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इरोस्ट्रेटस

( Erostratus )
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                                                --- मूल लेखक : ज़्याँ पाल सार्त्र
                                                --- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

              लोगों को ऊँचाई से देखना चाहिए । बत्तियाँ बुझाकर कमरे की खिड़की के पास खड़े हो जाइए । किसी को एक पल के लिए भी शक नहीं होगा कि आप उन्हें वहाँ ऊपर से देख सकते हैं । लोग अपने सामने की चीज़ों के बारे में सचेत होते
हैं । कभी-कभार पीठ पीछे की चीज़ों के बारे में भी , किंतु उनका सारा ध्यान पाँच फ़ुट आठ इंच की ऊँचाई तक के दर्शकों तक ही सीमित होता है । आठवीं मंज़िल से डर्बी टोपी कैसी दिखाई देती है , इस पर कब किसने ध्यान दिया है ? चटकीले रंगों और भड़कीली पोशाकों का इस्तेमाल करके अपने सिरों और कंधों को सुरक्षित रखने के बारे में वे सावधान नहीं होते । उन्हें नहीं पता कि मानवता के इस बड़े शत्रु --
 ' नीचे के दृश्य ' का सामना कैसे किया जाए । मैं अकसर खिड़की की चौखट पर झुककर हँसने लगता । वह सीधी मुद्रा कहाँ है जिस पर उन्हें इतना गर्व है -- वे पटरियों से चिपके होते थे और उनके कंधों के नीचे से दो लम्बी टाँगें निकल आती
थीं ।
              आठवीं मंज़िल की बाल्कनी -- यही वह जगह है , जहाँ मुझे अपना सारा जीवन बिता देना चाहिए था । आपको भौतिक प्रतीकों के साथ-साथ नैतिक श्रेष्ठताओं को थामना होता है , नहीं तो वे ढह जाती हैं । पर दूसरे लोगों की तुलना में मुझमें क्या श्रेष्ठता है ? स्थिति की श्रेष्ठता , और कुछ नहीं । मैंने खुद को अपने भीतर के मनुष्य से ऊपर स्थापित कर लिया है और मैं इसका अध्ययन करता हूँ । यही कारण है कि नौत्रेदेम की मीनारें , आइफ़िल टावर के छज्जे , साक्रे-कोऊर और रुए दे लांबे पर स्थित आठवीं मंज़िल -- ये सब मुझे हमेशा पसंद रहे हैं । ये बहुत बढ़िया प्रतीक हैं ।
              कभी-कभी मुझे सड़क पर जाना पड़ता , जैसे दफ़्तर जाने के लिए , तो मेरा दम घुटने लगता । यदि आप उनके बराबर खड़े हों तो लोगों को चींटी मानना बहुत मुश्किल होता है । वे आपसे टकराते हैं । एक बार मैंने सड़क पर एक मरा हुआ आदमी देखा था । वह मुँह के बल गिरा हुआ था लोगों ने उसे सीधा किया । उससे ख़ून बह रहा था । मैंने उसकी खुली आँखें और चौकन्नी निगाह देखी । उसका ढेर-सा ख़ून देखा । मैंने खुद से
ज़्याँ पाल सार्त्र
ज़्याँ पाल सार्त्र
कहा , " यह कुछ भी नहीं है । यह गीले रोगन जैसा लगता
है , गोया उन्होंने उसकी नाक पर लाल रोगन फेर दिया हो । बस । " पर मुझे अपने पैरों और गर्दन में एक घिनौनी शिथिलता महसूस हुई । मैं बेहोश हो गया । लोग मुझे दवाइयों की एक दुकान पर ले गए । उन्होंने मेरे मुँह पर कुछ थप्पड़ लगाए और पीने के लिए कुछ दिया । मैं उनकी हत्या भी कर सकता था ।
              मुझे मालूम था कि वे मेरे शत्रु हैं , पर वे यह नहीं जानते थे । वे एक-दूसरे को पसंद करते थे । वे कोहनियाँ रगड़ते थे । वे यहाँ-वहाँ मेरी मदद भी कर देते थे क्योंकि वे सोचते थे कि मैं भी उन जैसा हूँ । पर यदि वे सच का ज़रा-सा भी अंदाज़ा लगा पाते तो वे मुझे पीट देते । बाद में उन्होंने ऐसा किया भी । जब उन्हें पता चल गया कि मैं कौन हूँ तो उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मेरी खूब पिटाई की । उन्होंने दो घंटे तक स्टेशन-हाउस में मुझे मारा , मुझे थप्पड़ रसीद किए , घूँसे चलाए और मेरे हाथ मरोड़े । उन्होंने मेरी पतलून फाड़ दी और अंत में मेरा चश्मा ज़मीन पर फेंक दिया । जब मैं घुटनों और कोहनियाँ के बल झुक कर उसे ढूँढ़ रहा था तो वे हँसे और उन्होंने मुझे ठोकरें मारीं । शुरू से ही मैं जानता था कि वे मेरी धुनाई करेंगे । मैं हट्टा-कट्टा नहीं हूँ और अपना बचाव नहीं कर सकता । उनमें से जो बड़ी डील-डौल वाले
थे , वे लम्बे अरसे से मेरी तलाश में थे । यह देखने के लिए कि मैं क्या करूँगा , सड़क पर चलते हुए वे जानबूझकर मुझसे टकरा जाते । मैं उन्हें कुछ नहीं कहता । मैं
ऐसा जताता जैसे मैं कुछ भी समझा ही नहीं । लेकिन उन्होंने मुझे फिर भी पकड़ लिया । मैं उनसे डरता था , पर ऐसा नहीं है कि उनसे नफ़रत करने के लिए मेरे पास और गंभीर कारण नहीं थे ।
                 जहाँ तक इस सब का संबंध है , उस दिन से सब कुछ बेहतर हो गया , जिस दिन मैंने रिवॉल्वर ख़रीद लिया । जब आप अपने पास विस्फोट और ज़ोरदार आवाज़ करने वाली कोई चीज़ रख लेते हैं तो आप खुद को मज़बूत महसूस करते
हैं । मैं हर रविवार को रिवॉल्वर साथ ले कर बाहर निकलता । मैं उसे अपनी पतलून की जेब में रख लेता और घूमने निकल जाता । मैं उसे अपनी पैंट पर केकड़े की तरह रेंगता महसूस करता । वह मेरी जाँघ पर ठंडी लगती , लेकिन धीरे-धीरे शरीर के स्पर्श से वह गरम होने लगती । मैं कुछ दृढ़ता के साथ चलता । मैं जेब में हाथ डाल लेता और उस चीज़ को महसूस करता । हर थोड़ी देर बाद मैं पेशाब करने के बहाने शौचालय जाता । वहाँ भी मुझे सावधान रहना पड़ता , क्योंकि मेरे अग़ल-बगल लोग होते । वहाँ मैं सावधानी से रिवॉल्वर बाहर निकालता । उसका भार महसूस करता ।
उसके चारखानेदार काले हत्थे और ट्रिगर को निहारता , जो अधखिली पलक की तरह दिखाई देता था । दूसरे लोग , जो मुझे बाहर से देख रहे होते , वे सोचते कि मैं पेशाब कर रहा हूँ । पर मैं शौचालय में कभी पेशाब नहीं करता ।
                 एक रात मुझे लोगों को गोली से उड़ा देने का विचार सूझा । वह शनिवार की शाम थी । मैं ली से मिलने गया था । वह रूए मोंतपारनास्से पर स्थित एक होटल में धंधा करती थी । मैं कभी किसी औरत के साथ सोया नहीं था । इस क्रिया में मैं खुद को लुटा हुआ महसूस करता । हालाँकि आप ऊपर होते हैं , किंतु जो कुछ मैंने सुना है , उससे स्पष्ट है कि इस व्यापार में कुल मिला कर वे ही फ़ायदे में रहती हैं । मैं किसी से कुछ माँगता नहीं , पर मैं किसी को कुछ देता भी नहीं । अन्यथा मेरे पल्ले भी कोई ठंडी , पवित्र स्त्री पड़ती , जो मेरे सामने घृणा से आत्म-समर्पण  करती ।
                 मैं हर शनिवार को ली के साथ इकेंसे होटल में जाता और वहाँ एक कमरा लेता । वहाँ वह अपने कपड़े उतार देती और मैं बिना छुए उसे देखता रहता । उस रात वह मुझे नहीं मिली । मैंने कुछ देर इंतज़ार किया । चूँकि वह आती हुई नहीं दिखाई दी , मैंने अंदाज़ा लगाया कि उसे ज़ुकाम हो गया है । वह जनवरी की शुरुआत थी और बेहद ठंड पड़ रही थी । मैं कल्पनाशील व्यक्ति हूँ और मैंने उस सारे आनंद को अपने सामने चित्रित कर लिया जो मुझे उस शाम मिलता । रूए ओडिसा
पर काले बालों वाली एक गठीली और मोटी औरत मौजूद थी । मैं उसे अकसर वहाँ देखता । मैं प्रौढ़ स्त्रियों से घृणा तो नहीं करता , लेकिन वे जब कपड़े उतार देती हैं तो
दूसरी औरतों की तुलना में ज़्यादा नंगी लगने लगती हैं । दरअसल वह मोटी औरत मेरी ज़रूरतों के बारे में कुछ नहीं जानती थी , और मैं एकदम से उससे वह सब कहते हुए डर रहा था । हालाँकि मैं नए परिचितों के बारे में ज़्यादा फ़िक्र नहीं करता , लेकिन यह भी तो हो सकता है कि ऐसी औरत ने दरवाज़े के पीछे किसी उचक्के को
छिपा रखा हो , जो अचानक ही झपट पड़े और मुझसे मेरे रुपए-पैसे छीन ले । फिर भी , उस शाम मुझमें साहस था । मैंने तय किया कि मैं वापस घर जाऊँगा , रिवॉल्वर उठाऊँगा और फिर वहाँ जा कर अपनी किस्मत आज़माऊँगा ।
                  पंद्रह मिनट बाद जब मैं इस औरत के पास पहुँचा तो मेरा रिवॉल्वर मेरी जेब में था और मैं किसी चीज़ से भयभीत नहीं था । क़रीब से देखने पर वह बेचारी लगी । वह सड़क पार वाली मेरी पड़ोसन , पुलिस सार्जेंट की बीवी जैसी लग रही थी । मैं बेहद खुश था क्योंकि मैं लंबे अर्से से उसे नंगा देखना चाहता था । जब सार्जेंट घर में नहीं होता था तो वह खिडकी खोल कर कपड़े पहनती थी और मैं अकसर उसे एक नज़र देखने के लिए परदे के पीछे खड़ा रहता था । पर वह हमेशा कमरे के कोने में कपड़े पहनती थी ।
                  होटल स्तेला में छठी मंज़िल पर केवल एक कमरा ख़ाली था । हम ऊपर गए । वह औरत काफ़ी भारी थी और हर सीढ़ी पर साँस लेने के लिए रुकती
थी । मुझे अच्छा लगा । तोंद के बावजूद मेरी देह हल्की-फुल्की है और मुझे थकाने के लिए छह से ज़्यादा मंज़िलों की ज़रूरत है । छठी मंज़िल पर पहुँचकर वह रुकी और अपने दिल पर दायाँ हाथ रखकर उसने गहरी साँस ली । उसके बाएँ हाथ में कमरे की चाबी थी ।
                 मेरी ओर देखकर मुस्कराने का प्रयास करते हुए उसने कहा , " बहुत ऊपर है । " मैंने बिना कोई जवाब दिए उसके हाथ से चाबी ले ली और दरवाज़ा खोल दिया । जेब में डाले अपने बाएँ हाथ में मैंने रिवॉल्वर पकड़ रखा था । मैंने उसे तब तक नहीं छोड़ा जब तक मैंने बत्ती नहीं जला दी । उन्होंने वाश-बेसिन पर हरे साबुन की एक टिकिया रख दी थी , जो एक ग्राहक के लिए काफ़ी थी । मैं मुस्कराया । नहाने के पीढ़ों और साबुन के टुकड़ों की मुझे ज़्यादा ज़रूरत नहीं पड़ती । वह औरत अब भी मेरी पीठ के पीछे गहरी साँसें ले रही थी । और यह सब मुझे उत्तेजित कर रहा था । मैं घूमा और उसने अपने होठ मेरी ओर बढ़ा दिए , लेकिन मैंने उसे दूर धकेल दिया ।
                  " अपने कपड़े उतारो । " मैंने उससे कहा ।
                   कमरे में एक आरामकुर्सी थी जो कपड़े से मढ़ी हुई थी । मैं उस पर बैठकर आराम की मुद्रा में आ गया । ऐसे ही समय मुझे सिगरेट की तलब होती है ।
उस औरत ने अपने कुछ कपड़े उतार दिए और मुझे अविश्वास से देखते हुए रुक
गई ।
                    " तुम्हारा नाम क्या है ? "
                    " रेनी । "
                    " अच्छी बात है रेनी , जल्दी करो । मैं इंतज़ार कर रहा हूँ । "
                    " तुम कपड़े नहीं उतारोगे ? "
                    " तुम चालू रहो । " मैंने कहा , " मेरी फ़िक्र मत करो । "
                    उसने अपने अधोवस्त्र उतार दिए और उन्हें कपड़ों के ढेर पर सावधानी से डाल दिया ।
                    " तुम थोड़े सुस्त हो , प्रिये । क्या तुम अपनी प्रेमिका से ही सब कुछ करवाना चाहते हो ? "
                    यह कहते हुए वह एकदम मेरी ओर बढ़ी और अपने हाथों के सहारे कुर्सी के हत्थे पर झुकते हुए उसने मेरे सामने घुटनों के बल बैठने की कोशिश की । मैं झटके से उठ खड़ा हुआ ।
                    " ऐसा कुछ नहीं है । " मैंने कहा ।
                    " तो तुम मुझसे क्या चाहते हो ? "
                    " कुछ नहीं । केवल चहलक़दमी । आस-पास घूमो । इससे ज़्यादा मैं तुमसे कुछ नहीं चाहता । "
                    वह भद्दी चाल से कमरे में इधर-उधर घूमने लगी । औरतों को नग्न हालत में चहलक़दमी करने से ज़्यादा कोई बात नहीं क्रोधित करती । एड़ियाँ ज़मीन पर सीधी रखने की उनकी आदत नहीं होती । उस वेश्या ने अपनी कमर धनुषाकार कर ली और अपनी बाँहें लटका लीं । मैं जैसे स्वर्ग में था -- गले तक कपड़े पहने मैं आरामकुर्सी पर शांत बैठा था । मैं अपने दस्ताने तक पहने हुए था , जबकि वह औरत मेरी आज्ञा से कपड़े उतार कर नग्न हो गई थी और मेरे सामने इधर-उधर घूम रही
थी । उसने अपना सिर मेरी ओर घुमाया और दिखावे के लिए कुटिलता से मुस्कराई ।
अचानक मैंने उससे कुछ कहा ।
                   " हरामी कहीं के ! " वह शर्माते हुए होठों में बुदबुदाई ।
                   लेकिन मैं ज़ोर से हँसा । तब वह उछली और कुर्सी से अपने अधोवस्त्र उठाने लगी ।
                   " ठहरो ! " मैंने कहा , " अभी समय नहीं हुआ । थोड़ी देर बाद ही मुझे तुम्हें पचास फ़्रैंक देने हैं लेकिन मुझे अपने पैसों की क़ीमत चाहिए । "
                   अपने अधोवस्त्र पकड़ कर घबराए स्वर में वह बोली , " बहुत हो
गया , समझे ? मुझे नहीं पता , तुम क्या चाहते हो ? अगर तुम मुझे बेवक़ूफ़ बनाने के लिए यहाँ लाए हो , तो ... "
                   तब मैंने अपना रिवॉल्वर निकाल कर उसे दिखा दिया । उसने गम्भीरता से मुझे देखा और बिना एक भी शब्द बोले अपने अधोवस्त्र वापस नीचे डाल दिए ।
                  " शुरू हो जाओ , " मैंने उससे कहा , " कमरे में टहलती रहो । "
                  वह नग्न हालत में ही और पाँच मिनट तक कमरे में घूमती रही । फिर मैंने उसे अपनी छड़ी दी । वह चुपचाप वह सब करती रही जो मैंने उससे कहा । उसके बाद मैं उठा और मैंने उसे पचास फ़्रैंक का नोट थमा दिया । उसने वह नोट ले लिया ।
                 " फिर मिलेंगे , " मैंने कहा , " उम्मीद है , इन पैसों के बदले मैंने तुम्हें ज़्यादा नहीं थकाया । "
                 पर उस रात मैं अचानक ही उठ बैठा । उसका चेहरा , उसे रिवॉल्वर दिखाते समय उसकी आँखों का भाव और हर सीढ़ी पर हिलता हुआ उसका थुलथुल पेट मुझे बीच रात में याद आने लगे ।
                 क्या बेवक़ूफ़ी है , मैंने सोचा । मुझे बेहद अफ़सोस हुआ । जब मैं उसके साथ था , मुझे तब उसे गोली मार देनी चाहिए थी ।  उसके पेट में अनेक छेद कर देने चाहिए थे । उस रात और अगली तीन रातें अपने सपने में मैंने उसकी नाभि के चारो ओर छह गोल छोटे-छोटे लाल छेद देखे ।

     ***          ***           ***           ***           ***           ***           ***

                 इस सब का नतीजा यह हुआ कि मैं रिवॉल्वर लिए बिना कहीं बाहर नहीं निकलता । मैं लोगों की पीठ देखता और उनकी चाल से यह कल्पना करता कि
यदि मैं इन्हें गोली मार दूँ तो ये कैसे लगेंगे । मेरी आदत थी कि हर रविवार को शास्त्रीय संगीत सभा ख़त्म होने के बाद मैं शातेले के आस-पास घूमता था ।
                 छह बजे के क़रीब मैंने घंटी की आवाज़ सुनी और फिर वहाँ काम करने वाले लोगों को शीशे के दरवाज़ों को खोलकर हुक से बाँधते हुए देखा । यह शुरुआत थी । धीरे-धीरे भीड़ बाहर निकली । लोग मानो तैरते हुए क़दमों से चल रहे थे । आँखों में अभी भी सपने सँजोए , दिलों में सुंदर भावनाएँ लिए वे जैसे एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आ रहे थे । मैंने अपना दाहिना हाथ जेब में डालकर पूरी ताकत से रिवॉल्वर का हत्था पकड़ लिया । कुछ पल बाद मैंने खुद को उन पर गोलियाँ चलाते देखा । मैंने उन्हें मिट्टी के मटकों की तरह तोड़ दिया । गोली से उड़ा दिया । वे एक-एक करके उड़ते गए और बचे हुए भयभीत लोग दरवाज़ों पर लगे शीशे को तोड़कर वापस थिएटर में भागने लगे । यह बहुत उत्तेजक खेल था । जब खेल ख़त्म हुआ तो मेरे हाथ काँप रहे थे । मुझे अपना होश सँभालने के लिए त्रेहेर के शराबख़ाने में जा कर कोन्याक पीनी पड़ी ।
                  मैं स्त्रियों को जान से नहीं मारता । मैं या तो उनके गुर्दे में गोली मारता या उनकी पिंडलियों में , ताकि वे नाचने लगें ।
                  मैंने अभी तक कोई फ़ैसला नहीं किया था । पर मैंने हर काम ध्यान से किया । मैंने छोटे-छोटे ब्योरों से शुरुआत की। मैं डेन्फ़र्ट-रोशेरो की 'शूटिंग-गैलरी' में अभ्यास करने गया । मेरा निशाना ज़्यादा सधा हुआ नहीं था ,  लेकिन आदमी बड़ा लक्ष्य होता है । ख़ास करके तब जब आप नली सटा कर गोली मारते हैं । फिर मैंने अपने विज्ञापन का प्रबंध किया । मैंने ऐसा दिन चुना जब मेरे सभी सहकर्मी दफ़्तर में इकट्ठे हों । सोमवार की सुबह । मेरे उनके साथ हमेशा दोस्ताना संबंध रहे हैं , हालाँकि मैं उनसे हाथ मिलाते हुए डरता था । वे अभिवादन करने के लिए अपने दस्ताने उतार लेते । हाथों को नंगा करने , दस्तानों को फिर से पहनने और उँगलियों पर धीरे-धीरे सरकाने तथा झुर्रियों से भरी नग्नता को प्रदर्शित करने का उनका तरीका बेहद अश्लील था । मैं अपने दस्ताने हमेशा पहने रहता ।
               
सुशांत सुप्रिय
  सोमवार को हम ज़्यादा काम नहीं करते थे । व्यापारिक सेवा विभाग से टाइपिस्ट हमारे लिए पावतियाँ ले आती थी । लोमोर्सिस खुश होकर उससे मज़ाक करता और उसके चले जाने के बाद वे सब तृप्त भाव से उसकी सुंदरता की चर्चा करते । फिर वे लिंडबर्ग के बारे में बात करते । मैंने उनसे कहा , " मुझे काले नायक पसंद हैं । "
                 " नीग्रो ? " मसी ने पूछा ।
                 " नहीं , काले । जैसे काला जादू में । लिंडबर्ग श्वेत नायक है । मुझे उसमें कोई रुचि नहीं है ।
                 " हाँ , अटलांटिक पार करना बहुत आसान है न । " बूखसिन ने खट्टे मन से कहा ।
                 " मैंने उन्हें काले नायक की अपनी संकल्पना से परिचित करवाया ।
                 " अराजकतावादी ? "
                 " नहीं , " मैंने शांत भाव से कहा । " देखा जाए तो अराजकतावादी मनुष्य से प्रेम करते हैं । "
                 " फिर वह कोई पागल होगा । "
                 मसी कुछ पढ़ा-लिखा था । उसने हस्तक्षेप किया । " मैं तुम्हारे पात्र को जानता हूँ । " उसने मुझसे कहा , " उसका नाम इरोस्ट्रेटस है । वह प्रसिद्ध होना चाहता था और उसे दुनिया के आश्चर्यों में से एक इफ़ीसस के मंदिर को जलाने से बेहतर कोई काम नहीं सूझा । "
                 " और उस मंदिर को बनवाने वाले व्यक्ति का क्या नाम था ? "
                 " मुझे याद नहीं , " उसने स्वीकार किया । " शायद कोई भी उसका नाम नहीं जानता है । "
                 " सच ? लेकिन तुम्हें इरोस्ट्रेटस का नाम याद है । क्या तुम जानते हो , चीज़ों के बारे में उसकी कल्पना ज़्यादा बुरी नहीं थी । "
                 इन्हीं शब्दों के साथ बातचीत ख़त्म हो गई , पर मैं एकदम शांत था ।
समय आने पर उन्हें ये बातें याद आएँगी । मैंने इससे पहले इरोस्ट्रेटस का नाम नहीं सुना था । पर मेरे लिए उसकी कथा प्रेरणा का स्रोत थी । वह दो हज़ार साल से भी पहले मर चुका था , पर उसका कृत्य अब भी काले हीरे-सा चमक रहा था । मैंने सोचना शुरू किया कि मेरी नियति लघु और त्रासद होगी । पहले मुझे डर लगा , किंतु फिर मैं इसका आदी हो गया । यदि आप इस बारे मे विशेष दृष्टिकोण से सोचें तो यह भयानक लग सकता है , पर दूसरी ओर यह बीत रहे पल को काफ़ी शक्ति और सुंदरता प्रदान करता है । सड़क पर चलते हुए मुझे अपने भीतर एक अजीब-सी ताकत का अहसास होता । रिवॉल्वर मेरे पास था -- वह चीज़ जो , जो विस्फोट और आवाज़ करती है । लेकिन अब मुझे वह चीज़ शक्ति नहीं देती थी । दरअसल शक्ति और विश्वास मेरे भीतर से उत्पन्न हो रहा था । जैसे मैं खुद किसी रिवॉल्वर की तरह था , तारपीडो की तरह था , बम की तरह था । मैं भी अपने शांत जीवन के अंत में एक दिन फट जाऊँगा और मैग्नीशियम की तरह लघु और तेज चमक से विश्व को प्रकाशमय कर दूँगा । उस समय मुझे कई रातों तक एक ही सपना आया । मैं अराजकतावादी था । मैंने खुद को ज़ार के रास्ते में डाल दिया था और मेरे पास आग उगलने वाला एक यंत्र था । निश्चित समय पर जुलूस निकला , बम फटा और हम भीड़ के सामने हवा में उछाल दिए गए -- मैं , ज़ार और सुनहरे फ़ीतों वाले तीन अधिकारी ।
                 इसके बाद मैंने कई हफ़्तों तक दफ़्तर में अपनी शक्ल नहीं दिखाई । मैं मुख्य मार्गों पर अपने भावी शिकारों के बीच घूमता या कमरे में बंद होकर अपनी योजनाएँ बनाता । अक्टूबर के शुरू में उन्होंने मुझे नौकरी से निकाल दिया । तब मैंने आराम से यह पत्र लिखा , जिसकी मैंने एक सौ दो प्रतियाँ बनाईं --

                   " श्रीमन्
                             आप प्रसिद्ध व्यक्ति हैं और आपकी रचनाएँ हज़ारों की संख्या में बिकी हैं । मैं आपको बताता हूँ , क्यों -- क्योंकि आप मनुष्य से प्यार करते हैं । आपके लहू में मानवतावाद है । आप भाग्यशाली हैं । जब आप लोगों के साथ होते हैं तो अपना विस्तार कर लेते हैं । जब भी आप अपने जैसा कोई इंसान देखते हैं , आपमें उसके लिए सहानुभूति उमड़ आती है , भले ही आप उसे जानते भी न हों । आपमें उसके शरीर के प्रति , उसकी टाँगों के प्रति , और इन सबसे ज़्यादा उसके हाथों के प्रति रुचि है -- इससे आपको ख़ुशी होती है , क्योंकि उसके हर हाथ में पाँच उँगलियाँ हैं और वह बाक़ी उँगलियों के साथ अपना अँगूठा भिड़ा सकता है । जब आपका पड़ोसी मेज़ से क़लम उठाता है तो आप खिल उठते हैं , क्योंकि उसे उठाने का एक तरीका है जो बेहद मानवीय है और जिसका वर्णन अकसर आपने अपनी रचनाओं में किया है । यह किसी बंदर के तरीके से कम लचीला और कम तेज है , लेकिन उससे कहीं ज़्यादा समझदार तरीका है । आप भी आदमी की गहरे ज़ख़्म खाई मुद्रा से और उसकी प्रसिद्ध दृष्टि से प्यार करते हैं । यह जंगली पशु के तौर-तरीक़ों से अलग है । इसलिए आपके लिए इंसान से उसी के बारे में बात करने के लिए सही लहज़ा ढूँढ़ना आसान है -- मर्यादित , किंतु उन्माद से भरा हुआ । लोग आपकी किताबों पर लालचियों की तरह टूट पड़ते हैं । उन्हें ख़ूबसूरत आरामकुर्सियों पर बैठकर पढ़ते हैं । वे महान प्रेम के बारे में सोचते हैं -- शांत और त्रासद प्रेम , जो आप उनके सामने प्रस्तुत करते हैं । वह उनकी अनेक कमियों , जैसे बदसूरत होने , रिश्तों में धोखेबाज़ी और पहली जनवरी को वेतन वृद्धि न होने की भरपाई कर देता है । तब वे ख़ुशी से आपकी नई पुस्तक के बारे में कहते हैं -- अच्छी रचना है ।
                   मुझे लगता है , आप यह जानने को उत्सुक होंगे कि वह व्यक्ति कैसा होगा जो मनुष्य से प्यार नहीं करता । ठीक है , मैं वैसा ही आदमी हूँ और मैं उनसे इतना कम प्यार करता हूँ कि जल्दी ही मैं बाहर जाकर उनमें से आधा दर्जन की हत्या कर दूँगा । शायद आप हैरान होंगे कि केवल आधा दर्जन ही क्यों ? क्योंकि मेरे रिवॉल्वर में केवल छह गोलियाँ हैं । अमानवीयता है न ? और एकदम असभ्य कृत्य ? लेकिन मैं आप को बताता हूँ कि मैं उनसे प्यार नहीं करता । मैं समझता हूँ , आप क्या महसूस करते हैं । किंतु जो कुछ आपको अपनी ओर खींचता है , वही मुझमें घृणा उत्पन्न करता है । मैंने आप ही की तरह लोगों को हर वस्तु पर निगाह रखे , बाएँ हाथ से इकोनॉमिक रिव्यू के पन्ने धीरे-धीरे पलटते हुए देखा है । क्या यह मेरी ग़लती है कि मैं समुद्री सिंहों को भोजन करते हुए देखना अधिक पसंद करता हूँ ? इंसान अपने चेहरे को शरीर-विज्ञान के खेल में बदले बिना उससे कोई काम नहीं ले सकता । जब वह मुँह बंद करके कुछ चबाता है तो उसके जबड़े के कोने ऊपर-नीचे होते रहते हैं । मैं जानता हूँ , आप इस दुख भरे आश्चर्य को पसंद करते हैं । पर मुझे इससे परेशानी होती है , न जाने क्यों ; मैं शुरू से ही ऐसा हूँ ।
                  यदि हम लोगों में केवल रुचियों का ही अंतर होता तो मैं आपको कष्ट नहीं देता । पर यह सब कुछ ऐसे घटित होता है जैसे सारी सज्जनता आपमें ही है , मुझमें कुछ नहीं । मैं न्यूबर्ग झींगे को पसंद या नापसंद करने के लिए तो स्वतंत्र हूँ , किंतु यदि मैं मनुष्यों को नापसंद करता हूँ तो मैं कमीना हूँ और सूरज की रोशनी तले मेरे लिए कोई जगह नहीं । उन्होंने जीवन की संचेतना पर जैसे एकाधिकार कर लिया है । मेरा ख़्याल है कि आप मेरा मतलब समझ जाएँगे । पिछले तैंतीस सालों से मैं ऐसे बंद दरवाज़े खटखटा रहा हूँ जिन पर लिखा है -- ' यदि आप मानवतावादी नहीं हैं तो आपके लिए प्रवेश निषिद्ध है । ' मुझे सब कुछ त्यागना पड़ा है । मुझे चुनाव करना पड़ा -- वह या तो असंगत और दुर्भाग्यपूर्ण प्रयत्न रहा या देर-सवेर वह उनके फ़ायदे में बदल गया । मैं खुद को उन विचारों से अलग नहीं कर सका , जिन्हें बनाते समय मैंने उनका स्थान साफ़-साफ़ नियत नहीं किया था । वे मेरे भीतर संघटित जातियों की तरह बने रहे । मेरे प्रयोग किए हथियार तक उनके थे । उदाहरण के
लिए , शब्द -- मैं अपने शब्द चाहता था , किंतु जिन शब्दों का मैं इस्तेमाल करता था , वे पता नहीं कितनी चेतनाओं से घिसटकर निकले हैं । उन आदतों के कारण जो मैंने दूसरों से पाई हैं , वे खुद-ब-खुद मेरे ज़हन में क्रमबद्ध हो जाते हैं । और यह भी असंगतिहीन नहीं है कि मैं लिखते समय उनका प्रयोग कर रहा हूँ । , हालाँकि यह अंतिम बार है ।
                   मैं आपको बताता हूँ , लोगों से प्रेम कीजिए वरना उन्हें हक़ है कि वे आपको बाहर खदेड़ दें । ख़ैर , मैं खदेड़ा जाना नहीं चाहता । जल्दी ही मैं अपना रिवॉल्वर लूँगा , नीचे सड़क पर जाऊँगा और यह सुनिश्चित करूँगा कि कोई उन लोगों का कुछ बिगाड़ सके । अलविदा । शायद आप ही वह हों जिससे मैं मिलूँगा ।
आप इस बात का अंदाज़ा बिलकुल नहीं लगा पाएँगे कि आपको हैरान करने में मुझे कितनी ख़ुशी होगी । यदि ऐसा नहीं होता -- और इसकी सम्भावना ज़्यादा है -- तो कल का अख़बार पढ़िएगा । उसमें आप पाएँगे कि पॉल हिल्बेयर नाम के शख़्स ने उन्माद के पल में छह राहगीरों की हत्या कर दी । समाचारपत्रों के गद्य के महत्त्व को आप औरों से अधिक समझते हैं । आप समझते हैं न कि मैं ' उन्मादी ' नहीं हूँ । इसके ठीक उलट मैं एकदम शांतचित्त हूँ और महोदय , मैं आप से प्रार्थना करता हूँ कि आप इन विशिष्ट भावनाओं में मेरे विश्वास को स्वीकार करें ।
                                                                                --- पॉल हिल्बेयर

                  मैंने वे एक सौ दो पत्र एक सौ दो लिफ़ाफ़ों में डाले और उन पर फ़्रांस के एक सौ दो लेखकों के पते लिख दिए । उसके बाद मैंने डाक-टिकटों की छह गड्डियों के साथ सब कुछ अपनी मेज की दराज में डाल दिया ।
                  अगले दो सप्ताह मैं बहुत कम बाहर निकला । मैंने खुद को धीरे-धीरे अपने अपराध में जज़्ब होने दिया । अकसर मैं शीशे में देखता कि मेरे चेहरे में ख़ुशी से बदलाव हो रहा है । मेरी आँखें बड़ी हो गयी थीं । ऐसा लगता था जैसे वे मेरे सारे चेहरे को खा रही हों । वे चश्मे के पीछे काली और कोमल लगती थीं और मैं उन्हें नक्षत्रों की तरह घुमाता था । वे आँखें किसी कलाकार या हत्यारे की आँखों की तरह तेज थीं , पर मैंने अंदाज़ा लगाया कि सामूहिक हत्याओं के बाद उनमें और भी गहरा परिवर्तन होगा । मैंने दो ख़ूबसूरत लड़कियों की फ़ोटो देखी है -- नौकरानियों की , जिन्होंने अपनी मालकिनों की हत्या करके उन्हें लूट लिया था । मैंने उनके पहले के और बाद के चित्र देखे हैं । पहले के चित्रों में उनके चेहरे किसी बदसूरत भूत के कॉलरों पर जमे शर्मीले फूलों-से दिखाई देते थे । किसी सतर्क घूँघट बनाने वाली कंघी ने उनके बालों को बिलकुल एक जैसा आकार दिया था । उनके घुँघराले बालों से भी ज़्यादा भरोसा दिलाने वाली चीज़ थी उनके कॉलर और फ़ोटोग्राफ़र के सामने होने का उनका अहसास । उनमें बहनापे की समानता लगती थी -- एक ऐसी समानता , जो फ़ौरन ख़ून के रिश्तों और प्राकृतिक-पारिवारिक सम्बन्धों को उजागर कर देती है । बाद की फ़ोटो में उनके चेहरे आग जैसे दैदीप्यमान थे । उनकी गर्दनें उन क़ैदियों की तरह नंगी थीं जिनके सिर अभी -अभी उड़ाए जाने हो । हर जगह झुर्रियाँ थीं । डर और घृणा की डरावनी झुर्रियाँ , जैसे कोई हिंस्र पशु उनके चेहरों पर चला हो और अपनी छाप छोड़ गया हो । और वे आँखें -- वे काली , उथली आँखें मेरी आँखों की तरह थीं ।
                   " यदि यह अपराध , जो अधिकांश में केवल अवसर था , " मैंने खुद से कहा , " इन लड़कियों के चेहरों को बदलने के लिए पर्याप्त है , तो मैं उस अपराध से क्या अपेक्षा नहीं कर सकता , जिसकी कल्पना मैंने स्वयं की है और जिसे मैं खुद शक्ल दूँगा । " वह मुझ पर अधिकार पा लेगा और मेरे सारे मानवीय भद्देपन को दूर कर देगा ... अपराध , जो उसे दोहरे रूप में करने वाले आदमी के जीवन को काट देता है । ऐसा समय आ सकता है जब कोई पीछे लौटना चाहे , पर यह चमकदार चीज़ उस समय आपके पीछे होती है , आपका रास्ता रोकती हुई । मेरी माँग केवल एक घंटे की थी ताकि मैं अपने कृत्य का आनंद ले सकूँ ।
                    मैंने ज़्यादा खर्चीली ज़िंदगी शुरू कर दी । मैंने रुए वेविन पर स्थित एक रेस्तराँ के मालिक से सुबह-शाम अपना खाना मँगवाने का प्रबंध कर लिया । वेटर ने घंटी बजाई पर मैंने दरवाज़ा नहीं खोला । मैंने कुछ मिनट इंतज़ार किया , फिर दरवाज़ा आधा खोला और फ़र्श पर रखी थाली में भाप छोड़ती बड़ी प्लेटें देखीं ।
                     27 अक्टूबर को शाम छह बजे मेरे पास कुल 17 फ़्रैंक और 50 सेंतीमे बचे थे । मैंने अपना रिवॉल्वर उठाया , चिट्ठियों का पुलिंदा लिया और नीचे चला गया । मैंने दरवाज़ा जानबूझकर बंद नहीं किया ताकि काम ख़त्म करके लौटते समय मैं ज़्यादा तेज़ी से भीतर आ सकूँ । मेरी तबीयत ठीक नहीं थी । मेरे हाथ ठंडे हो गए थे और ख़ून जैसे मेरे सिर में जमा हो रहा था । मेरी आँखों में जलन हो रही थी ।
मैंने होटल देस एकोलेस और स्टेश्नरी वाली दुकान की ओर देखा , जहाँ से मैं पेंसिलें ख़रीदता था । वे जानी-पहचानी नहीं लगीं । मुझे हैरानी हुई । मैंने खुद से पूछा , " यह कौन-सी सड़क है ? "
                        बुलेवा द्यूत मोंते पर्रनास्से लोगों से खचाखच भरा हुआ था । वे मुझे ठेल रहे थे । दबा रहे थे । अपनी कोहनियों या कंधों से मुझे धकेल रहे थे । मैंने खुद को धक्का लगाए जाने का विरोध नहीं किया । मुझमें उनके बीच घुसने की ताकत नहीं थी । किंतु अचानक मैंने खुद को उस भीड़ के बीचों-बीच पाया , भयावह रूप से लघु और अकेला । केवल चाहने भर से वे मुझे चोट पहुँचा सकते थे । मैं अपनी जेब में पड़े रिवॉल्वर के कारण डरा हुआ था । मुझे लगा कि लोग मेरे पास रिवॉल्वर होने का अनुमान लगा सकते हैं । वे अपनी तीखी निगाहों से मुझे घूरते और अपने पाशविक पंजों से मुझे बेधते हुए ख़ुशी भरी घृणा से कहते , " ऐ , तुम ... हाँ , तुम्हीं ... ! " वे मेरे चिथड़े उड़ा सकते थे । वे मुझे अपने सिरों से भी ऊपर उछाल सकते थे और मैं उनकी बाज़ुओं में कठपुतली की तरह वापस आ गिरता । मैंने अपनी योजना को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर देना बेहतर समझा । मैंने कूपोले में जा कर भोजन किया । वहाँ मैंने 16 फ़्रैंक और 80 सेंतीमे ख़र्च कर दिए । अब मेरे पास 70 सेंतीमे बचे थे और मैंने उनको गटर में फेंक दिया ।
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                         मैं तीन दिनों तक अपने कमरे में बिना कुछ खाए , बिना सोए पड़ा रहा । मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा था और मुझमें इतना साहस भी न था कि मैं खिड़की के पास चला जाऊँ या बत्ती जला लूँ । सोमवार को किसी ने दरवाज़े पर घंटी बजाई । मैंने अपनी साँस रोक ली और प्रतीक्षा करने लगा । फिर मैं पंजों के बल चलकर गया और अपनी आँख चाबी के छेद से लगा दी । पर मैं केवल काले कपड़े का टुकड़ा और एक बटन देख सका । उस आदमी ने दोबारा घंटी बजाई । फिर वह चला गया । मुझे नहीं पता , वह कौन था । रात में मुझे तरोताज़ा करने वाली चीज़ें दिखाई दीं -- तालवृक्ष , बहता हुआ पानी और गुम्बद के ऊपर नीला , लोहित आकाश । मैं प्यासा नहीं था , क्योंकि मैं हर घंटे नल पर जा कर पानी पी लेता था । पर मैं भूखा था ।
                          मुझे वह वेश्या फिर दिखाई दी । या वह मेरी कल्पना थी । यह सब एक क़िले में था जो शहर से 60 मील दूर कॉसेस नॉएरस में था । वह नग्न थी ।
अकेली । मेरे साथ । रिवॉल्वर से डराते हुए मैंने उसे घुटने के बल झुकने और हाथ-पैरों पर दौड़ने के लिए विवश कर दिया । फिर मैंने उसे एक खम्भे से बाँध दिया और      उसे अच्छी तरह यह समझाने के बाद कि मैं क्या करने वाला हूँ , मैंने उसे गोलियों से भून दिया । इन वेश्याओं ने मुझे इतना परेशान कर दिया था कि मुझे इसी से संतोष करना पड़ा । बाद में मैं अँधेरे में बिना हिले-डुले पड़ा रहा । मेरा सिर एकदम ख़ाली था । पुराना पलंग चरमराने लगा । सुबह के पाँच बज रहे थे । मैं कमरे से बाहर निकलने के लिए कुछ भी दे सकता था , पर मुश्किल यह थी कि सड़क पर लोगों के होने की वजह से मैं नीचे नहीं जा सकता था ।
                           फिर दिन निकल आया । अब मुझे भूख महसूस नहीं हो रही थी , लेकिन मुझे बेइंतहा पसीना आ रहा था । मेरी क़मीज़ पूरी तरह भीग चुकी थी । बाहर धूप निकली हुई थी । तब मैंने सोचा -- " वह बंद कमरे में अँधेरे से घिरा हुआ है । उसने तीन दिनों से न कुछ खाया है , न ही वह सोया है । उन्होंने घंटी बजाई और उसने दरवाज़ा नहीं खोला । जल्दी ही वह सड़क पर जाएगा और हत्याएँ करेगा । "
                            मैंने खुद को डराया । शाम को छह बजे मुझे फिर से भूख सताने लगी । मैं ग़ुस्से से पागल था । मैंने मेज-कुर्सियों से ठोकर खाई । फिर मैंने कमरों , रसोई और शौचालय की बत्तियाँ जला दीं , और बेहद ऊँची आवाज़ में गाने लगा । इसके बाद मैंने अपने हाथ धोए और बाहर चला गया । सारी चिट्ठियों को डाक के बक्से में डालने में मुझे पूरे दो मिनट लग गए । मैंने उन्हें दस-दस करके भीतर धकेला । कुछ लिफ़ाफ़े तो मैंने मोड़ भी दिए होंगे । फिर मैं बुलेवा द्यू मोंते पार्नास्से पर रुए ओडीसा तक बढ़ गया । मैं एक बिसाती की खिड़की के आगे रुका और जब मैंने अपना चेहरा देखा तो सोचा , " आज रात ! "
                             मैं रुए ओडीसा के सिरे पर रुक गया । सड़क का खम्भा मुझ से ज़्यादा दूर नहीं था । मैं इंतज़ार करने लगा । दो औरतें एक-दूसरे की बाँहों में बाँहें डाले गुज़रीं ।
                             मुझे ठंडा पसीना आ रहा था । कुछ देर बाद मैंने तीन आदमियों को आते हुए देखा । मैंने उन्हें जाने दिया । मुझे छह लोगों की ज़रूरत थी । बायीं ओर वाले आदमी ने मुझे देखा और जीभ से चटकारा लिया । मैंने अपनी आँखें घुमा लीं ।
                             सात बज कर पाँच मिनट पर एडगर-क्विनेट मुख्य मार्ग पर लोगों के दो झुंड आए । उनमें दो बच्चे , एक पुरुष और एक महिला थी । उनके पीछे तीन वृद्धाएँ थीं । मैं एक क़दम आगे बढ़ा । महिला ग़ुस्से में लग रही थी और छोटे लड़के की बाँह खींच रही थी । पुरुष धीरे से बोला , " कितना कमीना है ! "
                             मेरा दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि मेरी बाँह पर चोट कर रहा था । मैं आगे बढ़ा और उनके सामने खड़ा हो गया । जेब में मेरी उँगलियाँ रिवॉल्वर के ट्रिगर को घेरे हुए थीं ।
                             " माफ़ कीजिए । " पुरुष मुझसे टकराते हुए बोला । उसी समय मुझे याद आया कि मैंने अपने मकान का दरवाज़ा बंद कर दिया था और इससे मुझे ग़ुस्सा आ गया । मैं जान गया कि मुझे उसे खोलने में अपना क़ीमती समय नष्ट करना पड़ेगा । इस बीच वे लोग मुझसे और दूर होते जा रहे थे । मैं घूमा और यांत्रिक ढंग से उनके पीछे चलने लगा , पर अब मुझमें उन पर गोली चलाने की इच्छा नहीं बची थी ।
वे मुख्य सड़क पर भीड़ में खो गए । मैं दीवार के सहारे खड़ा हो गया । मैंने आठ और नौ बजे के घंटे सुने । मैंने खुद से दोहराया , " मैं इन लोगों को क्यों मारूँ जो पहले से ही मरे हुए हैं ! " और मैंने हँसना चाहा । एक कुत्ता आया और मेरे पैर सूँघने लगा ।
                                जब वह लम्बा-तगड़ा आदमी मेरे पास से गुज़रा तो मैं उछल कर उसके पीछे हो लिया । मैं उसके डर्बी हैट और ओवरकोट के कॉलर के बीच उसकी लाल गर्दन की झुर्री देख सकता था । वह चलते हुए थोड़ा उचक रहा था और गहरी साँसें ले रहा था । वह भारी-भरकम दिखाई देता था । मैंने जेब से अपना रिवॉल्वर निकाला । वह ठंडा और चमकदार था । उसने मेरे भीतर नफ़रत पैदा कर दी । मैं यह अच्छी तरह याद नहीं कर पा रहा था कि आख़िर मुझे उससे क्या काम लेना है । कभी मैं रिवॉल्वर को देखता , कभी उस आदमी की गर्दन को । मुझे लगा जैसे उसकी गर्दन की झुर्री मुझ पर कड़वी मुस्कान फेंक रही थी । मुझे हैरानी हुई कि कहीं मैं अपना रिवॉल्वर नाले में न डाल दूँ ।
                              अचानक वह आदमी मुड़ा और मुझे घूरने लगा । वह चिढ़ा हुआ था । मैं पीछे हटा ।
                              " मैं आपसे पूछना चाहता था ...। "
                              लगता था जैसे वह सुन ही नहीं रहा था । वह केवल मेरे हाथों की ओर देख रहा था । मुझे बात आगे बढ़ाने में मुश्किल हुई , " ... कि रुए दे लागाइते
को कौन-सा रास्ता जाता है ? "
                              उसका चेहरा भारी था । उसके होठ काँप रहे थे । वह कुछ नहीं बोला । उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया । मैं और पीछे हटा और बोला , " मैं चाहता ..."
                              तब मैं जानता था कि मैं चीख़ना शुरू कर दूँगा । मैं यह नहीं चाहता था । मैंने उसके पेट पर तीन बार गोली चलाई । वह बेवक़ूफ़ाना भाव लिए घुटनों के बल गिरा और उसका हाथ बाएँ कंधे पर लुढ़क गया ।
                              " हरामी कहीं का ," मैंने कहा , " सड़ा हुआ आदमी ! "
                              फिर मैं भागा । मैंने उसे खाँसते हुए सुना । मैंने शोर की आवाज़ और अपने पीछे भागते हुए क़दमों की चरमराहट भी सुनी । किसी ने पूछा , " झगड़ा हुआ था क्या ? " उसके ठीक बाद कोई चिल्लाया , " ख़ून ! ख़ून ! " मैंने सोचा , इस शोर का मुझसे कोई लेना-देना नहीं है ।
                              मैंने केवल एक बहुत बड़ी ग़लती कर दी थी -- रुए ओडीसा पर एड्गर क्विनेट की ओर भागने के बजाए मैं बुलेवा द्यू मौंतेपार्नास्से की ओर भाग रहा था । जब मुझे इसका अहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी । मैं भीड़ से घिर चुका था । हैरानी से भरे हुए चेहरे मुझे घूर रहे थे , ( मुझे एक महिला का भारी और खुरदरा चेहरा याद है जो पंखों के गुच्छे वाली एक टोपी लगाए थी ) और मैंने अपने पीछे रुए ओडीसा से आने वाली चिल्लाहटें सुनीं -- " ख़ून , ख़ून ! "
                               एक हाथ ने मुझे कंधे से पकड़ लिया । मैं अपना मानसिक संतुलन खो बैठा । मैं इस भीड़ के हाथों पिट कर मरना नहीं चाहता था । मैंने दो बार गोली चला दी । लोगों ने चीख़ना और इधर-उधर भागना शुरू कर दिया । मैं एक कैफ़े में घुस गया । मैं जब खाने-पीने वालों के बीच से हो कर भागा तो वे सब चौंके , पर किसी ने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की । मैंने कैफ़े के अंत में स्थित शौचालय में खुद को बंद कर लिया । अभी मेरे पास रिवॉल्वर में एक गोली बाक़ी थी ।
                              कुछ पल बीत गए । मैं बुरी तरह हाँफ़ रहा था और मेरी साँस फूल गई थी । सब कुछ असामान्य रूप से मौन था , जैसे लोग जानबूझकर शांत हों ।
मैंने रिवॉल्वर को अपनी आँखों के सामने किया और उसका छोटा-सा छेद देखा , गोल और काला -- वहाँ से गोली निकलेगी , पाउडर मेरा चेहरा जला देगा । मैंने बाँह नीचे की और इंतज़ार करने लगा । कुछ पलों के बाद वे आ गए । काफ़ी भीड़ होगी -- मैंने फ़र्श पर पैरों की आहट से अनुमान लगाया । वे कुछ फुसफुसाए और फिर शांत हो गए । मैं अभी ज़ोर-ज़ोर से साँस ले रहा था और सोच रहा था कि दरवाज़े के दूसरी ओर वे मेरी साँसों की आवाज़ सुन रहे होंगे । उनमें से कोई आगे बढ़ा और उसने दरवाज़े की कुंडी घुमाई । वह मेरी गोली से बचने के लिए ज़रूर दरवाज़े से चिपका खड़ा होगा । मैं अभी गोली चलाना चाहता था , लेकिन अंतिम गोली मेरे लिए थी ।
                              वे किसलिए प्रतीक्षा कर रहे हैं ? मुझे आश्चर्य हुआ । अगर उन्होंने अचानक झटके से दरवाज़ा तोड़ दिया तो मेरे पास इतना भी समय नहीं होगा कि मैं खुद को गोली मार सकूँ और वे मुझे ज़िंदा पकड़ लेंगे । पर उन्हें कोई जल्दी नहीं थी । वे मुझे मरने के लिए बहुत समय दे रहे थे । हरामज़ादे , सब-के-सब डरे हुए थे ।
                              कुछ देर बाद एक आवाज़ ने कहा , " ऐ ... दरवाज़ा खोल दे । हम तुझे मारेंगे नहीं । " फिर ख़ामोशी छा गई और उसी आवाज़ ने दोबारा कहा , " तू बचकर नहीं निकल सकता । "
                              मैंने कोई जवाब नहीं दिया । मैं अभी भी हाँफ़ रहा था । गोली चलाने लायक हिम्मत जुटाने के लिए मैंने खुद से कहा , " अगर उन्होंने मुझे पकड़ लिया तो वे मुझे पीटेंगे , मेरे दाँत तोड़ देंगे । हो सकता है , मेरी एक आँख ही निकाल लें । "
                              क्या वह विशालकाय आदमी मर गया था ? या मैंने उसे सिर्फ़ घायल किया था ? शायद दूसरी दोनों गोलियाँ भी किसी को न लगी हों ...। वे लोग कुछ तैयारी कर रहे थे । वे फ़र्श पर कोई भारी चीज़ घसीट रहे थे । मैंने तेज़ी से रिवॉल्वर की नली अपने मुँह से लगाई । पर मैं गोली नहीं चला पाया , यहाँ तक कि मैं अपनी उँगली भी ट्रिगर पर नहीं रख पाया । चारो ओर गहरा सन्नाटा था ।
                              मैंने रिवॉल्वर फेंककर दरवाज़ा खोल दिया ।

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प्रेषक : सुशांत सुप्रिय
           A-5001 ,
           गौड़ ग्रीन सिटी ,
           वैभव खंड ,
           इंदिरापुरम ,
           ग़ाज़ियाबाद -201014
           ( उ. प्र. )
मो: 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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