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स्पर्श

व्योम ने किया कौमुदी को स्पर्श
अरण्य ने किया हरीतिमा को स्पर्श
पर्वतों ने हिमकणों को किया स्पर्श
धरा ने की मातृत्व का स्पर्श
तुम्हारे मोह ने किया मेरे हृदय को स्पर्श
प्रेम का स्फुरण हुआ अंतर्मन के गर्भगृह में
आत्मसात हृदय विभोर मर्म हुआ
हृदय के कपाट पर जब तुम्हारा अभिनन्दन हुआ
दैहिक नही भौतिक नही दैविक हुआ स्पर्श

मुसाफ़िर
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नगण्य उम्मीदों की मझधार
रिंकी मिश्रा
रिंकी मिश्रा
डूबती उतराती आशा की नाव
दूर वो खड़ा मुसाफ़िर विचलित
नियति में उसके क्या लिखा है
दूर उसकी मंजिल खड़ी है
नदी जिद पर उतरी पड़ी है
सुख का सारा समान लिया है
मन उसका वीरान पड़ा है
क्या यही है विधि की लेखा
मन को कही आराम नही है
उन्माद उसका डूब रहा है 
गुरुर उसका बह चला है
अब खड़ा क्या सोच रहा है
किराये का है ये तेरा शरीर
भटका पथिक अब लौट चल
अब जो तू स्तविक हुआ है
पुनर्जन्म तेरा हुआ है
लौट अपने देश को
बदल अपने वेश को
तेरा कुछ नही रखा यहाँ है
दम्भ मे फिर क्यों पड़ा है


वसीयत
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रात जितनी गहराती है
उतना चाँद पिघलता है
पिघलना तो है उसको
हर चीज़ की आखिर यहां
एक वक्त तय है
इंसानी हो या कुदरती

जिस तरह इंसानी फितरत मिज़ाज़
आबो हवा बदल रहा है।

सोचती हूँ अपने मुक़र्रर वक्त से पहले 
एक वसीयत लिख जाऊँ
अपनी सभ्यता संस्कृति 
आने वाले पीढ़ी के नाम कर जाऊँ
रचनाकार परिचय 
रिंकी मिश्रा

Account executive (pvt job)
नई दिल्ली
साहित्य पढ़ने 
और स्वतन्त्र रूप से लेखन कार्य में रुचि।

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