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हाइड्रोजन से चलने वाली पर्यावरण-मित्र ट्रेन : जर्मनी की कोराडिया आईलिंट

डॉ. शुभ्रता मिश्रा
जब भी विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया अविष्कार होता है, तब मानव सभ्यता दोगुना गौरवांवित अनुभव करती है। वैसे तो विश्व के वैज्ञानिक जाने कितने छोटे बड़े अविष्कारों और खोजों में दिनरात लगे रहते हैं और कितनी ही ऐसी खोजें होती हैं, जिनके बारे में लोगों को ज्यादा अभिरुचि भी नहीं रहती। लेकिन जब अविष्कार लोगों के दैनिक जीवन में परिवर्तन लाने वाले या यूं कहें कि उनके फायदे के होते हैं, तो सभी का ध्यान उसकी तरफ खुदबखुद चला जाता है। पिछले माह दिल्ली के प्रदूषण ने पूरे देश को चिंता में डाल दिया था और सभी इस दिशा में सोचने के लिए विवश होने लगे थे कि किस तरह पूरे देश में इस तरह का प्रदूषणयुक्त वातावरण न बन सके। क्योंकि आजकल हर व्यक्ति वातावरणीय प्रदूषण और उसके स्वास्थ पर पड़ने वाले खतरों से भलीभांति परिचित हो गया है। सभी जान गए हैं कि वातावरण में प्रदूषण फैलने के पीछे क्या कारण होते हैं। विश्व स्तर पर वातावरणीय प्रदूषण को लेकर सम्मेलन होना और एक सोच सामने आना इसके प्रति विश्व की प्रत्यक्ष चिंता को दर्शाता है।
कोराडिया आईलिंट
कोराडिया आईलिंट
ऐसे ही वातावरणीय प्रदूषण को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए जर्मनी ने एक ऐसी ट्रेन को अपने देश की पटरियों पर उतारने का निर्णय लिया है, जो पूरी तरह से पर्यावरण-मित्र है। जर्मनी में निकट भविष्य में हाइड्रोजन से चलने वाली और धुएं के स्थान पर भाप छोड़ने वाली ट्रेनें चलेंगी। इस समय वहां लगभग 4000 डीजल ट्रेनें चल रही हैं। इनके विकल्प के रुप में जर्मनी ने इनके स्थान पर हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना बनाई है। ये ट्रेनें कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन मुक्त होंगी और विश्व की अपनी तरह की पहली ज़ीरो एमिशन ट्रेनें साबित होंगी। जर्मनी की इस ट्रेन का नाम कोराडिया आईलिंट रखा गया है। इस ट्रेन को रेल परिवहन से सम्बंधित फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ऑलस्टोम ने बनाया है। यह कम्पनी वास्तव में 1928 में कोम्पगिन फ्रांसेस थॉमसन एवं सोसाइटी एलसेसिन डी कंस्ट्रक्शन्स मेकेनिक्स के विलय के परिणामस्वरूप बनी एक प्रतिष्ठित कम्पनी है, जो फ्रांस की यात्री परिवहन, सिग्नल, लोकोमोटिव इंजन, एजीवी, टीजीवी, यूरोस्टार, तीव्र गति की रेल आदि बनाने वाली कम्पनी के नाम से विख्यात है। इसी कम्पनी की पहल पर तैयार की गई विश्व की पहली हाइड्रोजन संचालित ट्रेन का उद्घाटन इसी साल सितंबर में जर्मनी में किया गया है। 
कोराडिया आईलिंट नामक जर्मनी में चलाई जाने वालीं ये ट्रेनें पूरी तरह कार्बन मुक्त होती हैं, क्योंकि ये
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
हाइड्रोजन गैस से चलती हैं और वायुमंडल में सिर्फ भाप का उत्सर्जन करती हैं। इन ट्रेनों में 94 किलो की क्षमता वाला एक हाइड्रोजन ईंधन टैंक लगा होता है, जो एक बार में 800 किलोमीटर का सफर तय कर सकता है। इस ट्रेन में एक बार में 300 यात्री सफर कर सकते हैं। ये ट्रेनें 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने में सक्षम हैं। जर्मनी के लोग अगले साल से हाइड्रोजन ट्रेन में सफर करने लगेंगे। जर्मनी ने इन ट्रेनों को हाइड्रेल नाम दिया है। हाइड्रेल पर्यावरण-मित्र होने के साथ साथ ध्वनिप्रदूषण भी नहीं फैलातीं क्योंकि इनसे निकलने वाली आवाज कम होती है। जर्मनी का दावा है कि हाइड्रेल ट्रेन का परीक्षण लगभग इस साल के अंत तक आरंभ हो जायेगा और यदि सभी परीक्षण सफल होते हैं तो दिसंबर 2017 से इस तरह की हाइड्रोजन ट्रेनें जनता के लिए जर्मन पटरियों पर दौड़ने लगेंगी।
जर्मन हाइड्रेल ट्रेन में एक हाइड्रोजन ईंधन टैंक उसकी छत पर लगाया जाता है, जिसके द्वारा ट्रेन को चलाने के लिए हाइड्रोजन मिलती है एवं ऑक्सीजन हवा से प्राप्त होती है। इन दोनों गैसों को बाद में इलेक्ट्रिक पावर में परिवर्तित करके ट्रेन चलाई जाती है। हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के इस मेल का बाकी परिणाम धुआं नहीं बल्कि साफ पानी होता है जो भाप के रूप में निकल जाता है। साथ में इस ट्रेन में काफी बड़ी लिथियम आयन बैटरियां भी लगाई जाती हैं जिसमें ट्रेन को दी जाने वाली उर्जा को भण्डारित किया जाता है और इन बैटरियों को हाइड्रोजन के ईंधन टैंक से ऊर्जा मिलती है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा काफी समय से द्रव हाइड्रोजन का ईंधन के रूप में उपयोग करती आ रही है। वास्तव में नासा इसका उपयोग रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए करती है। इन रॉकेटों के लांच के दौरान जो गुबार उठता है, वह धुएं नहीं बल्कि भाप का होता है। ठीक इसी तरह की प्रणाली हाइड्रेल ट्रेन में अपनाई गई है। 
पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करने की दिशा में जर्मनी द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय है। इसके बाद से नीदरलैंड, नार्वे और डेनमार्क जैसे देशों ने भी इस तरह की हाइड्रोजन ट्रेनों को अपने अपने देशों में चलाने का इरादा जताया है। सम्भव है कि इस तरह की ट्रेनों का प्रचलन बढ़ने पर भविष्य में भारत में भी हाइड्रोजन ट्रेनें पटरियों पर चलने लगें। वर्तमान में भारतीय रेलों को चलाने में प्रतिवर्ष लगभग 278 करोड़ लीटर से अधिक मात्रा में डीज़ल का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं बिजली से चलने वाले रेल इंजनों को चलाने में लगभग 1800 करोड़ इकाई बिजली खर्च होती है। जर्मनी की तरह भारत में भी लगभग चार हजार डीज़ल इंजनों  का इस्तेमाल हो रहा है और भारतीय रेलवे को ऊर्जा पर कुल खर्च का 80 प्रतिशत भाग बिजली और डीज़ल पर ही खर्च करना पड़ता है। अतः यदि भारत में भी हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों को चलाने का काम शुरू किया जाए, तो इससे जहां पर्यावरण को प्रदूषणमुक्त करने की दिशा में सार्थक कदम उठाया जाएगा वरन् डीज़ल और बिजली पर रेलवे विभाग भारी-भरकम खर्चे से भी बच पाएगा। भारत के साथ साथ अन्य देश भी यदि इसी तर्ज पर अपनी रेल व्यवस्थाओं को हाइड्रोजन ट्रेनों के चलाने की दिशा में सोचते हैं, तो निश्चितरुप से पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति की दिशा में होने वाला एक क्रांतिकारी वैश्विक परिवर्तन साबित हो सकेगा।  

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042,
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

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