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मेरी माँ

यूँ तो हूँ मैं बहुत बड़ी पर दिल से फिर भी छोटी हूँ , 
दुःख की घड़ी मे याद तुझे कर छूप - छूप कर माँ रोती हूँ ।

माथा चूमना तेरा मुझको खुशियाँ दे जाता था 
माँ
माँ 
तेरे हाथ का खाना माँ मुझको बहुत ही भाता था 
तुझसे बिल्कुल चिपक कर सोना याद मुझे तो आता है 
तेरा आलिंगन सर्द रात मे गर्माहट दे जाता था ।

काॅलेज से जब तक न लौटू दरवाजे पर खड़ी रही 
भूख कभी ना लगे मुझे तो खाना खिलाने अडी रही 
मेरे चेहरे की शिकन को पल मे भापती थी तू 
मुझे खुशी देने को जिद पर हमेशा बनी रही ।

तील के लड्डू मेरे लिए छीपा करके रखती थी 
गुड़ का चूरमा मेरे लिए झट से बनाती थी 
जीवन से मीठे की मिठास अब खो गई है माँ 
तू हर पल मे कैसे मिठास घोल जाती थी ।

तेरी सूरत देखने मे कई महिनें लगते हैं 
मायके के दिन तेरी वजह से मुझे सुहाने लगते हैं 
ससुराल मुझे ना भेजती तो तेरे साथ सदा रहती 
तेरे बिना एक - एक पल माँ मुझे जहर से लगते हैं ।

तुझसे कितना प्यार करूँ माँ शब्दों मे कह ना पाऊँ 
तेरे बिना जिंदा रहना पड़े तो मैं पहले ही मर जाऊँ 
संघर्ष बहुत किए जीवन मे अब तुझे हमेशा खुशी मिले 
फिर तेरी कौख से जन्म लू हर बार माँ तुझे पाऊँ ।

यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।

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  1. आपका बहुत अच्छा प्रयास, माँ के लिये तो जितना भी कहा जाये उतना कम हैं, माँ की परिभाषा कुछ अलग ही हैं.

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