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         आ भी जाओ न !

कल तक यहीं थे हँसते खिलखिलाते,
कहाँ खो गए तुम भोले से चेहरे वाले ,
मुस्कान मेरी भी छीन कर ले गए तुम, 
आ भी जाओ न सबको मुस्कान देने वाले। 

हवा का शीतल सुगंधित सा झोंका,
तुझ जैसा ही चंचल रुका था, न रोका,  
मधु शर्मा कटिहा
मधु शर्मा कटिहा
हल्के से छूता है जब मेरे चेहरे को,
बंद कर लेती हूँ पलकें महसूस करने को। 

पेड़ों की हरियाली मेरे मन का ही बिम्ब है,
ओस की बूँद याद दिलाती वो पल है,  
मिलकर तुमसे जब मन हरा  हो गया था, 
बिछड़ते हुए आँसू गालों पर रुक  गया था। 

सुनहरी दोपहर तपती तपिश गर्मी की,
जलती हूँ मैं भी कुछ तेरे प्यार में यूँ ही,
तरस खाकर मुझ पर घिर आए बादल,
तुम्हारी तरह थे बरस न पाये.. पागल!

रातें धागा विरह का कैसे लपेटूँ,
तारे बिखरी यादें कैसे समेटूँ , 
मैं पृथ्वी हूँ भीगी तेरी चाँदनी से अब,  
खड़ा चाँद सा तू देखता है दूर से सब।  

चाँदअगर तू मैं धरती तो इतना बता जा,
चाँद तो पृथ्वी के है चक्कर लगाता, 
तू सब भूलकर बैठा इक जगह पर, 
क्यों मन ये मेरा फिर तेरे फेरे लगाता।   

न मिल पाया तू न दिया संदेश है कोई, 
हारकर सपनों की दुनिया में खोई, 
देखना ! तू मिल गया नींद में कहीं जो, 
न जागूँगी फिर, रहूँगी बस मैं  सोई।   

  
उगते सूरज का रंग वो हल्का गुलाबी,
मेरा सब कुछ रंगकर हो गया बस गुलाबी, 
गुलाबी  रंग में डूबा  है घर-बार मेरा, 
आ जाओ हो जाएँ दोनों गुलाबी-गुलाबी। 

         -मधु शर्मा कटिहा  


यह रचना  मधु शर्मा कटिहा जी द्वारा लिखी गयी है . आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से लाइब्रेरी साइंस में स्नातकोत्तर  किया है . आपकी कुछ कहानियाँ व लेख  प्रकाशित हो चुके हैं।
Email----madhukatiha@gmail.com 

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  1. विरह वेदना की अच्छी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति हुई है...सुंदर कविता के लिए बधाई

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    1. आपने अपना अमूल्य समय मेरी कविता को दिया इसके लिए आभारी हूँ आपकी....समीक्षात्मक टिप्पणी देखकर इतनी उत्साहित हूँ कि कुछ नया लिखने की चाह हो रही है। बहुत शुक्रिया अनमोल जी....

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