0
Advertisement

              पहुँची कि नहीं ?

बारिश शुरू हुई टपटप, आ गया मुस्कुराता सावन,
भीगी फिर मन की मिट्टी, रिमझिम हुआ ये मन,
मिट्टी की वो महकती सुहानी सी खुशबू उड़कर ,
अब तक भी तेरी रूह तक, पहुँची कि नहीं ?

जानती हूँ तुझे सिर्फ जीत की आदत है,
हार गयी हूँ मैं अब, सब कुछ बस तेरा है,
जिताकर तुझे मैं चहक रहीं हूँ कब से,
कानों में तेरे कुहूक अब तक, पहुँची कि नहीं?

चुप रहकर भी सब बोला, तुझे ही पुकारा है,
हर कविता में मैंने बस तुझे ही उकेरा है,
मेरे गीतों से झाँकती तेरी चमकती सी तस्वीर,
तेरी आँखों तक अब भी, पहुँची कि नहीं?

कभी साथी, प्रेमी तो कभी बच्चा बन जाते हो,
ज़िन्दगी के सब रंग एक साथ दिखा देते हो,
बोलो, मेरे प्यार के रंग-बिरंगे रूपों की फुहार,
तुमको भिगोने अब तक भी पहुँची कि नहीं ?



यह रचना  मधु शर्मा कटिहा जी द्वारा लिखी गयी है . आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से लाइब्रेरी साइंस में स्नातकोत्तर  किया है . आपकी कुछ कहानियाँ व लेख  प्रकाशित हो चुके हैं।
Email----madhukatiha@gmail.com 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top