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बाल सोम गौतम : सादर श्रद्धान्जलि 

बाल सोम गौतम(18 जुलाई 1928-20 नवम्बर 2016) का जन्म श्रावण शुक्ला द्वितीया संवत 1985 विक्रमी/18 जुलाई 1928 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के सल्टौआ गोपालपुर व्लाक के खुटहन नामक गांव के एक कुलीन परिवार में हुआ था। उनकी ससुराल टिनिच के पास शिवपुर में है और वे वहां भी रहते थे। जीवन के अन्तिम दिनों में टिनिच में रहते हुए उन्होने साहित्य की साधना की है।उन्होने गन्ना विभाग में सुपरवाइजर पद की नौकरी कर बस्ती बहराइच तथा गोण्डा जनपद में काफी भ्रमण तथा कार्य किया है। उन्होने ’’मौलश्री’’ नामक
बाल सोम गौतम
बाल सोम गौतम
मासिक पत्रिका का संपादन भी किया है। वे उच्चकोटि के गीतकार थे तथा देश के अनेक ख्यातित कवियों के सानिध्य में रह चुके हैं।  नवोदितों को प्रायः मार्ग दर्शन करते रहते थे। 20 नवम्बर 2016 को टिनिच बाजार स्थित सरस्वती सदन में उन्होने जीवन की अंतिम सांसे ली। बस्ती के राज्य मंत्री रामकरन आर्य कृत काव्य संग्रह ‘व्यथा’ के विमोचन के अवसर पर बाल सोम गौतम जी को अंग वस्त्र देककर अभी हाल ही में सम्मनित भी किया जा चुका है। समारोह में माननीय मंत्री जी ने अपने विचार और उदगार व्यक्त किये हैं। छंद सम्राट सतीश आर्य के संचालन में प्रो. माता प्रसाद पाण्डेय, अष्टभुजा शुक्ल, अनुभव प्रकाशन के पराग कौशिक, विनोद श्रीवास्तव, डा. प्रीती कौशिक, जन कवि शोभनाथ, दीन मोहम्मद दीन, डा. रामनरेश सिंह मंजुल, डा. रामनरेश सिंह ‘मंजुल’ सत्येन्द्रनाथ मतवाला, रहमान अली रहमान, लालमणि प्रसाद, के साथ ही अनेक कवियों, विचारकों ने अपनी रचनाओं और समीक्षा से जीवन जगत के महत्वपूर्ण बिन्दु उठाये।सपा नेता चन्द्रभूषण मिश्र के संयोजन में आयोजित कवि सम्मेलन और सम्मान समारोह में जमील अहमद, कपिलदेव सिंह मम्मू, फूलचन्द श्रीवास्तव, राजेश रमन आर्य, देवनाथ, गोविन्द, संजय पाण्डेय, संतराम आर्य के साथ ही अनेक कवि, रचनाकार, विचारक कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
बाल सोम गौतम का “तरुमंगल” एक लघु काव्य, जो अभी विगत दिनों प्रकाशित हुआ है, इसमें पर्यावरण से सम्बन्धित अनेक सरल गीतों का संकलन किया गया है। उन्होंने वैसे तो गीतों की बहुत बड़ी सीरीज लिख छोड़ी है। वह अनगिनत कविताओं के सुप्रसिद्ध रचनाकार रहे हैं। हम उनके पावन स्मृति को सादर नमन करते हैं । उनके कुछ की  एक-दो पक्तियां नमूना स्वरुप यहां प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हॅू।– 
‘‘ ये शाम और ऐ फूलों का मुरझाना देख उदासी क्यों,
 जब तय है होगी सुबह, खिलेंगे फूल हजारों नये-नये ।।’’   
‘‘ओ मन्दिर के नभचुम्बी शिखरासीन कलश, 
तुम बन्धु नींव के ईटों का सम्मान करो।।’’                                  
 “अब ना पपीहे का स्वर अच्छा लगता है।
 अब न भीड़ भौरे की अच्छी लगती है।                                         
 पकड़ लिया बाजार की जबसे गीतों ने। 
गाने से सौ कोस तबीयत भगती है।।’’                                                
“तेरे महलों की चहल पहल, तेरे बैभव की चमक दमक,                                                                             
मेरे खेतों में रोज सुबह भिखमंगिन बनकर आती है।।”


डा. राधेश्याम द्विवेदी ,
पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी ,
पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा,
Email: rsdwivediasi@gmail.com

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