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अलविदा

प्रज्ञा की आँखें नीले आसमान को एकटक तक रहीं थी ।उसके पास मैं बैठा था लेकिन उसने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा ।तभी उसे ओर ठंड महसूस हुई तो उसने अपने से लिपटी शाल को ओर लिपटा लिया ।मैंने उसे नीचे चलने को कहा लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और न चलने के लिए उठी शायद वो कुछ देर ओर छत पर बैठना चाहती थी ।उसकी नजरें आसमान मे उड़ते परिंदों पर लगी थी और मेरी उस पर ।
                  क्या यह वहीं प्रज्ञा है जिसकी चंचलता और वाकपटुता मुझे खींजा देती थी ।बंद करो ये बचपना कहकर मैं जब तब उसे डांट फटकार देता था ।जब प्रज्ञा से शादी हुई थी तब वो अपने साथ लाई थी हजारों रंग ।फुर्सत के पलों मे पेंटिंग करना उसका शौक था ।वो इन रंगों मे ही अपने आपको मशरूफ रखती ।मेरे पास वक्त भी कहा था उसके लिए ।रूपय कमाने मे और औरों से आगे निकलने की होड़ मे कब मैं उससे दूर होता चला गया पता ही नहीं चला ।मैंने उसे हमेशा अनदेखा किया और बदले मे उसने मुझे प्रेम दिया और मैंने उसकी मासूमियत को उदासी मे तब्दील कर दिया ।
कैनवास                 शाम को घर लौटता था तो चहकते हुए कहती थी नलिन चलिए मैंने नई पेंटिंग बनाई है ।मैं हमेशा बाद मे देखूंगा कहकर टाल देता था ।वह मेरी सभी ख्वाहिश पूरी करती थी , सभी जरूरतों का ख्याल रखती थी लेकिन दूसरी तरफ उसकी कला मेरी नजरें इनायत को तरसती रहती थी ।उसके सृजनात्मक गुणों को कभी तरजीह ही नहीं दी मैंने ।जैसी चंचल वह दिखती थी उससे परे वह एक परिपक्व शख्सियत थी ।
                   उसने पेंटिंग करने के लिए अलग एकांत मे कमरा सजा रखा था , जिसे वो कैनवास रूम कहती थी ।मैं कभी उस कमरे मे जाता ही नहीं था और अब प्रज्ञा भी नहीं जाती ।पता नहीं उसका यह नैराश्य कैसे दूर होगा ।उसकी जिंदगी मे अहम शख्स मैं था और मैंने ही उसे कभी जानना व समझना नहीं चाहा लेकिन मैं अब अपनी तमाम गलतियाँ सुधारना चाहता हूँ ।
                  मुझे याद है जब पहली बार उसने अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी की खबर दी थी , कितनी चमक थी उसकी आँखों मे ।तीन साल के साथ के बाद भी मैंने उसकी पेंटिंग उसी प्रदर्शनी मे देखी थी ।उसकी कृतियों मे तमाम रंग थे ।खुशी के - गम के ,उम्मीद के - इंतजार के , मुफलिशी के - शान के , स्वछन्दता के - गुलामी के , प्रकाश के -अंधकार के , वैराग के - प्रेम के , जुदाई के - अगवाई के और भी न जाने कितने ।उसके हाथ तराशना जानते थे , अनगढ नहीं थे ।किसी भी चित्र मे कृत्रिमता नहीं थी सिर्फ मौलिकता थी , उसी की तरह ।प्रदर्शनी देखने आए लोग उसकी तारीफों के पुल बांध रहे थे ।वह खुश थी लेकिन आँखों मे उदासी झांक रही थी ।
पुष्पा सैनी
पुष्पा सैनी
 मुझे उसकी पेंटिंग अच्छी लगी लेकिन तारीफ करना जरूरी नहीं समझा ।उसके बाद प्रज्ञा को दूसरे शहरों से प्रदर्शनी के अवसर मिलने लगे लेकिन उसने मना कर दिया ।मैं देख रहा था वह दिनों दिन उदास और बीमार रहने लगी ।
                        तभी प्रज्ञा नीचे चलने के लिए उठी तो मेरी तंद्रा भंग हुई ।वह रात को बस दो निवाले खाकर बिस्तर पर चली गई ।मैंने उससे एक बार कैनवास रूम मे चलकर कुछ वक्त बिताने को कहा लेकिन उसने मना कर दिया ।
                   अगले दिन मुझे आॅफिस के काम से नैनीताल जाना था ।इसलिए मैंने मैरी से उसकी ठीक से देखभाल करने को कहा और प्रज्ञा को बाॅय बोलकर चला गया ।रात को मुझे आने मे काफी देर हो गयी ।मैंने मैरी से प्रज्ञा का पूछा तो उसने बताया मैडम आज शाम से ही कैनवास रूम मे हैं ।यह सुनकर मेरी आँखों मे चमक आ गई , लगा अब सब ठीक हो जाएगा ।मैंने अपना ब्रिफकेश सोफे पर रखा और सीधे कैनवास रूम मे गया , जहाँ प्रज्ञा आँखें बंद किए कुर्सी पर बैठी थी ।मुझे लगा प्रज्ञा सो गई है लेकिन जैसे ही मैंने उसे उठाने की कोशिश की तो पता चला वह हमेशा के लिए सो गई है ।उसके हाथ मे ब्रश था और कैनवास पर लिखा था अलविदा ।

यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।

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