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सजदा

कभी जब तुम से मिलती थी निगाहें शरमा जाती थी ,
पुष्पा सैनी
पुष्पा सैनी
तेरी मौजूदगी से दिल की धड़कन दौड़ जाती थी ।
तेरी बेबाक सी बातें हमें तो याद आती हैं
कभी जब तुम से मिलती थी जुबा ये लड़खडाती थी ।
फलक से चाँद तारे तुम कैसे तोड़ लाते थे
कभी जब तुमसे मिलती थी तबीयत जगमगाती थी ।
कदमों के फासले तेरे दिलों मे आ नहीं पाते
कभी जब तुम से मिलती थी दूरियाँ मिट ही जाती थी ।
तेरे अहसास से रोशन मेरे जीवन का हर कोना
कभी जब तुम से मिलती थी खुद को मैं भूल जाती थी ।
चंदन से भी तुम शीतल ओस की बूँदों से निर्मल
कभी जब तुमसे मिलती थी पाकीजगी खुद मे पाती थी ।
खुदा की नैमते ही थी मोहब्बत मिल हमें पाई
कभी जब तुम से मिलती थी सजदे मे झुक ही जाती थी ।


यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।

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