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अपर्णा शर्मा
अपर्णा शर्मा
मीरा जिस छोटे कस्बे में जन्मी, पली, बढ़ी और पढ़ी शादी के बाद उसी कस्बे के दूसरे मौहल्ले में पति ज्ञानी के साथ गृहस्थ जीवन शुरू किया। ज्ञानी अपनी माँ की इकलौती संतान थे। जब तक माँ गाँव में घर जमीन की देखभाल करने में समर्थ थी वहाँ रही और बाद में बेटे के परिवार के साथ आकर रहने लगी।
    समय के साथ मीरा और ज्ञानी की दो बेटियाँ हुई। नौकरी बहुत बड़ी नहीं थी। बस अपना घर बना लिया था इसीसे कुछ राहत थी। बड़ी बेटी पढ़ने में सामान्य रही। उसकी शादी पास ही के शहर में कर दी गई। छोटी बेटी पर ज्ञानी जी की उम्मीदें टिकी थीं। बेटी ने उन्हें पूरा भी किया और पढ़ाई पूरी कर एक मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी पा ली। बस समस्या थी कि पहली नियुक्ति ही घर से काफी दूर हुई। इससे मीरा को छोटी बेटी का जाना बहुत खला। सास के स्वर्गवास ने उसे और अकेला कर दिया। घर में सदस्यों की घटी संख्या ने बाजार की खरीदारी और घरेलू काम को भी घटा दिया।
    ज्ञानी की तरक्की हुई तो बाहर जाने के अवसर बढ़ गए। विगत सप्ताह जब वे अपनी छोटी बेटी से सरकारी काम से किसी बड़े शहर में जाने की चर्चा कर रहे थे तो बेटी ने जोर देकर कहा- “पापा मम्मी को भी साथ लेकर जाना। घर में वह अकेली क्या करेंगी और वे अभी कहीं दूर जगहों पर गई भी नहीं हैं। उनका खर्च मैं दूंगी।”
    बात ज्ञानीजी को भी ठीक लगी। उन्होंने अपने साथ पत्नी का भी रिजर्वेशन करा लिया। नियत तिथि को पति-पत्नी दोनों बड़े शहर के एक बड़े होटल में जाकर ठहर गए।     मीरा पहली बार किसी बड़े होटल में ठहरी थी। छोटे कस्बे में रहने वाली और द्वितीय श्रेणी के सरकारी कर्मचारी की पत्नी के जीवन में ऐसे मौके बामुश्किल ही मिलते हैं। यह तो इत्तफाक ही था कि पति सरकारी काम से इस शहर में आ रहे थे जो धार्मिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए बेटी के समझाने पर मीरा ने यहाँ आने का मन बनाया था। ज्ञानी जी तीन चार बजे तक सरकारी काम से निवृत्त हो जाते। फिर पत्नी को लेकर शहर घूमने निकल जाते। शहर साफ सुधरा और बड़े-बड़े मंदिरों वाला था। शाम के समय की वहाँ की भीड़, आरती और कीर्तन में मीरा का खूब मन रमा। जिन यात्राओं को वह निरर्थक और समय व पैसे की बर्बादी मानती थी वह उन्हें सार्थक लगने लगी। धार्मिक स्थलों पर भी इतना अनुशासन व सुरक्षा रखी जाती है इसका एहसास उन्हें यहीं आकर हुआ। इस पर मंदिरों की सफाई और अलंकरण तो देखते ही बनता था। यहाँ वह सहज महसूस करती थी। जबकि होटल का माहौल उसके लिए थोड़ा असहज था। यह एकदम अलग वातावरण था। पति मीरा को हर बात समझाते रहते-कैसे चलना है? किस तरह बोलना है? डायनिंग रूम में भोजन करने के तौर-तरीके क्या हैं? लिफ्ट आदि का प्रयोग कैसे करना है? वगैरहा-वगैरहा। मीरा हर बात को ध्यान से सुनते हुए वातावरण को समझने जाँचने की कोशिश कर रही थी। कभी-कभी अपनी जिज्ञासाओं को भी बूझ रही थी।
    दो दिन बाद मीरा रानी को कपड़ों की धुलाई और प्रेस की आवश्यकता महसूस होने लगी। वे साबुन तो घर से लेकर चली थी पर यहाँ बाल्टी और मग नहीं था। मीरा ने पति से कहा कि वे इन चीजों की व्यवस्था यहाँ कराने के लिए किसी से कहें। पति ने समझाया- “यहाँ कपड़े धोने की इजाजत नहीं है। धुलाई व प्रेस कराना पड़ता है।”
    ज्ञानीजी ने अलमारी में रखा एक लाण्ड्री बैग पत्नी को दिखाते हुए उसी के साथ रखा एक पम्फलेट उनके हाथ में धमा दिया और समझाया- “इसमें हर कपड़े की धुलाई और प्रेस का रेट लिखा है। जो कपड़ा देना है बैग में रख दो और फोन कर बता दो क्या कराना है। कर्मचारी आकर ले जाएगा।” थोड़ा रूक कर ज्ञानी जी फिर समझाने लगे- “हाँ और इस रेट लिस्ट को पहले ध्यान से पढ़ लो। बाद में पैसा देने में दिक्कत महसूस न हो।”
    मीरा लाण्ड्री रेट लिस्ट को पहले धीरे-धीरे फिर थोड़ा ऊँची आवाज़ में पढ़ने लगी- “बनियान अण्डरवियर धुलाई सौ रूपए, शर्ट धुलाई प्रेस डेढ़ सौ रूपए, साड़ी प्रेस डेढ़ सौ रूपए, कुर्ता पायजामा.....।” मीरा देवी एक सांस में पूरी लिस्ट पढ़ गई और फिर मुस्कुराते हुए पति को देखने लगी।
    ज्ञानी जी बोले- “कुछ समझ में आया?”
    “आया।”
    “क्या?”
    दो मिनट के मौन के बाद मीरा देवी ने कुछ वाक्य कहे- “क्यों लाखो का वेतन पाने वाले पति-पत्नी दोनों कमाते हुए भी एक फ्लैट के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं और किस तरह एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दुमंजला घर बनाकर एक मंजिल किराए पर उठा देता है।”
लेखिका
डॉ.  (श्रीमती)  अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।
शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)
प्रकाशित रचनाएं –
भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994, ISBN: 81-85396-10-8.
खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010, ISBN: 978-81-90911-09-7-8.
पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012, ISBN: 978-81-8097-167-9.
सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012, ISBN: 978-81-8097-168-6.
जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014, ISBN: 978-81-8097-190-7.
चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-800-0 (PB).
विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-801-7 (PB)
मैं किशोर हूँ  (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-802-4 (PB).
नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-808-6 (PB).
जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-803-1 (PB).

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।
सम्पर्क -
डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई. जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद, (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514, दूरध्वनिः + 91-08005313626, ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

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