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पृथ्वी की प्राकृतिक प्रयोगशाला : अंटार्कटिका

अंटार्कटिका पृथ्वी का सातवाँ महाद्वीप सामान्यतौर पर "श्वेत मरुस्थल" के नाम से प्रसिद्ध रहस्य व आश्चर्य की भूमि है। हिम का विशाल विस्तार, प्रचण्ड जलवायुविक परिस्थितियाँ तथा भूमण्डल के अन्य भागों से इसकी दूरस्थ एकांतता वस्तुतः इसे एक "अन्य विश्व" के रुप में निरुपित करती है। आज से लगभग पाँच करोड़ वर्षों पूर्व अंटार्कटिका उष्ण जलवायु, सदाबहार वनों तथा विभिन्न प्रकार के अनेक जीवजन्तुओं से युक्त महाद्वीप था, परन्तु वर्तमान में यह सिर्फ एक हिम-मरुस्थल है और विश्व की विशालतम बंजरभूमि है। लाखों वर्षों पूर्व अंटार्कटिका, भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रलिया, न्यूज़ीलेण्ड तथा दक्षिण अमेरिका एक दूसरे से जुड़े हुए थे और यह अधिमहाद्वीप "गोंडवाना लेण्ड" के नाम से जाना जाता था। कुछ 18 करोड़ वर्षों पूर्व भूपटल के अंदर बलों द्वारा खिंचाव के परिणामस्वरुप यह पृथक हो गया था और तभी से अपसरण भी प्रारम्भ हो गया था। महाद्वीपीय अपसरण आज भी जारी है और दक्षिणी गोलार्धीय समुद्रतल 1-6 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की दर से फैल रहा है।

अंटार्कटिका
अंटार्कटिका
अंटार्कटिका को "हिमझंझावातों का गृह", "पैंग्विन भूमि", "हिमीय महाद्वीप", "दक्षिणी महाद्वीप" या "विश्व का विशालतम प्रशीतित्र" नाम भी दिए गए हैं। अतिशीतता, अतिशुष्कता, अतिप्रचण्डता, अतिवातता और अति अगम्यता जैसी अनेक चरमताओं वाले इस महाद्वीप में लगभग छः माहों तक निरन्तर दिन एवम् छः माहों तक निरन्तर रात्रि रहती है। यहाँ का निम्नतम तापमान -89.60 सेंटीग्रेड होता है। हिमझंझावातों के दौरान यहाँ 190 किलोमीटर प्रति घण्टे की हवाएँ चलती हैं। विश्व के अलवणीय जल का लगभग 90 प्रतिशत भाग बर्फ के रुप में अंटार्कटिका में ही भण्डारित है। यद्यपि यह विश्व का पाँचवा सबसे बड़ा एक करोड़ चालीस लाख वर्गकिलोमीटर क्षेत्रफल वाला महाद्वीप है, तथापि आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इसका सबसे विशाल स्थायी निवासी एक पंखरहित मक्खी है। अंटार्कटिका को पैंग्विनों की भूमि कहते हैं क्योंकि वे ही वहां मिलते हैं, परन्तु वैज्ञानिक स्तर पर अब यह स्पष्ट हो चुका है कि वे वहाँ के मूलनिवासी नहीं हैं।
अंटार्कटिका में 150 से भी अधिक झीलें हैं। वोस्टॉक झील इनमें सबसे विशाल है और इसकी खोज 1996 में रुस के वोस्टॉक स्टेशन के नीचे की गई थी। भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गाँधी के नाम पर रखी
गई प्रियदर्शनी झील भी इनमें से एक है, जो भारत के स्थायी स्टेशन मैत्री के सामने श्रीमाचेर मरुद्यान में स्थित है। इस महाद्वीप में कोई भी वृक्ष, घास या सामान्य बड़े प्राणी नहीं पाए जाते हैं। अँटार्कटिका के कुछ भागों में मिलने वाले जीवों में प्रमुखतया प्रारम्भिक जीवरुप जैसे जीवाणु, कवक, शैवाल, लाइकेन और काई ही पाए जाते हैं।
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
कोई भी साधारण जलयान अंटार्कटिका नहीं जा सकता, क्योंकि वहाँ का समुद्र बर्फ की अत्यधिक मोटी परत बन जाने से जम जाता है, जिससे उसे तोड़कर रास्ता बनाने की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि वहाँ विशिष्ट विशाल हिमभंजक जलयानों द्वारा ही जाया जाता है। वहाँ पुरे शरीर को पूरी तरह ढँकने की आवश्यकता होती है। हवा की प्रचण्डता से बचने के लिए सिर पर एक मोटी टोपी और कई गरम कपड़े पहनने होते हैं। हाथ के मोटे दस्ताने, पैरों में विशेष ध्रुवीय मोजे, भर्फ पर चलने वाले बूट और सनग्लास पहनने होते हैं। यदि भूल से कोई अंटार्कटिक तूफानों में फँस जाता है तो बर्फ के कण शरीर पर किसी पैंनी पिनों या रेजरों जैसी चुभतीं हैं। किसी दाढ़ी वाले व्यक्ति की तो पूरी दाढ़ी पर ही बर्फ जम जाती है और उसे हटाना बड़ा कष्टदायक होता है।
अंटार्कटिक महाद्वीप भविष्य का दर्पण है। यह साहसिक कार्यों, अन्वेषणों व पर्यटन के लिए पृथ्वी का सबसे सटीक स्थल है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अंटार्कटिका आज भी विश्व का अल्पतम अन्वेषित भाग है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वास्तव में अंटार्कटिका विज्ञान शोधों के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला है क्योंकि यह अपने विपुल रहस्यों से परिपूर्ण एक अप्रतिम भूखण्ड है। इसकी अद्वितीय जलवायु, वायु प्रवृत्ति, जल के तीनों रुपों यथा बर्फ, जल व वाष्प के मध्य अन्तर्क्रिया, लघु तरंग सौर विकिरण, श्वेत धवल परिस्थितियाँ तथा सर्वाधिक असामान्य मौसमिक प्रवृत्तियाँ वैज्ञानिकों के लिए वृहत् चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं।
वह क्या है, जो अंटार्कटिका की ओर सम्मोहित करता है ? क्यों अंटार्कटिका में परिमित शीतलता है और क्यों पृथ्वी के इस दूरस्थ कोने में इतना अधिक हिम संचयन हुआ है ? इसके चारों ओर के महासागरों में बिछे विशाल हिम चादर, इसके वातावरण और भूमण्डलीय जलवायु पर इसके प्रभाव के पीछे क्या कारण हो सकते हैं ? हिम के अंदर क्या भण्डारित है और हिम में उपस्थित गैसों व अन्य पदार्थों की विशाल मात्रा भूतकाल के विषय में क्या प्रकट करती है ? इस तरह के प्रश्न भले ही साधारण से प्रतीत होते हों, परन्तु उनके उत्तर निश्चय ही अत्यधिक जटिल हैं तथा उनको समझने के लिए उच्चस्तरीय वैज्ञानिक क्षमताओं को विकसित करना अत्यावश्यक है। इसके अलावा, अंटार्कटिका से सम्बद्ध विविध घटनाओं को समझने के लिए उत्कृष्ट श्रेणी की गुणवत्ता वाले उपकरणों व मानवीय तितिक्षा की आवश्यकता है। क्षमताओं और अंटार्कटिका जैसे महाद्वीप में भविष्य में प्रयोगों के सम्पादन हेतु मूलभूत सुविधाओं को निर्मित करना अपने आप में एक अपरिमित वैज्ञानिक चुनौती है।
इन्हीं वैज्ञानिक चुनौतियों से संघर्ष करने के लिए विश्व के अन्य देशों की भाँति भारत से भी प्रतिवर्ष अंटार्कटिक अभियानों को भेजे जाने का सिलसिला 6 दिसम्बर 1981 से लगातार चला आ रहा है । अंटार्कटिका में भारत ने अब तक तीन स्टेशनें क्रमशः दक्षिण गंगोत्री, मैत्री व भारती स्थापित की हैं। इनमें से अब केवल मैत्री व भारती में ही शोधकार्य किए जा रहे हैं क्योंकि दक्षिण गंगोत्री बर्फ में दब चुकी है। अब तक कुल 35 से अधिक भारतीय अंटार्कटिक अभियान भेजे जा चुके हैं। भारतीय वैज्ञानिक भी पृथ्वी की इस प्राकृतिक प्रयोगशाला में अपनी वैज्ञानिक मेधा का लोहा मनवा रहे हैं।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042,
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

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