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 फिर खलबली मचाने को तेरी याद आई है

फिर वही रात, वही खामोशी, वही तन्हाई है।
फिर खलबली मचाने को तेरी याद आई है।।

चाँद भी अब डूब रहा चाँदनी समेट के,
अजीत कुमार शर्मा
अजीत कुमार शर्मा
जी रही है एक चकोर किरण को देख के,
इंतज़ार की इंतहा तो प्यार की गहराई है।
फिर वही रात, वही खामोशी, वही तन्हाई है।।

सो रहा भँवर भी है बेख़ौफ़ कमल में,
आस है खिलेगा कमल दिवस नवल में,
भँवर ने भरोसे की राह एक दिखाई है।
फिर वही रात, वही खामोशी, वही तन्हाई है।।

जुगनुओं के जैसे याद तेरी टिमटिमा रही,
इस अंधेरी रात में प्रकाश कुछ फैला रही,
याद ही अब प्यार तेरी, याद बेवफ़ाई है।
फिर वही रात, वही खामोशी, वही तन्हाई है।
फिर खलबली मचाने को तेरी याद आयी है।

 यह रचना अजीत कुमार शर्मा जी द्वारा लिखी गयी है . आप वर्तमान में  इंदौर में भारतीय डाक विभाग के कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं। आप साहित्य लेखन में गहरी रूचि रखते हैं .

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