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नारी का बौद्धिक विमर्श

- डॉ. शुभ्रता मिश्रा
“यत्रनार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता”। यह संस्कृत उक्ति हमारे यहाँ अक्सर सुनने में आती है। मैं जब भी इस उक्ति को पढ़ती या सुनती हूँ, तब दो प्रश्न सामने उभरते हैं, पहला यह कि नारी के पूजने से सिर्फ देवता ही क्यों रमण करेंगे और दूसरा यह कि नारी को पूजनीया की परिसीमाओं में बाँधकर क्या उसकी बौद्धिकता का शोषण नहीं किया गया हैॽ
नारी को बौद्धिकता के साथ देखने की परम्परा प्रायः कहीं भी मिलती ही नहीं है। ऐसा कदापि नहीं है कि नारी में
नारी
बुद्धि नहीं होती या कि वे बौद्धिक स्तर पर कमतर होती हैं। यह अवश्य कहा जा सकता है कि हर क्षेत्र में नारी को अपनी बौद्धिकता स्थापित करने में संघर्ष बहुत करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि प्रारम्भ से ही पुरुषप्रधान समाज नारी की बौद्धिकता  को सहज भाव से स्वीकार करने का अभ्यस्त नहीं रहा है। यह भी उतना ही सच है कि नारीजाति ने भी स्वयं की बौद्धिकता के साथ न्याय नहीं होने दिया है। वैदिक साहित्य में अनेक विदुषी नारियों का जिक्र हुआ है और उनमें विदुषी घोषा का नाम आता है, जिनकी मनीषा का लोहा अश्विनी कुमारों ने भी माना था, परन्तु घोषा ने जब पहली बार संबोधित किया तो पहला वाक्य बोला कि ‘हे अश्विनी कुमारो, मैं ज्ञान बुद्धिहीना नारी हूं।’ ऐसा बोलकर घोषा ने अश्विनी कुमारों के अहम् को तुष्ट कर दिया और स्वयं को सिद्ध करके भी प्रमाणित नहीं होने दिया।
वैदिककाल से आज तक नारियां यही करती आईं हैं और वह एक परम्परा बन गई है। इस परम्परा को बनाने की पृष्ठभूमि में भी कहीं न कहीं नारी की बौद्धिकता छिपी है, क्योंकि वे जानती थीं कि यदि वे ऐसा नहीं करेंगी तो बुद्धि के क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाएंगी। उन्होंने प्रवेश किया और वो सब कुछ करके दिखाया, जिनके लिए उनको अक्षम समझा गया था, परन्तु वे कभी स्थापित नहीं हो पाईं। नवजात बालिका से लेकर वृद्ध मां तक के प्रत्येक स्वरुप में नारी आज भी प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से अपमानित, उपेक्षित, प्रताड़ित और बहुधा दंडित होती रहती है। ये सभी पीड़ादायक शब्द सभी नारियों के लिए हैं, समाज में एक व्यक्ति यदि एक नारी की बौद्धिकता को मान रहा है, तो कहीं न कहीं वह दूसरी किसी नारी को मूर्ख भी समझ  रहा है, तब नारी के प्रति उसका दृष्टिकोण संशय पैदा करता है। एक ही घर में यदि रिश्तों की मर्यादाओं के कारण मां, बहन, पत्नी और बेटी के प्रति दृष्टिकोण सम्मान का है, तो दूसरी नारियों के प्रति परिहास की सीमाएं लांघना नारी की बौद्धिकता के अपमान का एक दूसरा पहलू है। सम्मान के दृष्टिकोण में भी नारी की बौद्धिकता कहीं नहीं होती, वरन वह वहां पूजनीया की श्रेणी में आ जाती है। पूज्य होने के लिए बुद्धि की आवश्यकता अनिवार्य नहीं है। पूजनीया नारियाँ प्रायः मौन की प्रतिमूर्ति होती हैं, जिनको सम्मान सर्वत्र मिलता है, पर उनकी बौद्धिकता स्थिर रहती है। वे दैवीय स्वरूप के कवच में स्वयं को सुरक्षित कर लेती हैं।
नारी को उर्जा, धैर्य, सौन्दर्य, संयम तथा सहनशीलता जैसे उत्कृष्ट मानवीय गुणों की देवी के रुप में समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए भागीदार कहा जाता है। नारी को शक्ति के रुप में मानकर उसकी परिवार से लेकर राष्ट्र
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
निर्माण तक में उसके अनुपम योगदान की प्रशंसा की जाती है। इन सभी सद्गुणों में बौद्धिक विमर्श कहीं हाशिए पर चला जाता है।
वर्तमान आधुनिक युग में नारियों ने हाशियों की सीमाओं को लांघकर आधुनिक विशुद्ध बौद्धिक स्वरुप को उभारना प्रारम्भ किया है। विशुद्ध बौद्धिक नारी में वे सभी गुण गौण हो जाते हैं, जिनके कारण समाज में देवता रमण कर सकें। नारियों के बौद्धिकता का स्तर बहुत ऊँचा हुआ है, लेकिन सम्मान बौद्धिकता के पैमाने पर नहीं मिलता। आज भी संघर्ष की सीढ़ियां चढ़नी ही पड़ती हैं। अनेक देशों की राष्ट्राध्यक्ष नारियां हैं, भारत के राज्यों की राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी नारियां हैं, तो उनके प्रशासन में लोगों को काम करना होता है, क्योंकि प्रशासनिक प्रतिबद्धता बन जाती है, लेकिन उनकी बौद्धिकता को स्वीकार करने में हिचकिचाहट होती है। इसे स्वीकार करना भी बड़ा मुश्किल होता है, सामने अभिनय करना होता है और पीठ पीछे दो चार अपशब्द बोले बिना स्वयं को रोक भी नहीं पाते।
हांलाकि सदियों के बाद अब कहीं जाकर जब आधुनिक बालाओं ने घोषा की परम्परा को तोड़ने का प्रयास किया है, तो शायद वे स्वयं की बौद्धिकता को स्थापित करने के साथसाथ उसे प्रमाणित भी कर सकेंगी। सम्भवतः इसमें शताब्दियां नहीं लगेंगी, क्योंकि दैवीय कवच के अंदर की मौनमूर्तियों ने भी आधुनिक नारी के बौद्धिक स्वरुप को सामाजिक परम्पराएँ तोड़ने की स्वीकृति दे दी है। तथाकथित अमर्यादित व्यवहार के साथ वे स्वयं की बौद्धिकता को स्वयं के अहम् से तुष्ट करना सीख रही हैं। हाँ पुरुष समाज को अभ्यस्त होने में जितना समय लग जाए, क्योंकि नारी की विशुद्ध बौद्धिकता को स्वीकार करने में उनको नारी में स्वयं के विकल्प ढ़ूढ़ने पड़ेंगे। 


डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042,
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

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