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मेरी माँ 

गहरा प्रेम , असीमित दयालुता ,उदार मन ,धैर्य ,कठोर परिश्रम और प्रसन्नता का भाव ,यही हैं वे गुण जो आदर्श माँ में पाए जाते हैं . मैं जब से थोड़ा बहुत जानने -समझने की उम्र में पहुँची हूँ ,मैंने तब से देखा है कि मेरी माँ सूर्योदय होने के पहले उठ जाती थी ,रसोईघर की सफाई करती थी और मेरे लिए गर्म नाश्ता हमेशा ही ठीक समय पर तैयार कर देती थी . जब मैं स्कूल से लौटती थी तो माँ को अपनी प्रतीक्षा करते हुए पाती थी . गेट पर मेरी एक झलक पाकर उसका चेहरा मुस्कराहट से खिल उठता था और आँखें ख़ुशी से ऐसे चमक उठती थी जिन्हें शब्दों में बयान कर पाना मेरे लिए कठिन है . 
मेरी माँ मितभाषी यानी बहुत कम बोलने वाली स्त्री है . मुझे याद नहीं आ रहा है कि कभी उसने क्रोध में ऊँचे सुर
में कुछ कहा हो .इसके बावजूद हम सब उससे डरते थे ,यहाँ तक कि मेरे पिता जी भी . हम जब भी किसी परेशानी या उलझन में पड़ते थे तो हमें यह बिश्वास रहता कि वह उसका समाधान जरुर निकाल लेगी .हम सभी भाई -बहन परामर्श ,अपनत्व और समर्थन के लिए उस पर निर्भर थे .
मेरी माँ
जब हम बच्चे थे हमें इस बात का अहसास नहीं हो पाता था कि उन चमत्कारी भोजनों को बनाने में ,घर को साफ़ -सुथरा और आरामदेह बनाने में ,पोशाकों को धोने और इस्त्री करने में तथा टिफ़िन बाक्सों को तैयार करने में कितना परिश्रम मेरी माँ को करना पड़ता था . ऐसा लगता था जैसे माँ के पास असीम उर्जा हो .दिनभर खूब काम करने के बावजूद पड़ोसी से गपशप करने ,बीमार सहेली को देखने जाने और नौकरानी कमला की व्याथाओं को धैर्यपूर्वक सुनने का समय भी वह निकाल लेती थी. 
आज की माताएँ शिक्षित हैं .मेरे ऐसे कई मित्र हैं जिनकी माताएँ कार्यालयों और स्कूलों में काम करती हैं . किन्तु मैं जानती हूँ मेरे माँ पढ़ी -लिखी है .वह मुझे मेरे होमवर्क पूरा करने में सहायता करती है .उसने मुझे सिलाई करना ,बुनाई करना और बगीचे की देखभाल करना सिखाया है .उसने मुझे सभ्य ,शिष्टाचार और व्यवहार सिखाये हैं जो एक सुसभ्य -सुसंस्कृत महिला से अपेक्षित होता है . सचमुच में मेरी अपनी पूरी परवरिश और दुनिया के बारे में जो थोड़ा बहुत विवेक बुद्धि मैं अर्जित कर पायी हूँ उसका सारा श्रेय मेरी माँ को ही जाता है .उसे मुझे अच्छी शिक्षा दी है . 

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