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मेंहदी है जनाब

नाम उनका अपने नाम के साथ हथेली पर ,
लिख दिया हमने सबकी नज़रें बचाकर ,
मधु शर्मा कटिहा
मधु शर्मा कटिहा
देखकर उनको पास आते ही कर ली बंद मुट्ठी ,
और झट से कह दिया हाथों में 'मेंहदी है जनाब !'

याद हमारी एक दिन आ गयी उन्हें यूँ ही ,
पैग़ाम भेजकर हमें बुला रहे थे वो कहीं ,
इंकार पर हमारे पूछ ही बैठे वो हमसे ,
भुला दिया सब या लगी पैरों में 'मेंहदी है जनाब?'

सर-ए-महफ़िल ग़ज़ल में नाम हमारा गुनगुना दिया ,
हमने शर्म से मूँद ली पलकें और सिर भी झुका लिया ,
पास आकर कानों में इस अंदाज़ से बोले वो कि,
हया की सुर्खी है गालों पर या फिर 'मेंहदी है जनाब !'

ज़हन में बीते लम्हों का कारवां गुज़रता है ,
ख्यालों में बार-बार वही अक्स उभरता है ,
पड़ जाए चंद दिनों में फ़ीका ये वो रंग नहीं ,
रंग-ए-मोहब्बत है ये,नहीं कोई 'मेंहदी है जनाब.'

यह रचना  मधु शर्मा कटिहा जी द्वारा लिखी गयी है . आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से लाइब्रेरी साइंस में स्नातकोत्तर  किया है . आपकी कुछ कहानियाँ व लेख  प्रकाशित हो चुके हैं।
Email----madhukatiha@gmail.com 

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