभर, इंद्रजीत सरोज और लालजी वर्मा जैसे मायावती के विश्वस्त लोग ही चला रहे हैं. या यूं कह सकते हैं कि सभी मात्र मायावती के निर्देशों का अनुपालन ही सुनिश्चित कर रहे हैं.यहां किसी भी नेता को भी अपनी सोच, अपना टैलेंट दिखाने की कोशिश करने की ना तो जरुरत हीं है और ना करने की इजाजत है. जिसे कुछ करना ही है वह किसी दूसरे दल में जाकर ही दिखा सकता है. बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्षा मायावतीजी को शायद स्वामी प्रसाद मौर्य के इरादों की भनक नहीं लग पाई. वरना वह उन्हें पार्टी छोड़ने का मौका ही नहीं देतीं. उसने मौर्य जैसे अनेक बसपा नेताओं की तरह ही बाहर का रास्ता दिखा देतीं, जिन्होंने किसी भी मुद्दे पर उनसे मतभेद जाहिर किए.


डा. राधेश्याम द्विवेदी ,
पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी ,
पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा,
Email: rsdwivediasi@gmail.com

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