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आज किस हक से

मुझे तुमसे मोहब्बत हैं कहूँ ये आज किस हक से ,
पुष्पा सैनी
पुष्पा सैनी
तड़पती हूँ दिल ही दिल मे कहूँ ये आज किस हक से ।
जमाने भर से मुश्किल है तुझसे दूर हो पाना ,
मगर मैं दूर जाती हूँ कहूँ  ये आज किस  हक से ।
मेरे सीने की धड़कन जो अकसर गूँजती तुझमे 
मेरे दिल मे  भी तुम धड़के कहूँ ये आज किस हक से ।
तेरी सांसों की डोरी से बंधी  हैं  सांस ये मेरी ,
मगर मैं आज मरती हूँ कहूँ  मैं आज किस हक से ।
सितम तुझपे जो टूटे  है वही मुझपे भी टूटे है ,
सह लेना तुम इनको  कहूँ मैं  आज किस हक से ।
तुम्हें कैसे  मैं भूलूंगी तुम्ही हर पल मे रहते हो ,
मुझे तुम  भूल जाना बस कहूँ  मैं आज किस हक से


यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।

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  1. एहसास झलकते हैं... छलकते हैंंंकुछ वास्तविकता लिए हुए.

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  2. पुष्पा जी, केवल इतना ही कहूंगा कि "तारीफ भी करूँ तो किस हक़ से."
    बहुत बहुत शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं

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