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                     शाम से होती है !   


अजीब से इक जुनून की इब्तिदा शाम से होती है,
रिश्तों के दस्तूर को समझने की क़वायद शाम से होती है , 
शाम से होती हैमुहब्बत का तो कोई उसूल, न फ़लसफ़ा ही है,
फिज़ूल बने क़ायदे तोड़ने की ख़्वाहिश शाम से होती है।

कोई सिर्फ नाम के रिश्ते रह जाते हैं यहाँ,
कभी रिश्तों के नाम ढूँढता रह जाता है जहां, 
रिश्ते तो बहुत देखे, सुने, निभाएँ हैं हमने, 
इक उलझे रिश्ते से सुलझी गुफ़्तगू शाम से होती है।

तेरी यादों ने ,अपनी सी बातों ने ज़ार-ज़ार रुलाया है, 
इश्क़ में अजनबी बन जाना तुम्हें किसने सिखाया है?  
भूल जाऊँ मैं भी तो, होगी ये मुहब्बत की तौहीन,
बेवफ़ा को बावफ़ा नाम देने की गुज़ारिश शाम से होती है।

तेरी आरज़ू थी मेरे लिए सबसे बढ़कर, 
जज़्बात भी तो थे, मेरे सबसे हटकर , 
तुझे मेरा नाम, मेरा वजूद याद हो या न हो,
वजूद को तेरे भुलाने की मेरी कोशिश शाम से होती है। 

ख़त लिखे तो बहुत तुझे, पर डाला नहीं कोई,
मेरी ज़ुबां तेरी समझ में शायद आए न कभी,
समझ पाये जो लफ़्ज़ तू ,वही सोचा करती हूँ मैं, 
फिर अल्फ़ाज़ों को सजाने की कोशिश शाम से होती है।

तू दूर है तो क्या, तेरा अक्स तो क़रीब है, 
तू न सही तेरी तस्वीर तो मेरी रफ़ीक है , 
तू आएगा न कभी जानती हूँ बखूबी मैं, 
फिर भी इंतज़ार की शुरुआत शाम से होती है। 

- मधु शर्मा कटिहा 

यह रचना  मधु शर्मा कटिहा जी द्वारा लिखी गयी है . आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से लाइब्रेरी साइंस में स्नातकोत्तर  किया है . आपकी कुछ कहानियाँ व लेख  प्रकाशित हो चुके हैं।
Email----madhukatiha@gmail.com 

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