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उलाहना

उलाहने गैरों को दिए नहीं जाते
अपनों को न देना पड़ता
तो अच्छा था।

पैबंदों से दुकूल अच्छे नहीं लगते
रिश्तों को यूँ चीरा न गया होता
तो अच्छा था।
डॉ. शुभ्रता मिश्रा

ग्रंथियों को खोलना कितना मुश्किल है
गांठ को बाँधा ही न होता
तो अच्छा था।

समृद्ध तो सब अपने घरों के होते हैं
शब्दों का दारिद्रय न दिखाया होता
तो अच्छा था।

संतोष की सीमाएँ भी सबकी अपनी हैं
यूँ असंतोष न जताया होता
तो अच्छा था।

व्यस्तताओं के बहाने कितने अच्छे हैं
याद कर लेने का एक पल चुराया होता
तो अच्छा था।

समय क्यों कम सा लगने लगा है, अब तो जाना है
सबसे मिलकर जा पाते
तो अच्छा था।

तिनके-तिनके बिखरे पड़े हैं बटोरना कितना मुश्किल है
छूटने से पहले सब बँध जाते
तो अच्छा था।

हर अश्मता पर नयन जो नम हो जाते हैं
लाड़ करके यूँ छोड़ा न होता
तो अच्छा था।

उलाहनों का क्या है, लम्बी फेहरिस्त बनती है
एक भी सुन लिया होता
तो अच्छा था।

ये भी सच है कि जो सुन लेते
तो उलाहना ही न रह जाता
उलाहने को उलाहना ही रहने देते हैं
यही सबसे अच्छा है।

शुभ्रता


डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042,
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

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