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मिल जाते यदि दोबारा


तुम मिल जाते यदि दोबारा
सब दूर अंधेरा हो जाता
जीवन को मकसद मिल जाता
आशा का सबेरा हो जाता।
तुम मिल जाते ---------।

मिल जाते तुम
तुम प्राण मेरे, तुम सहचर हो
तुम बिन जीना भी क्या जीना
तुम आ जाते जो अभी यहां
सांसों को सहारा मिल जाता।
तुम मिल जाते ---------।

सिमटी सी अपनी दुनिया है
बस तुम हो प्रेम की यादें हैं
जो पुनर्मिलन अभी हो जाता
रीतापन मन का भर जाता।
तुम मिल जाते ---------।

सपने टूटे, अरमान मिटे
सूखा, बंजर सा जीवन है
तुम पास मेरे जो आ जाते
जीवन में सावन आ जाता।
तुम मिल जाते ------।

गुम तुम भी, गुम मैं भी हूं
पसरा-पसरा सन्नाटा है
अधरों को मुखर जो कर देते
गम मन का तिरोहित हो जाता।
तुम मिल जाते ---------।
- तरु श्रीवास्तव

यह रचना तरु श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गयी है . आप कविता, कहानी, व्यंग्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य करती हैं . आप पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2000 से कार्यरत हैं। हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हरिभूमि, कादिम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में बतौर स्वतंत्र पत्रकार विभिन्न विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। हरिभूमि में एक कविता प्रकाशित। दैनिक भास्कर की पत्रिका भास्कर लक्ष्य में 5 वर्षों से अधिक समय तक बतौर एडिटोरियल एसोसिएट कार्य किया। तत्पश्चात हरिभूमि में दो से अधिक वर्षों तक उपसंपादक के पद पर कार्य किया। वर्तमान में एक प्रोडक्शन हाऊस में कार्यरत हैं.आकाशवाणी के विज्ञान प्रभाग के लिए कई बार विज्ञान समाचार का वाचन यानी साइंस न्यूज रीडिंग किया।

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  1. तरु श्रीवास्तव जी, बहुत बढ़िया और दिल को छु जानेवाली रचना.

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