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दलित रामलाल
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दलित रामलाल
गरीबी में जीता हुआ
अभावों को देखा
घर में भूखमरी थी
जी रहा था
सामाजिक बोझ को
सिर पर लादे
दलित

हालातों से लड़ रहा था
माँ बाप
छोड़ गये
बचपन में
घर की गठरी दे दिये
पाँच बहनों का बोझ
सिर पर लादे ढोता हुआ
गरीबी ने
नंगा कर रखा था
सारी आशायें
सब टूट चुकी थी
चारो तरफ से
अविश्वास की छाया
नजर आ रही थी

नहीं आशा रही
सरकारी मदद की
खेत बिक चुके थे
दिन रात
हाड़ तोड़ मेहनत से
दो जून की रोटी नहीं हो पाती थी
जवान बहनों की शादी
फटे पुराने वस्त्रों में
लिपटी रहती घर के अंदर
बाहर जाने लायक नहीं थी

कर्ज में डूबा
दलित रामलाल
असमय झुर्रियाँ  से भर गया था
कई दिनों से उदास
हँस न सका
नहीं जागा करूणा कहीं से

घर की देख हालात
बहनों ने थामा दामन
बन गई वेश्या
चोरी छुपे रात भर
ऐय्याशों के घर जाती
खूब लूटा लोगों ने
पर गरीबी न गई

हुआ हालात ऐसा
एक दिन आई भूखों मरने की
नहीं था घर में आटा,नून,तेल
सहते सहते बोझ एक दिन
खा लिया जहर
गरीबी से एक और मौत हुई
सरकार के खाते में
दर्ज हो गई
बीमारी से
दलित रामलाल की मौत

(2)

विधवा का जीवन
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विधवा
एक सामाजिक रोग है
कई सालों से
दशकों से
मजबूर होती
जवां स्त्रियाँ
हेय दृष्टि से
समाज में रहती हैं

मैंने देखा है
कई विधवाओं को
जीवन रूदन से भरा
सामाजिक प्रताड़ना झेलती
रोते कलपते
नहीं मिलता सहारा किसी का
कोई हाथ अगर उठा है
हवशी निगाह रही है उसकी
अस्मिता को तार तार करने वाले
बहुतेरे दयावान मिलते हैं
उसकी बदन को पाने के लिये
गढ़ते  हैं हमदर्द होने का रंग

विधवा होते ही
श्रृंगार के प्रसाधन
छीन लिये जाते हैं
एक धवल वस्त्र
पहनने के लिये
मजबूर करता यह समाज
उसे अलग ढंग से
जीने के लिये कहता है

श्रृंगार साधनों के प्रयोग से
सामाजिक प्रताड़ना
वह किसी पुरूष से
हँस कर बात नहीं कर सकती है
यह एक चरित्रहीन की
निशानी दे दी जाती है
रात दिन पहरे होते हैं
कहाँ आती है
कहाँ जाती है
वीभत्स ताड़ना

जीने के लिये
बच्चों के लिये
समाज में कार्य के लिये
जाना पड़ेगा ही
अंततः
एक चरित्रहीन करार
दे ही दिया जाता है
लेकिन नहीं देखता
उसकी जरूरते
बिन समाज का सहारा लिये
कैसे जी सकती है

ईश्वर द्वारा
दी गई
यह घोर अन्याय
एक हँसती खेलती जिन्दगी
मजबूर हो जाती है
सामाजिक प्रताड़ना झेलने के लिये

(3)

हे ईश्वर !
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हे ईश्वर !
कहाँ हो तुम
देखो
हाल मानव का
मारकाट मची है
दंग फसाद मचा है
जहाँ देखो
जयचन्द प्रजापति 'कक्कू जी'
जयचन्द प्रजापति 'कक्कू जी'

वहीं लूटती नारियाँ
घर घर कलह मची है
छूट गया पीछे
यह संसार
जब से संस्कार खत्म हुआ

माँ बाप रो रहे हैं
रोटी बच्चों से माँग रहे हैं
कैसी लीला है
घोर कलयुग आया है
बहुरंगी दुनिया
काट रहा गायों को
नर खा रहा है
नर का ही माँस
लूट रहे हैं
अपनी ही माँ को
बेच रहे हैं
अपनी ही बहन को
कैसा अंधा मोढ़ आया है

देखो अपने बच्चों को
हे ईश्वर !
कैसा सोंच संसार बनाया
कैसा कैसा रार मचा है
गोली सीने पर चल रही है
भ्रष्टाचार से
जनता त्रस्त है
लूट रहे हैं
सरकारी खजाना
बेंच रहे हैं देश अपना
खा खाकर मुर्गी मुर्गा
कैसा प्रलय आया है

दया धरम बेंच रहे हैं
राजनीति के दाँव में
भीख माँग रहा है
सच्चा जन
रो रहा साधु महात्मा
बिगड़ गई है
सारी व्यवस्था
मंदिर मस्जिद की आड़ में
खेल रहे हैं
जमीं के लिये होली
कितना भयंकर आर्तनाद
आह मेरे ईश्वर

कब होगा अवतार
फिर से तुम्हारा
कब नंगा रूप हटेगा
कब सुंदर रूप सजेगा
कब आयेगा
फिर से मंगलमय
बता मेरे मालिक
देर न कर नहीं तो
बिक जायेगें
बचे खुचे सज्जन भी
मेरे इसी जनम में आना
मैं भी कुछ पापी हो गया हूँ
धुलना चाह रहा हूँ
स्वयं को


यह रचना जयचंद प्रजापति कक्कू जी द्वारा लिखी गयी है . आप कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं . संपर्क सूत्र - कवि जयचन्द प्रजापति 'कक्कू' जैतापुर,हंडिया,इलाहाबाद ,मो.07880438226 . ब्लॉग..kavitapraja.blogspot.com

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