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सियासत ने पाला है

हर्षित दूबे
इक अश्क गिरा दूँ , तो जल जायेगा शहर
वो क़ौम हूँ मै जिसको सियासत ने पाला है ।

पूछो तो बताऊँ क्या है ये संविधान
सोने कि दीवारों पें , मकड़ी का जाला है ।

जन्मों की कसमें खाता हूँ हर शब मैं जिसके साथ
इक रोज़ वो सनम भि जुदा होने वाला है ।

समन्दर कि कोख़ में जो अमृत का घड़ा है
आदम को मिल गया तो ज़हर होने वाला है।

बहरा हूँ मैं , मेरा ईमान नाम है
किसी तक़रीर से मेरा क्या भला होने वाला है ।

उनका ज़िहाद देख कर लगता है ये मुझको
ज़न्नत में भि हूरों पे ज़ुल्म होने वाला है ।

शायर हि तोड़ते हैं मज़हब के भरम को
हिंदी जो इनकी माँ है तो उर्दु भी ख़ाला है ।

ज़रदारो ने ख़रीदे हैं ,इतिहास के पन्नें
शहीदों का नाम जल्द हि गुम होने वाला है ।

'हर्षित' न साझा कर तू दिल के दर्द को
बस आगे आगे देख क्या होने वाला है ।

यह रचना हर्षित दूबे जी द्वारा लिखी गयी है . आप अभी विधि विद्यार्थी हैं व साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनी चलाते हैं . 
संपर्क सूत्र - Contacts - 8090721273
www.panditharshitdubey.blogspot. com
Twitter : @harshit.dubey888
Instagram : iharshitdubey

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