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     'आरक्षण... 👹 !!!'
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सुबह-सुबह...
भ्रमण को जा रहे थे हम
तभी सड़क किनारे से किसी के
कराहने का स्वर उभरा
नजर उठाई तो देखा 
कोई बेबस तोड़ रहा था दम

जाकर करीब उसके
मुंह पर पानी जो छिड़का 
डॉ इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
आँख खोल उसने हमको देखा
पूछा कि क्यों यहां इस तरह पड़ी हो ?
क्या नाम हैं तुम्हारा, 
किसने हैं तुमको मारा ?

मुश्किल से जोर लगा
उसने ये कहा कि
नाम हैं मेरा *'योग्यता'*और
*'आरक्षण'* नाम के गुंडे ने हैं
मुझको बेदर्दी से पीटा
लड़ते-लड़ते उससे 
आखिर मैं पिछड़ गयी
होकर के बेदम यहां पर हूँ पड़ी
अब तुम बताओ तुम कौन हो ?
जिसने हैं मुझको बचाया

मुस्कुरा मैं ये बोली
नाम हैं मेरा *'आशा'* जिस पर
ये धरती टिकी हुई हैं
भूखे पेट भी लोगों की 
हिम्मत बनी हुई हैं
फल की न इच्छा कर दुनिया
काम में जुटी हुई हैं
तुम तो हो इतनी काबिल
फिर क्यों निराश हो रही हो ?
क्यों दूसरे की ख़ातिर 
जान तुम अपनी दे रही हो ?

चलो उठो... खड़ी हो...
नई उम्मीदों के साथ कर्मरत हो
न यूँ होकर उदासीन 
जीवन से मुंह मोड़ो तुम 
मिलेगी तुम्हे सफलता 
न यूँ हारकर तकलीफों से
दुनिया को तुम छोड़ों

पाकर साथ *'आशा'* का
*'योग्यता'* फिर से जी उठी 
होकर खड़ी वो अपने पैरों पर 
हंसती-मुस्कुराती खिलखिलाती 
पूर्ण आत्मविश्वास के साथ 
*'आशा'* संग आगे बढ़ चली ।।

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*सुश्री इंदु सिंह 'इंदुश्री'
नरसिंहपुर

०२.

'निशाने पर हर कोई...
गिद्ध दृष्टि से न बचा कोई... !!!'
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बड़ी देर से
बड़ी दूर से
ताक रहा था जो
एक 'कुत्ता' था वो

बड़ी नादान
बड़ी अंजान
बेखबर इस बात से
खेल रही थी जो
एक 'गिलहरी' थी वो

आखिरकार...
एक लंबी प्रतीक्षा के बाद
हुई सफल साधना जिसकी
'कुत्ता' था वो
गंवा बैठी अपनी जान जो
'गिलहरी' थी वो

माना कि
छोटी सी, नन्ही सी
भोली-भाली और नासमझ
'गिलहरी' थी वो
तो बच न सकी घात से
मगर, जो बड़ी हैं
सब कुछ समझती हैं
क्या बच पाती वो ???

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*सुश्री इंदु सिंह 'इंदुश्री'
नरसिंहपुर

०३.

यादों का चक्रव्यूह...
    बेध न सके अर्जुन... 🎯 !!!
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चक्रव्यूह यादों का 
तोड़ना जिसे
आसान नहीं होता
कि कोई 'द्रोण' 
इसे सीखा नहीं सकता
और कोई हो
भले 'अर्जुन' सा दक्ष 
मगर, इसे बेध पाना तो
उसके वश का भी काम नहीं 
कि ये अपने भीतर ही
कैद कर लेता शिकारी को
उसे मौका ही नहीं देता
हथियार उठाने या हमला करने का
हर कोई पराजित इसके आगे
हो भी क्यों न ???
ये तो बना होता महीन
दिल को छूने वाली स्मृतियों से 
जिन्हें कोई कमबख्त
तोड़ना चाहता भी तो नहीं ।।

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सुश्री इंदु सिंह 'इंदुश्री' 
नरसिंहपुर

०४.

         'दस्तक... 🚪!!!'
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दी तो थी उसने
इनबॉक्स में दस्तक
लेकिन जाकर लगी सीधे
नाज़ुक दिल पर
फिर इनबॉक्स के जरिये
जो पट खुले तो
संदेशों में लिखे शब्दों से
वो भी समाते गये अंतर में कहीं
तकनीकी युग ने तो
आँखों से आँखों का वो
मिलना-झिझकना, सकुचाना
और हौले-हौले हृदय की
रगों में घुलते जाने का
वो कोमल अहसास ही मानो
छीन लिया हो जैसे
कि अब तो प्रेम कहानियाँ
इनबॉक्स में ही जनम लेती और
फिर वहीं दम तोड़ देती
कि नेटवर्क की तरंगें
सिर्फ शब्दों को ही
सुदूर प्रसारित कर पाती
पर, उनसे लिपटी भावनायें
वो किसी को भी छू नहीं पाती
तो जब भी देना दस्तक
ज़िंदगी के कपाट पर ही देना
इनबॉक्स तो बदलते रहते ।।

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सुश्री इंदु सिंह 'इंदुश्री'
नरसिंहपुर

०५.

             'संपति... 👜 !!!'
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एक तरफ...

लॉकर
तिजोरी और
तहखाने में छिपाकर
रखते लोग अपनी 
बेजान संपत्ती
फिर भी निश्चिंत न होते
डर बना ही रहता
जबकि वो यदि 
चोरी हो भी जाये तो
दुबारा कमाई जा सकती ।

तो दूसरी तरफ़...

मज़दूर
किसान और
निर्धन अपनी अनमोल
जीती-जागती संपत्ति को भी
यूँ ही खुलेआम रखते
फिर भी बेफिक्र रहते जबकि
वो यदि कभी चुरा ली जाये तो
फिर दुबारा उसे कमाना
मुमकिन नहीं होता ।

कोई भी संपत्ति
केवल कीमत से ही
मूल्यवान नहीं कहलाती
जो भी खोकर
फिर से न पाई जा सके
जिसकी कीमत किसी भी 
धन-दौलत से न आंकी जा सके
वो हर अहसास, हर रिश्ता
दुनिया में सबसे कीमती
अफ़सोस, कि हम 
चीजों की तो हिफाज़त करते
पर, इन बेशकीमती संवेदनाओं को
कहीं सुरक्षित नहीं रखते 
जो न तो बाज़ारों में बिकते और
न ही कहीं से खरीदे जाते 
शायद, तभी हम इनकी उतनी
कदर नहीं करते कि
मुफ़्त में मिलने वस्तुओं को
फ़िज़ूल समझ लेना
हमारी आदत में शुमार ।।

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सुश्री इंदु सिंह 'इंदुश्री'
नरसिंहपुर
यह रचना डॉ इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’ जी द्वारा लिखी गयी है .आप नरसिंहपुर (म.प्र.) से हैं . आप व्याख्याता (कंप्यूटर साइंस) के रूप में कार्यरत हैं . आपकी ‘सारांश समय का’(साँझा काव्य संग्रह), कविता अनवरत-3 (साँझा काव्य संग्रह), काव्यशाला(संयुक्त काव्य संकलन), साज़ सा रंग(साँझा काव्य संग्रह), सिर्फ तुम(साँझा कहानी संग्रह), भावों की हाला (सयुंक्त काव्य संकलन) विभिन पत्र-पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों में कविता / कहानी / आलेख और रचनायें प्रकाशित तथा '100 कदम' एवं 'शब्दों का प्याला' शीघ्र प्रकाशित होने वाले साँझा काव्य-संग्रह आदि प्रकाशित हो चुके हैं . आपको निम्न सम्मान प्राप्त हो चुके हैं -
सम्मान :
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★ ‘विद्या वाचस्पति’ विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर (बिहार) द्वारा ।
★ ‘वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई साहित्य गौरव सम्मान अखंड भारत परिवार, नई दिल्ली द्वारा ।
★ ‘साहित्य गौरव’ वर्तिका साहित्य परिषद, जबलपुर द्वारा ।
★ 'साहित्य नवचेतना सम्मान' अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा ।
★ साहित्यिक सेवा हेतु माँ भारती मानव सेवा संस्था, नरसिंहपुर द्वारा सम्मानित ।
संपर्क सूत्र - ई-मेल : singh_indu2008@yahoo.com . लिंक : 
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  1. इन्दु जी,
    बहुत बढ़िया रचना,
    आज कल सब तरफ आरक्षण की हवा काफी जोरोसे चाल रही हैं.

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