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जीवन की परिभाषा

मैंने पूछा एक कली से , 
"आपके ख्याल मे जीवन की परिभाषा क्या हैं "
जीवन की परिभाषाकली मुस्काई और बोली  ,
"मेरे जीवन की तो यही परिभाषा हैं  ,
मैं दुःख मे भी सुख का अनुभव करती हूँ  ,
काँटे मेरे संग हैं फिर भी किसी से नहीं डरती हूँ 
जब बारीश की बूँदों की चोट मैं सहती हूँ  ,
शिकायत नहीं करती उससे नवयौवना सी रहती हूँ  ,
सर्द हवा कभी गर्म हवा के मैं  थपेडे खाती हूँ  ,
फिर भी नीडर होकर मैं खुशबू फैलाती हूँ  ,
जब कली से फूल मैं बन जाती हूँ  ,
तब तोड़ी और धागे मे पिरोई जाती हूँ  ,
जब मैं माला रूप मे प्रभू चरण मे चढ़ाई जाती हूँ  ,
जीवन के सारे दुःख भूल कर अपनी सार्थकता पाती हूँ ।"

यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।

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