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 उड़ जा रे पंछी.....

सुदूर एक गाँव ,गाँव का घर
घर का भीत ,भीत पर कागा
कागा का काँव काँव
आज भी होता है।
पर माँ नहीं निकलती पूछने
कि, ए कागा उचरअ
हमार बाबू आवअ ताणें?
वो जानती है कि
वो जा चुका है...
कर्तब्य पथ पर इतना आगे
जहाँ से कोई वापस नहीं आता।
आती हैं कुछ सुर्खियाँ अखबारों की
कुछ दिलासा के शब्द
बजते हैं कुछ गीत शहादत के।
माँ वहीं बैठी है
घर की देहरी पर
देखती टुकुर टुकर
घर का भीत,भीत पर कागा।
कह रही कागा से कि
उड़ जा रे पंछी कि
अब यहाँ कोई नहीं आने वाला.....
                
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(2)
     पायल....
सबको भाती है 
नाजुक नवयौवना पायल
उसकी रुनझुन से
झंकृत होता है
 निशा राय
 निशा राय
घर आंगन ।
पर धीरे धीरे पायल 
हो जाती है पुरानी
खो देती है अपनी जवानी।
नयी पायलों का आना जाना 
लगा रहता है
इनकी चमक से 
प्रकाशित होता है 
घर ऑगन,
पर वहीं कहीं 
घर की सबसे पुरानी पायल 
पड़ी रहती है उपेक्षित सी
बेजान तस्वीर के जैसी।
खुशी के मौकों पे
लोग जाते हैं आते हैं
वो बूढ़ी पायल 
डटी रहती है घर में
समझती खुद को चौकीदार
उसे कौन बताए कि 
वो हो चुकी बेकार
नही किसी को 
उसकी दरकार।
बेरंग पुरानी पायल
ना खुद चमकती है 
ना कोई चमकाता है
ना खुद छनकती है
ना कोई छनकाता है
उसका होना ना होना
कहाँ मायने रखता है।
पड़ी रहती है कहीं कोने में
किसान विकास पत्र की तरहा
भॅजने की प्रतीक्षा मे.....
                      
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(3)  
"वर्षगाँठ"

'सुधिया' को 
पैदा हुए कई वर्ष हो गये 
पर वर्षगाँठ न पड़ी एक भी
वो पूछती है माँ से बार बार 
माँ कहती है 
कि ठीक ठीक याद नहीं कब
शायद शुक था
नई नई सनीचर
'बुधिया' तब साल भर की थी
साझ का बेरा था
बड़ी गरमी थी
बादर उमण घुमण रहे थे 
पर बरस नाही रहे थे
मवेसी चर के आ गये थे
दुवारे दुवारे घूर बरा गया था
घरे घरे दिया जर गया था
तभी पीर उठी थी 
महरिन काकी आयीं थी
औ, खाए पीये के बेरा तक तू हो गयी थी। 
माँ ! मेरी उमर कितनी है?
'सुधिया' ने पूछा।
माँ ने कहा अभी का उमर भयी है
'निधिया' से दू ही साल तो बड़ी हो
अरे मझली फूआ का लइका औ तुम एके जोड़ी पाड़ी के तो हो
'सुधिया' झल्लाई, जोर से चिल्लाई
माँ ! तारीख कौन सी थी?
माह और वर्ष क्या था?
मुझे भी मेरी वर्षगाँठ मनानी है
नये कपड़े पहनने हैं
और मिठाई खानी है
माँ ने 'सुधिया' को समझाया
बिटिया ! हम कितना तारीख याद रखबैं
तुम्हरा ? 
कि तुम्हरी दिदिया का?
तुम्हरा भइया का? 
कि तुम्हरी बहिनी का?
एही नाले हमारे यहाँ 
बस बरष होता है
बरषगाँठ नाही होती ।
आ नवा कपड़ा पहनना है
मिठाई खानी है
तो बियह देगे दुई साल में
तब पहनना नवा कपड़ा
डोली में धई देंगे दू झापी लड्डू। 
मिठाई खाने के लिए 
वर्षगाँठ की का जरूरत?
           
                     

(4)
"शहंशाह का आगमन"

शहर में गहमागहमी है...
सुना है शहंशाह आ रहे है...
हैं चौक चौराहे चाक चौबंद,
लगने लगे हैं टाट में मखमली पैबंद।
सड़कें बुहारी जारही हैं,
मलिन बस्तियाँ उजाड़ी जा रही हैं।
हो रहा चहुँओर सौन्दर्यीकरण, पर
बिगड़ रहा किसी दीन के जीवन का समीकरण।
शहंशाह की नजर जहाँ तक जाएगी,
वहाँ तक 
बस खुशी ही नजर आएगी।
फुटपाथों से अवैध अतिक्रमण हटाए जारहे हैं,
जहाँ हाथ थक रहे वहाँ बुल्डोजर बुलाए जा रहे हैं।
बुल्डोजर गिरा रहा है एक बदसूरत सी दीवार,
तबाह हो रहा किसी का खूबसूरत संसार।
टूटी दीवार से नजर आ रहा है..
एक टूटा चूल्हा,एक पिचकी तसली
एक फूटी हड़िया,एक खाली थाली
हाँ दीवार के पीछे कोई है 
जो गठिया रहा है
मैले से टुकड़े में..
बची खुची , टूटी फूटी 
एक वैध गृहस्थी ।
निकलना है सफर पे
तलाशनी है जमीन
किसी सड़क के किनारे
किसी नाले के पास
करना है अवैध अतिक्रमण
पिचकी तसली,
फूटी हड़िया के साथ 
बसानी है नये सिरे से
एक वैध गृहस्थी...
शहंशाह के पुनर आगमन तक....
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(5) हार जीत के फण्डे

कथरी गुदरी सब फींच रही
डोकनी परयी सब माँज रही
कल शाम को मुखिया आए थे
कह गये कि भैया आएँगें
दुख दर्द सुनेंगे दुनिया की
पर घर तेरे ही खाएँगे
      तुम भाग्य पे अपने इतराओ
      जाओ जाकर राशन लाओ
      संग मन्त्री संन्त्री आएँगे
      अरे वो भी तो कुछ खाएँगे
डरकर किवाड़ ना बन्द करो 
जाओ जाकर के प्रबन्ध करो
वो डरकर थर थर काँप रहीं
चुपचाप ही बगलें झाँक रही
        अब कैसे उनको बतलाए
        कैसे उनको यह समझाए
        कि एक छोटी सी चादर में
        घर भर ने पाँव समेटे है
        इकलौती खटिया आँगन में
        बुढ़िया माँ जिस पर लेटे है
उस रेशम कुर्ताधारी को 
क्या टाट पे ही बैठाएँगी
मेवा मिसरी ना सम्भव है
क्या गुड़ भेली ही खिलाएँगी
      अरी बावली वो क्या समधी हैं
      जो आकर जम ही जाएँगे
      वो पल दो पल को आएँगे
      फोटो वोटो खिचवाएँगे
      तुम टीवी पर आ जाओगी
      अखबारों में छप जाओगी
ये पल दो पल का मेला है
कुछ और नहीं बस खेला है
इस खेल का तुम एक हिस्सा हो
बस कुछ मिनटों का किस्सा हो
किरदार निभाओ तुम अपना
फिर भूलो जैसे हो सपना
       कल फिर से काम पे जाना है
       मेहनत करके ही खाना है
       ये आना खाना और जाना
       चुनाव के सब हथकन्डे हैं
       हम जीव कहाँ उन नजरों में
       बस हार जीत के फण्डे हैं।
       हम जीव कहाँ.................
       बस हार ......................।।
                        निशा राय

                     रामअवध नगर 
                        खोराबार
                        गोरखपुर

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