पिंक : फिल्म समीक्षा

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सदी के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन साहब को वकील के काले कोट में संवाद बोलते देखने के लिए इंतज़ार था

"नो मीन्स नो", "नहीं मतलब नहीं", लड़कों को ना सुनने की आदत डालनी होगी: फ़िल्म "पिंक" की समीक्षा:
"नो मीन्स नो", "नहीं मतलब नहीं", लड़की की ना को ना ही मानना।
ये बात समझना, लड़कों के लिए ज़रा मुश्किल है, लेकिन ये ही सत्य है, उन किवंदतियों से लड़कों को निकल जाना चाहिए जिनमें कहा जाता है कि "इश्क़ में, इन्कार में भी हाँ छिपा होता है"।

"ना" का मतलब "ना" ही होता है, "ना" सिर्फ़ एक शब्द नहीं बल्कि एक वाक्य होता है, "ना" अपने आप में इतना मज़बूत होता है कि इसे किसी भी व्याख्या, एक्सप्लेनेशन या तर्क-वितर्क की ज़रूरत नहीं होती "ना" को ज़बरदस्ती "हाँ" में नहीं बदला जा सकता।
जिस फ़िल्म का जितना ज़्यादा इंतज़ार होता है, उससे अपेक्षाएँ उतनी ही ज़्यादा बढ़ जाती हैं। सदी के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन साहब को वकील के काले कोट में संवाद बोलते देखने के लिए इंतज़ार था और साथ ही "विक्की डॉनर", "मद्रास कैफ़े" और "पीकू", जैसी फ़िल्मों के निर्देशक "शूजित सरकार" का यहाँ प्रोड्यूसर के तौर पर फ़िल्म से जुड़ा नाम भी मुझे और बाकी दर्शकों को सिनेमा की ओर खींचने में सहायक रहा। एक और ख़ास बात इसका ट्रेलर था, जिसमें फ़िल्म का मुद्दा भी स्पष्ट हो गया था, ऐसा मुद्दा जो आजकल हर लड़की,
पिंक
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लड़के और लगभग हर शख़्स के दिमाग में चल रहा है लेकिन निष्कर्ष नहीं निकल पाता है।  फ़िल्म का निर्देशन अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने किया, निर्देशन में उनकी पकड़ कमाल की रही।

कहानी और पटकथा "रितेश शाह" ने लिखी है, बहुत सटीक और संयम से आगे बढ़ती हुई कहानी है, संवाद और दृश्य सधे हुए हैं, कई जगह कहानी झूलती भी है और खासकर आखिर में बहस के बाद जज़ का निर्णय थोडा पचता कम है, हालांकि इमोशनल और संदेशात्मक तौर पर तो ठीक है लेकिन, मुद्दों, तथ्यों और बहस को देखा जाए तो ऐसा लगा जैसे फ़िल्म को निबटाने की जल्दी है। फ़िल्म का अंत भी कुछ तथ्यों और उदाहरणों के साथ होता तो शायद दर्शक और ज़्यादा स्पष्टता घर लेकर जाता।

फ़िल्म का मुख्य मुद्दा "लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से जीने पर पुरुष प्रधान समाज की दकियानूसी सोच को झेलना और लड़कियों का चरित्र निर्धारण ऐसे लोगों द्वारा करना, जो ख़ुद अपना चरित्र नहीं संभाल पाते हैं" है।

संक्षिप्त प्लॉट इस प्रकार है,
"तीन लड़कियों का किसी कॉन्सर्ट पार्टी में तीन अन्जान लड़कों से मिलना, कुछ ही घंटों में दोस्ती-यारी,जान-पहचान होना, लड़कों के कहने पर ड्रिंक-डिनर के लिए किसी रिसोर्ट में जाना, वहाँ खाना-पीना, हंसी-मज़ाक करना, "माँसाहारी जोक्स" सुनना-सुनाना हुआ और जब सब लोग शराब में मशग़ूल हो चुके थे, तब एक लड़का आगे बढ़ा, लड़की ने उसे रोका, लड़के ने ज़बरदस्ती की, लड़की के मना करने और लड़के को उसकी हद बताने के बाद भी लड़के ने ज़ोर-ज़बरदस्ती की  तो लड़की ने कांच की बोतल उठाकर लड़के के सिर पर दे मारी और तीनों भाग गई।
उसके बाद लड़कों और लड़कियों में माफ़ी मांगने की बात पर अड़ जाना, बात पुलिस तक आ जाना, फिर लड़कों, पुलिस वालों, नेताओं और व्यवस्था का पुरुष मानसिकता वाला चेहरा दिखाना और लड़कियों का मुश्किल में पड़ जाना।
फिर एक बूढ़े, बायोपोलर डिसऑर्डर से ग्रस्त वकील दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) का लड़कियों की तरफ़ से केस लड़ना, समाज, भ्रांतियां, मानसिकताओं पर कटाक्ष साधते हुए कहानी को आवाज़ उठाना, इस तरह पूरी तरह से फ़िल्म का एक कोर्ट रूम ड्रामा में तब्दील हो जाना।"
ये बहुत रोचक और दिलचस्प रहा। आगे की कहानी और अंत तो सिनेमाघर में जाकर ही देखिए।

संवाद फ़िल्म की जान है,

अमिताभ का ये कहना कि
"किसी भी लड़की को किसी रिसोर्ट और किसी टॉयलेट में किसी लड़के के साथ नहीं जाना चाहिए, क्योंकि लोग ये ही समझते हैं कि लड़की विल्लिंगली आई है और उस लड़के के पास कुछ भी करने को लाइसेंस मिल गया है।"
और
"किसी भी लड़की को किसी लड़के से हँस कर बात नहीं करनी चाहिए, बात करते हुए किसी को टच नहीं करना चाहिए, इससे उस लड़की का ये बेसिक नेचर और फ्रैंकनेस लोगों का उनका चालू होना घोषित कर देगा।"

आखिर में अमिताभ बच्चन की क्लोजिंग स्पीच भी कमाल रही, जैसी कि उम्मीद थी, अंत से मैं निराश रहा, अंत सुकून भरा हो सकता है लेकिन, कई प्रश्न छोड़ जाता है। ख़ैर प्रश्न छूटना कई बार अच्छा भी होता है, ये ज़रूरी नहीं कि फ़िल्म कोई निर्णय ही बताए, अगर मुद्दे को ठीक से स्पष्ट भी कर दे तो निर्णय लेने की क्षमता लोगों में बढ़ जाती है। यही सिनेमा का परम ध्येय भी है।


फ़िल्म की मार्केटिंग बहुत अच्छी रही थी,

भारतीय हिन्दी फिल्मों के सदाबहार अभिनेता अमिताभ बच्चन को लेकर बनी फ़िल्म शूटिंग के पहले दिन से सुर्ख़ियों में आना शुरू हो जाती है और ख़ास बात ये होती है कि इस बार निर्देशक उनसे क्या काम करवाता है, किस किरदार को जीवंत करने को उनको सौंपने वाला है। दूसरी बात ये कि, अभी कुछ दिनों पहले अमिताभ बच्चन ने अपनी पोती और नातिन के नाम एक खुला पत्र भी लिखा, जिसमें उन्होंने उनको अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िन्दगी लिखने की बात कही, सो कॉल्ड पुरुष प्रधान समाज के ठेकेदारों को ये निर्णय देने की बात नहीं कि "कौन लड़की चरित्रहीन है और कौन नहीं।" लड़की के चरित्र को उनकी स्कर्ट की लंबाई से तौलने वाले समाज के ठेकेदारों को अमिताभ बच्चन जी ने बहुत कोसा। हालांकि उस ख़त को सिर्फ़ फ़िल्म का प्रमोशन और मार्केटिंग करने का हथकण्डा बताया गया लेकिन फ़िल्म देखकर ये लग गया कि अगर इस तरह का किरदार उन्होंने निभाया है तो निश्चित ही उन्होंने सोच समझकर और कुछ सुधारने के लिए वो पत्र लिखा होगा।

फ़िल्म शुरू से अंत तक दर्शकों को पकड़कर रखती है,

पहला दृश्य ही भारतीय सिनेमा के अब तक के चले आ रहे एक ख़ास और ठोस विचार को तोड़ता है जब दो लड़के एक सिर फूटे लड़के को हॉस्पिटल ले जा रहे होते हैं, एक दोस्त बोलता है, "छोड़ेंगे नहीं उस लड़की को, ऐसा कैसे कर सकती है", दूसरी तरफ़ तीन लड़कियाँ कार में अपने घर जा रही होती है, जो डरी-सहमी हैं क्योंकि उनमें से एक के हाथों से ये हादसा हो गया था।

बहुत कुछ अपने आप में अलग यहीं से हो जाता है, क्योंकि अब तक ज़्यादातर यही देखा गया है किसी भी फ़िल्म या समाचार में कि "किसी औरत की पिटाई मर्द ने की है और औरत ही लहूलुहान है",
लेकिन लड़की भी लड़के के साथ ऐसे कर सकती है, ये कुछ अलग था, सुकून तो नहीं लेकिन कुछ बदलाव की भीनी सी ख़ुशबू का अहसास तो हो ही रहा था।
जो कि सिनेमा में स्त्रियों को लेकर अब तक हुई अपेक्षाओं के दर्द पर मरहम का काम करता है और आगे के लिए उम्मीद भी जगाता है।

अमिताभ का तापसी पन्नू को गार्डन में एक्सरसाइज करते हुए देखना और जब अमिताभ की आँखें कैमरे पर ठहरी हो और वो शॉट "क्लोज अप" हो तो कोई भी हड़बड़ा जाए और तापसी का सहमे से चेहरे से वहां से चले जाना, और फिर से तापसी के घर के बाहर आकर उसकी बालकनी में अमिताभ का देखना, कुछ रहस्य तो पैदा
संदीप श्याम शर्मा
करता है लेकिन जल्दी ही वो रहस्य ख़त्म हो जाता है, मुझे उन शॉट्स और दृश्यों की योजना और उपयोग समझ नहीं आया, ख़ैर इससे अमिताभ के किरदार और उनके मूड स्विंग होने की जानकारी और अनुभव तो दर्शकों को मिल ही जाते हैं।

इस तरह के कई तथ्य हैं जो अस्पष्ट हैं और कभी कभी अखरते हैं और सोचने पर मज़बूर करते हैं। ख़ैर उनसे कहानी और गति पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

पुरुष प्रधान समाज की कुछ बातें अखरी मुझे, और शायद हर आदमी इस बारे में सोचता ही होगा, लड़कों का लड़कियों के लिए कहना कि,
"वो लड़कियाँ वैसी है", "वो लड़कियाँ ठीक नहीं हैं",
मुझे ये समझ नहीं आता "कैसी लड़कियाँ हैं वो", जिनके साथ वो लोग पार्टी कर सकते हैं, ज़बरदस्ती से किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं और जब लड़कियों ने एक हद तक जाकर मना कर दिया तो उन लड़कों को ये गवारा नहीं है, वो उन्हें सीधे "प्रॉस्टिट्यूट" की केटेगरी में ले गए। लड़कियों को धमकाना, गाली देना। ये बात अखरती है।

उधर पुलिस का ये कहना कि "धमकी-गाली क्या चीज़ है, फ़्री की गई, ले लो" और पुलिस का ये कहना कि "रिपोर्ट तो मैं लिख लूंगा, लेकिन मैडम वो लड़के ऐसे गंदे थे तो आप वहां गए ही क्यों, आप ख़ुद वहां कमरे में गए, दारू पी, मस्ती की, ख़ुद की मर्ज़ी से ही तो आप वहाँ गए, आपको वो लड़के ज़बरदस्ती थोड़े ना ले गए थे, अब ये बिन्दी वाले मोर्चे लेकर आएंगे, मोमबत्तियां जलाएंगे और  कहेंगे कि शहर में लड़कियाँ सेफ़ नहीं है, सारी ज़िम्मेदारी पुलिस की है, मैडम अब आप ही बताइए, आप ख़ुद नहीं समझ सकती क्या इस बात को?",

ये बात ज़रूर ऐसी है कि जो झकझोर देती है, कि जो भी हदें होती है, लड़कियों को पहले से सावधान रहना चाहिए और लड़कों को भी अपनी हद में रखना चाहिए।
ज़रा सी सावधानी और संयम आने वाली बहुत बड़ी मुसीबत से बचा जा सकता है। जीने का सबको बराबर का हक़ है और सबको खाने, पीने,पहनने का हक़ भी है लेकिन फिर भी लड़कियों को सोच समझकर और विवेक से काम लेना चाहिए, लोगों को ठीक से जानने के बाद ही निर्णय लेना चाहिए। क्योंकि लड़कियों की नादानी या गलतियों को सिर्फ़ इसलिए नहीं दरकिनार किया जा सकता कि ये उनसे ग़लती हो गई, कितनी ज़िंदगियाँ बर्बाद हो सकती है।

ऐसे ही पीयूष मिश्रा का ये कहना कि "जबसे लॉ एंड आर्डर ने दहेज, घरेलू हिंसा और स्त्रीयों के लिए क़ानून बनाए हिन्, स्त्रियों ने इसका दुरुपयोग किया है। ये बात मुझे जमी नहीं, क्योंकि यहाँ बस उनकी पुरुष प्रधान सोच ही दिखती है, लेकिन आजकल कई घटनाएँ ऐसी भी दिख रही है, जिनसे उनकी इस बात को वज़न मिलता है। उनकी ये बात कई बार, कई उदाहरणों में सार्थक भी लगता है।

ख़ैर ये लंबी बहस का मुद्दा है, फ़िल्म में इस बात को बहुत सलीके से उठाया गया है, जो प्रशंसनीय है।

क्योंकि
"हर इंसान में एक राक्षस छिपा रहता है, उसको जगाए बिना भी उसके साथ रहा जा सकता है, लेकिन उस राक्षस को जगाकर, उसे आरोपित करना और फिर उसका विनाश करवाना, बहुद हद तक ठीक हो सकता है, लेकिन ये मत भूलिए कि अब राक्षस बन चुके उस इंसान के अंदर एक मासूम सा देवता भी था, जो उसी के साथ अब मर जाएगा, जो कि थोड़ी सी समझदारी से संजोया जा सकता था।"

अभिनय की बात करें तो,
अमिताभ साहब और उनकी आवाज़ अपने आप में दृश्य को सादृश्य बनाने में सक्षम हैं। हर फ़िल्म के साथ वो अपने किरदार में जान ड़ाल कुछ नया करते आये हैं।
हाँ कहीं कहीं उनकी उम्र और लडखडाती आवाज़ अखरती है और ऐसा लगा जैसे उनके किरदार को ज़बरदस्ती रहस्यात्मक बनाया गया है। ख़ैर अमिताभ हैं, इतना अनुभव लेकर चलते हैं वो, किरदार में दिखे, उतार चढ़ाव भी दिखा। दमदार संवाद अदायगी ने सिनेमघातों में  दर्शकों की तालियां भी बटोरी।

"पीयूष मिश्रा" एक मंझे हुए अदाकार हैं, हर फ़िल्म में उनको देख दर्शक अपने आप मुस्कुराने लगता है, यहाँ वकील के किरदार में उन्होंने ऐसा कोई मौका नहीं दिया जिसमे दर्शक हँस सके, लेकिन सीरियस रहते हुए भी उनकी बोलने की शैली और संवाद अदायगी से दर्शक को कई बार गुदगुदी हुई।

"तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और एंड्रिया" का अभिनय अच्छा रहा। तीनों ने ड़र, घबराहट, जिंदादिली और अपने हक़ के लिए लड़ने वाली जैसी भावना और पुरुष प्रधान समाज की ओर अपनी नाराज़गी को अपने अभिनय से साकार किया।

मुझे "फ़लक" के किरदार में "कीर्ति कुल्हारी" का अभिनय सबसे अच्छा लगा क्योंकि उनके किरदार में मुझे कई सारे शेड्स लगे, जो उन्होंने बड़ी समझदारी और बारीकी से निभाया। वो सबसे ज़्यादा मैच्योर भी लग रही थी।

"अंगद बेदी" अपने किरदार में जमे, हालांकि उनके पास करने लायक कुछ ख़ास नहीं था, लेकिन एक जिद्दी, बिगड़े अमीर लड़के और गुस्से वाले दृश्यों में अपने शेड्स दिखाए। उनके दोस्तों वाले किरदारों में भी अभिनेताओं ने ठीक काम किया।

अनिरुद्ध रॉय चौधरी का निर्देशन कमाल का रहा, क्योंकि एक संवेदनशील मुद्दे को उठाना और उस पर भी पटकथा और कहानी में कोर्ट रूम ड्रामा होना, वाकई में निर्देशक के लिए मुश्किल काम होता है, इतने सेंसेटिव मैटर को बहते पानी की तरह बनाना बहुत मुश्किल काम है, भारतीय सिनेमा में कोर्ट रूम ड्रामा बहुत ज़्यादा बना है और हमेशा समीक्षा के तराजु पर बड़ी सख़्ती से तौला जाता रहा है। अभी कुछ दिन पहले आई फ़िल्म "रुस्तम" के भी कोर्ट रूम दृश्यों की बहुत आलोचना हुई थी। दरअसल आजकल दर्शक "रियलिस्टिक" चाहते हैं, जैसा असली ज़िन्दगी या कोर्ट में होता है वैसा ही देखना चाहते हैं। दर्शक अब अतिनाटकीयता पसंद नहीं करते। इस मामले में ये फ़िल्म सटीक नज़र आई, टेंशन और सस्पेंस अच्छा बन पड़ा और कहानी बड़ी सहजता और परिपक्व तरीके से की गई।  ये उनकी पहली हिन्दी फ़िल्म थी। इसके आलावा वो पांच बंगाली फ़िल्में बना चुके हैं।

सिनेमेट्रोग्राफी कमाल की रही, आजकल हैण्डहेल्ड पर शूट का चलन चल रहा है, मेरा व्यक्तिगत मत है कि इससे टेंशन क्रिएट करने वाले दृश्य अच्छे बन पड़ते हैं, पहले हॉफ़ में सस्पेंस को क्रिएट करने के लिए, कैमरे का मूवमेंट और एडिटिंग में दिए कट्स सार्थक लगे। लेकिन जितना सस्पेंस और टेंशन क्रिएट की गई, ज़रा कम लगी। कैमरा वर्क में कुछ जर्क भी दिखे लेकिन वो खप गए।

शांतनु मोइत्रा का संगीत अच्छा है, गाने सिचुएशनल लगे, इस तरह की फ़िल्म, जहाँ "मुद्दा" मुख्य होता है, कहानी कहने में गानों का बहुत ज़्यादा योगदान होता है, संगीत पक्ष अच्छा रहा, कहानी को आगे बढ़ाने में सहयोगी रहा।
बैक ग्राउंड म्यूजिक कहानी, मूड और टेंशन के हिसाब से बनाया है, अच्छा है।

सिनेमा समाज का आइना है, समाज सिनेमा से बहुत सीखता भी है, चाहे अच्छी बातें हो या बुरी, क्योंकि फ़िल्में बनाने वाले, अभिनय करने वाले और फ़िल्में देखने वाले लोग भी समाज का ही हिस्सा हैं।
इस तरह की फ़िल्म समाज को आईना भी दिखाती है और सीख भी देती है।

एक सवाल आपको भी कुरेद रहा होगा कि फ़िल्म का टाइटल "पिंक" क्यों है, ये जाननेे के लिए जाइए सिनेमाघर। वहां शायद आपको ऐसे प्रश्नों के उत्तर भी मिल जाएँ जो हम रोज़ विचारते हैं।
फ़िल्म दिल से बनी है, सहज, सटीक और संवेदनशील मुद्दे को बेहद परिपक्व तरीके से कहा गया है।

ये फ़िल्म कई सारे बहस के मुद्दे छोड़ती है, जो सिनेमा का मुख्य धर्म है। फ़िल्म निर्णय तक चाहे ना पहुंचाए या आप सहमत ना भी हों, लेकिन आपको सोचने पर ज़रूर मज़बूर करेगी।

जाइए ज़रूर, देखकर आइए।

नमस्कार।

यह रचना  संदीप श्याम शर्मा जी द्वारा लिखी गयी है . आप जयपुर से मैनेजमेंट में स्नातक पूर्ण कर मैनेजमेंट में स्नातकोत्तर करने को दिल्ली आये , फाइनेंस और मार्केटिंग में एम. बी. ए. करने के पश्चात् मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने लगे , लेकिन रंगमंच और साहित्य के प्रति अपनी रूचि को ज़्यादा समय तक छिपाकर नहीं रख सके  । रंगकर्म शुरू कर दिया, लगातार कर रहे है . साहित्य की विविध विधाओं में लेखन कार्य में संलग्न हैं .
संपर्क सूत्र -
संदीपश्यामशर्मा जयपुर, राजस्थान संपर्क: 9602424788, मेल: sandeepshyam.sharma@gmail.com

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  1. फिल्म पिंक की जानकारी बहुत अच्छी तरह दी, आपकी ये पोस्ट पढ़कर फिल्म पिंक देखने में interest और भी बढेंगा

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Hindi Sparsh,15,English Grammar in Hindi,3,formal-letter-in-hindi-format,143,Godan by Premchand,6,hindi ebooks,5,Hindi Ekanki,18,hindi essay,339,hindi grammar,52,Hindi Sahitya Ka Itihas,98,hindi stories,656,hindi-gadya-sahitya,2,hindi-kavita-ki-vyakhya,15,ICSE Hindi Gadya Sankalan,11,icse-bhasha-sanchay-8-solutions,18,informal-letter-in-hindi-format,59,jyotish-astrology,13,kavyagat-visheshta,22,Kshitij Bhag 2,10,lok-sabha-in-hindi,18,love-letter-hindi,3,mb,72,motivational books,10,naya raasta icse,9,NCERT Class 10 Hindi Sanchayan संचयन Bhag 2,3,NCERT Class 11 Hindi Aroh आरोह भाग-1,20,ncert class 6 hindi vasant bhag 1,14,NCERT Class 9 Hindi Kritika कृतिका Bhag 1,5,NCERT Hindi Rimjhim Class 2,13,NCERT Rimjhim Class 4,14,ncert rimjhim class 5,19,NCERT Solutions Class 7 Hindi Durva,12,NCERT Solutions Class 8 Hindi Durva,17,NCERT Solutions for Class 11 Hindi Vitan वितान भाग 1,3,NCERT Solutions for class 12 Humanities Hindi Antral Bhag 2,4,NCERT Solutions Hindi Class 11 Antra Bhag 1,19,NCERT Vasant Bhag 3 For Class 8,12,NCERT/CBSE Class 9 Hindi book Sanchayan,6,Nootan Gunjan Hindi Pathmala Class 8,18,Notifications,5,nutan-gunjan-hindi-pathmala-6-solutions,17,nutan-gunjan-hindi-pathmala-7-solutions,18,political-science-notes-hindi,1,question paper,19,quizzes,8,Rimjhim Class 3,14,Sankshipt Budhcharit,5,Shayari In Hindi,16,sponsored news,10,Syllabus,7,top-classic-hindi-stories,38,UP Board Class 10 Hindi,4,Vasant Bhag - 2 Textbook In Hindi For Class - 7,11,vitaan-hindi-pathmala-8-solutions,16,VITAN BHAG-2,5,vocabulary,19,
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पिंक : फिल्म समीक्षा
सदी के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन साहब को वकील के काले कोट में संवाद बोलते देखने के लिए इंतज़ार था
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