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आस्था,विश्वास और जिजीविषा के  कवि : महेन्द्रभटनागर

-डा॰ गीता दुबे
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर कवि महेन्द्रभटनागर का रचना-संसार अत्यंत व्यापक है। इस संसार पर कई कोणों से विचार हो चुका है, पर कुछ का आकलन बाक़ी भी है। सन् 1941 से लेखन-जगत में पदार्पण करनेवाले कवि की रचनाएँ तत्कालीन प्रसिद्ध पत्र- पत्रिकाओं यथा- हंस, जनवाणी, रक्ताभ, नया साहित्य, नया पथ, जनयुग आदि में निरंतर प्रकाशित और प्रशंसित हो रही थीं। महेन्द्र जी की पहली ही कृति 'तारों के गीत'(1949) ने अपने प्रकाशन के साथ ही आलोचकों की दृष्टि आकर्षित की थी । मुक्तिबोध जैसे कवि आलोचक ने उनके आरंभिक काव्य-संकलन ‘टूटती शृंखलाएँ’ पर विचार करते हुए लिखा था - "तरुण कवि वर्तमान युग के कष्ट, अंधकार, बाधाएँ, संघर्ष, प्रेरणा और विश्वास लेकर जन्मा है। उसके अनुरूप उसकी काव्य-शैली भी आधुनिक है। इस तरह वह ‘तार-सप्तक’ के कवियों की परंपरा में आता है ; जिन्होंने सर्वप्रथम हिंदी काव्य की छायावादी प्रणाली को त्याग कर नवीन भावधारा के साथ- साथ नवीन अभिव्यक्ति शैली को स्वीकृत किया।...... इस अत्याधुनिक के समीप और उसका भाग बनकर रहते हुए भी कवि की अभिव्यक्ति शैली में दुरूहता नहीं आ पाई । भाषा में रवानी, मुक्त-छंदों का गीतात्मक वेग और अभिव्यक्ति की सरलता , काव्य-शास्त्रीय शैली में कहा जाय तो माधुर्य और प्रसाद गुण महेन्द्रभटनागर की उत्तरकालीन कविताओं की विशेषता है। किंतु सबसे बड़ी बात यह है, जो उन्हें पिटे-पिटाए रोमांटिक काव्य-पथ से अलग करती है और ‘तार-सप्तक’ के कवियों से जा मिलाती है वह यह है कि अत्याधुनिक भाव-धारा के साथ टेकनीक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से उनका उत्तरकालीन काव्य Modernistic या अत्याधुनिकतावादी हो जाता है। उसका प्रभाव ह्रदय पर स्थाई रूप से पड़ जाता है। श्री महेन्द्रभटनागर वर्तमान युग चेतना की उपज हैं।" 
महेन्द्रभटनागर
मुक्तिबोध जैसे सक्षम आलोचक जिस कवि को वर्तमान चेतना और चुनौतियों से जोड़कर देखते हैं, उसकी रचनाओं के प्रति सहज रूप से आश्वस्त हुआ जा सकता है और आद्योपांत पढ़े जाने पर कवि महेन्द्रभटनागर की काव्य-कृतियाँ गहराई तक प्रभावित करते हुए अपनी शक्ति और व्याप्ति के प्रति आश्वस्त करती हैं। सच्चा जनवादी कवि कहलाने का गौरव उसे ही  मिलता है जो जनता के दुख-दर्द और समस्याओं को न केवल महसूस करता है, बल्कि उसके निदान के  लिए भी निरंतर प्रयासरत रहता है। कवि महेंद्र का काव्य इस कसौटी पर इस मायने में खरा उतरता है कि वह आम जनता की पीड़ा से पीड़ित और दर्द से द्रवित ज़रूर होते हैं भले ही उसका निदान कर पाने में सक्षम न हों, तभी तो इंसानों की खोती इंसानियत और बेईमानी से बेचैन होकर वह अनायास ही कह उठते  हैं -
"कितना खुदगरज़ हो गया इंसान।
बहुत खुश है 
पाकर तनिक-सा लाभ
बेचकर ईमान।"
कवि स्वभाव से आशावादी होता है । विध्वंस के स्तूप पर खड़ा होकर भी वह सृजन और सौन्दर्य का स्वप्न देखने की हिम्मत या हिमाक़त करता है और वही उसकी शक्ति और सामर्थ्य का परिचायक भी है। कवि महेन्द्र भी इसके अपवाद नहीं हैं । वह भी मानवता के उत्थान का स्वप्न देखते हुए मानव और मानव के बीच बढ़ती दूरियों को मिटाना चाहते हैं, आदमी और आदमी के बीच के भय और अविश्वास को मिटाकर वह एक स्वस्थ समाज की रचना हेतु जनता का आह्वान करते हैं-
"इस स्थिति को बदलो कि आदमी आदमी से डरे,
इन हालात को हटाओ कि आदमी आदमी से नफ़रत करे।"
कवि का उद्देश्य कल्पना के पंख लगाकर आकाश-लोक में विचरण करना मात्र नहीं होता, वह इस संसार की विषमताओं को समझकर, उसका चित्रण मात्र कर अपने दायित्व की इति नहीं समझता, बल्कि कभी-कभी समस्याओं से निपटने का रास्ता दिखाने की कोशिश भी करता है । अब यह दायित्व तो पाठकों का है कि वे अनुभव और ज्ञान की रोशनी से दमकते इस पथ पर चलने का साहस दिखा पाते हैं या नहीं। महेन्द्रभटनागर की कविताएँ अपने पाठकों को निरंतर मनुष्यता का सच्चा और सही रास्ता दिखाने के प्रति प्रतिबद्ध नज़र आती हैं। कवि वाम विचार- धारा का विश्वासी है, पर कहीं भी यह विचारधारा थोपी हुई या आरोपित नज़र नहीं आती। वह अपनी एक ही इच्छा से निरंतर सृजनरत है और वह इच्छा है - साधारण आदमी को बेहतर इंसान में बदलने की इच्छा। वह साम्यवाद का स्वप्न देखने के साथ-साथ मानववाद का स्वप्न भी देखना चाहता है और इसी नाते बड़े विश्वास के साथ कहता है-
"घबराए, डरे-सताए
मोहल्लों में/ नगरों में / देशों में 
यदि-
सब्र और सुकून की बहती सौम्य - धारा चाहिए, 
आदमी - आदमी के बीच पनपता 
यदि-
प्रेम-बंध गहरा भाईचारा चाहिए,
तो-
विवेकशून्य अंधविश्वासों की कन्दराओं में 
अटके - भटके आदमी को 
इंसान नया बनना होगा।
युगानुरूप 
नया समाज शास्त्र विरचना होगा। "
और अपने दिखाए इस आलोकमय पथ को वह अपनी सृजनात्मकता के द्वारा निरंतर प्रशस्त करते हुए , जनता के उत्थान के लिए, अपने स्व को विसर्जित कर, जग-चिंतन के द्वारा, धरती को सुंदर से सुदंरतम बनाने की बात करता है-
" आओ, दीवारों के घेरों / परकोटों से बाहर निकलें !
अपने सुख-चिंतन से ऊपर उठ कर
जन- क्रंदन को स्वर -सरगम में बदले।"
कवि की काव्य-कृति 'बदलता युग ' के सन्दर्भ में लिखा गया डॉ॰ रामविलास शर्मा का यह अभिमत महेन्द्रभटनागर की सृजन-शक्ति के प्रति पाठकों को ही नहीं, आलोचकों तक को आस्था और विश्वास से भर देता है, " कवि महेन्द्रभटनागर की सरल, सीधी ईमानदारी और सच्चाई पाठक को बरबस अपनी तरफ खींच लेती है। प्रयोग के लिए प्रयोग न करके , अपने को धोखा न देकर और संसार से उदासीन होकर संसार को ठगने की कोशिश न करके इस तरुण कवि ने अपनी समूची पीढ़ी को ललकारा है कि जनता के साथ खड़े होकर नई जिंदगी के लिए आवाज़ बुलंद करे। " 
‘महेन्द्रभटनागर-समग्र’ में संकलित कवि की कविताओं में जहाँ ज़िंदगी की बेहतरी की आकांक्षा है, वहीं संसार को व्यथित और विकृत करने  वाली हर छोटी बड़ी समस्या पर उसकी दृष्टि गई है - वह भ्रष्टाचार हो या शोषण का चक्र। कवि मनुष्य के भविष्य-पथ पर छाए अँधेरे के साम्राज्य की भयावहता के प्रति चिंतित है -
" मनुष्य के भविष्य-पंथ पर
अपार अंधकार है / प्रगाढ़ अंधकार है।" 
लेकिन इस अंधकार से कवि-मन भयभीत नहीं होता, बल्कि वह ज्ञान और स्नेह का दीप जलाकर अँधेरे को चीरकर नई रोशनी की आभा फैलाते हुए साधारण मनुष्य को मुक्ति की राह दिखाता है -
"आज मेरे स्नेह से दीपक जलाओ।!
गिर रही हैं जीर्ण दीवारें सहज में
टूटती हैं शीर्ण मीनारें सहज में,
हो नया निर्माण, जर्जरता हटाओ!
आज मेरे स्नेह से दीपक जलाओ।"
प्रेम का दीप जलानेवाला जनवादी-आशावादी कवि आपनी लेखनी की मशाल से शोषण की जंज़ीरों को काटकर फेंक देने को दृढ-संकल्पित है। कवि की लेखनी अपने सुख के लिए सृजन नहीं करती, बल्कि उसका उद्देश्य पूरे समाज में रोशनी की मशाल जलाना  है। निराला की तरह  वह 'अंध उर के बंधनों' को काटकर, सभ्य और स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु कृत-संकल्प है , तभी तो वह अपनी लेखनी की सार्थकता नव- निर्माण में मानता है और बड़े भरोसे के साथ कहता है-
"लेखनी मेरी !
समय-पट पर चलो ऐसी कि जिससे 
त्रस्त जर्जर विश्व का फिर से नया निर्माण हो !
क्षत, अस्थि-पंजर, पस्त-हिम्मत
मनुज की सूखी शिराओं में रुधिर -उत्साह का संचार हो !"
कवि महेन्द्र की दृष्टि देश के हर कोने में व्याप्त , हर विषमता और हर उतार-चढ़ाव की ओर जाती है। साम्यवादी कवि देश और समाज की विषमता से विचलित नहीं होता। वह उस विषमता को नुकीले सवाल में ढालकर पाठक को कोंचते हुए उसे भी प्रश्नाकुल करता है। मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम इसी कारण कहा था कि धर्म के नाम पर जितना खून मानव-सभ्यता  के इतिहास के  पन्नों पर बहाया गया है, उतना संभवतः किसी और वज़ह से नहीं बहा होगा। आज भी अपनी तमाम आधुनिकता के बावज़ूद ,इक्कीसवीं सदी में खड़ा आदमी, अपनी तकनीकी उपलब्धियों पर इतराता और आर्थिक , वैज्ञानिक समृद्धि पर गर्व करनेवाला तथाकथित सभ्य इ़सान सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म के सवाल पर किस हद तक जुनूनी हो सकता है यह किसी से छिपा नहीं है। सभ्य मनुष्य की यह असभ्य परिणति कवि को व्यथित करती है और वह क्षोभ से भरकर प्रश्नों के तीर चला बैठता है-
"आधुनिक विश्व में
 'धर्म' के नाम पर कैसा जुनून है ?
सभ्य प्रदेशों में 
ज़िंदा बर्बर कानून है,
सर्वत्र - खून ही खून है !"
इस तरह आधुनिकता पर प्रहार करती कई और विषम समस्याएँ कवि का ध्यानाकर्षित करती हैं और वह अपनी छोटी-छोटी लघु कलेवर की कविताओं में आधुनिक समाज के खूबसूरत चेहरे के दाग-धब्बों का बेबाक़ बयान करता है, एक बानगी देखें- (कविता – ‘त्रासदी’)
"गरीब था
अछूत था
डर गया !
भूख से 
मार से 
मर गया !
शोक से 
लोक से 
तर गया ! "
इस तरह कई-कई छोटी-छोटी कविताओं में कवि जीवन के बड़े-बड़े, अभी तक अनसुलझे सवालों की ओर संकेत करता हुआ ,बार-बार उनका हल तलाशने की कोशिश बड़ी शिद्दत से करता दिखाई देता है। महेन्द्रभटनागर की कई कविताओं में जहाँ एक बेचैनी है जो उनके कवि- मानस को चैन से बैठने नहीं देती; वहीं उनका खुद पर , अपनी कविता और विचारधारा पर गहरा भरोसा भी दिखाई देता है। वह हर बात को सही तरीक़े से से न केवल कहने का सलीका जानते हैं, बल्कि अपनी कहन की शैली और विश्वसनीयता से पाठकों को भी सहज ही बाँध लेने का हुनर भी जानते हैं। विश्वास-प्रदीप्त होकर अपने जनवादी तेवर की बानगी पेश करते हुए अपनी 'जनवादी' शीर्षक कविता में बड़े साहस के साथ ऐलान करते हैं-
" अनुचित करेंगे नहीं , अनुचित सहेंगे नहीं !
  अधिकार-मद-मत्त सत्ता - विशिष्टो!
  तुम्हारी सफल धूर्तता और चलने न देंगे। "
सजग-सफल और सच्चा कवि वही होता है जो न केवल अपने देश को सही मायने में जानता और पहचानता है; बल्कि समय और सत्ता के हर बदलाव को भी उसकी पैनी दृष्टि तुरंत भाँप लेती  है। वह सत्ता और सत्ता-धारियों के पाखंड को न केवल समझता है बल्कि उनके मुखौटों को नोंचने का हौसला भी दिखाता है, इसी कारण कवि महेन्द्र की राजनीतिक कविताओं में तत्कालीन राजनीति की विसंगतियों पर व्यंग्य और उससे भी आगे जाकर क्षोभ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अपनी ' विचित्र' शीर्षक कविता में हैरान-परेशान कवि बड़ी विवशता से यह लिखने को बाध्य होता है-
" यह कितना अजीब है !
आज़ादी के तीन-तीन दशक बीत जाने के बाद भी
पांच पांच पंचवर्षीय योजनाओं के रीत जाने के बाद भी 
मेरे देश का आम आदमी गरीब है !
बेहद गरीब है !
- -- -- --- ---
शासन अंधा है , बहरा है, 
जन-जन का संकट गहरा है !   
( खोटा नसीब है ! )"
लेकिन कवि की वास्तविक ताक़त उसकी आशावादिता में है । नसीब को कोसने के बावज़ूद, वह निराश हुए बिना,  परिवर्तन की आकांक्षा से भरकर कहता है-
"आओ चोट करें / घन चोट करें
परिवर्तन होगा
धरती की गहराई में कंपन होगा "
कवि सीधे सहज शब्दों में रचित अपनी ओजपूर्ण कविताओं में आदर्श समाज की रचना का स्वप्न देखते हुए श्रम की शक्ति पर आस्था रखता है और सर्वहारा वर्ग को हाशिए से उठाकर समाज के केन्द्र में स्थापित करना चाहता है। मज़दूरों और श्रमिकों के लिए कवि ने बहुत सी कविताएँ लिखीं हैं जो उसके जनवादी रुझान को तो दिखाती ही हैं, उस के मानवतावादी स्वरूप को भी उभारती हैं। कवि की इस ऊर्जा को आलोचक शिवकुमार मिश्र इस प्रकार व्याख्यायित करते हैं-
" वह (कवि ) निराश और हताश इस नाते नहीं है कि उसके पास वह इतिहास-दृष्टि है , जो उसे बताती है कि आदमी जिंदा है और जिंदा रहेगा - हर आपदा-विपदा के बावजूद, क्योंकि उसके पास श्रम की शक्ति है , और श्रमजीवी कभी नहीं मरा करता। "
कवि महेन्द्र ने प्रकृति, सौन्दर्य और प्रेम जैसे विषयों पर भी कविताओं की रचना की है । इनकी प्रकृतिपरक कविताओं की तुलना कई आलोचकों ने केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं से की है। इसका एक कारण संभवतः बसंती हवा को लक्ष्य कर लिखी गई उनकी कविता 'अननुभूत : अस्पर्शित' है , हालाँकि यह कविता केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'बसंती हवा ' से बिल्कुल अलग मिजाज की कविता है, बानगी देखिए -
"लहकती-बहकती बसंती हवाओ!
छुओ मत मुझे
इस तरह मत छुओ ! "
प्रेम जैसे विषय पर लिखते हुए कवि प्रेम को किस तरह दो परस्पर विरोधी रूपों में प्रस्तुत करता है;  यह दर्शनीय है
"जिंदगी में प्यार से सुंदर
कहीं, कुछ भी नहीं ! कुछ भी नहीं !
..... ....
जिंदगी में प्यार से दुष्कर
कहीं / कुछ भी नहीं / कुछ भी नहीं !"
उत्साही कवि प्रकृति, प्रेम और सौन्दर्य के गीत गाने के साथ ही जीवन को सुंदर और सरस बनाने वाले त्योहारों के गीत भी गाता है । वह होली, दीवाली पर कविताएँ लिखने के साथ; हुलसते हुए नई सदी का स्वागत भी करता है और सुंदर भविष्य के स्वप्न सजाते हुए अनायास कह उठता है -
" आगामी सौ वर्षों में -
वि-ज्ञान सूर्य की अभिनव किरणों से
आलोकित हो मानव- मन !
अंधे विश्ववासों से, अंधी आस्था से ऊपर उठकर ,
मिथ्या जड़ आदिम
तथाकथित धर्मो की कट्टरता से होकर मुक्त -
नई मानवता का 
सच्चा पूजक हो जन -जन !"
महेन्द्रभटनागर ने छंदबद्ध और मुक्त-छंद दोनों ही तरह की कविताओं और गीतों की रचना की है; जो अपनी लयात्मकता और गेयता से सहज ही प्रभाव छोड़ते हैं । वस्तुतः एक गीतकार के रूप में ही अपनी काव्य-यात्रा का आरंभ करनेवाले महेन्द्र ने तकरीबन 1965 तक छंदबद्ध कविताओं की रचना के बाद मुक्त-छंद में लिखना शुरू किया; लेकिन लयात्मकता का दामन नहीं छोड़ा।
महेन्द्रभटनागर की एक बड़ी विशेषता है , उनकी निरंतर सृजनशीलता। 1941 में अपनी काव्य-यात्रा का आरंभ करनेवाले महेन्द्रभटनागर आज भी 90 वर्ष की आयु में निरंतर सृजनरत हैं। वर्ष 2015 में प्रकाशित उनका काव्य-संग्रह 'जीवन राग ' उनकी सजगता, प्रतिबद्धता और सृजनशीलता का प्रमाण प्रस्तुत करता है। तकरीबन 250 पृष्ठों में सिमटे इस काव्य-संग्रह में कवि के पूर्व-प्रकाशित संग्रहों की कविताओं को समेटते हुए कुल 187 कविताएँ संकलित हैं । जैसा कि प्रायः होता है, एक लंबी उम्र गुज़ार लेने के बाद कवि एक तटस्थ दृष्टि से अपने आस-पास के परिवेश ओर घटनाओं का आकलन करता है , ऐसा भाव इस संग्रह की कविताओं का भी एक प्रमुख रंग है। कभी-कभी वह अपने आपको उपेक्षित समझ कर उदासीनता से  भर उठता है। जीवन एक लंबी प्रतीक्षा में बदल जाता है, तयशुदा जीवन-शैली और घटनाएँ जीवन में उत्साह और उत्सुकता के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती। कवि एक दार्शनिक की तरह अपनी उपलब्धियों का आकलन करते हुए जीवन की एकरसता से ऊब जाता है  और दिन की समाप्ति पर अज्ञेय की कहानी 'रोज़' की नायिका मालती की तरह गहरी साँस छोड़ते हुए बरबस कह उठता है-
"आज का भी दिन 
हमेशा की तरह
चुपचाप / बीत गया !"
लेकिन यह कहते हुए झिझक नहीं होना चाहिए कि कवि की तमाम हताशा, निराशा या एकरसता पर उसकी जीवन के प्रति आस्था और विश्वास भारी पड़ते हैं। तभी तो अपनी जीवंतता का परिचय देते हुए महेंन्द्र अपनी छोटी सी कविता 'प्रेय' में लिखते हैं
" आस्था -दीप / जलता रहे
 सपना एक / पलता रहे
आत्म -साधन के लिए इतना बहुत है !
जीवन - चक्र / चलता रहे
यम का पाश / छलता रहे
प्राण -धारण के लिए इतना बहुत है !"
कविता छोटी,  पर अर्थ-गांभीर्य से परिपूर्ण है। मनुष्य का जीवन एक साधना है। निरंतर जिजीविषा ही व्यक्ति को सही अर्थ में जीवन जीने का संदेश देती है। जीवन निष्काम हो सकता है; पर निरुद्देश्य या निर्रथक नहीं। जीवन को आस्था , विश्वास और संपूर्ण सक्रियता से जीना ही कर्मयोग है और कवि महेन्द्र भी एक कर्मयोगी की तरह अपनी जिजीविषा को निरंतर क्रियाशील रखते हुए जीवन के इस पड़ाव पर भी विश्वास से कहते नज़र आते हैं-
" रुकावट हटाते हुए हम चलेंगे,
अँधेरा मिटाते हुए हम चलेंगे। "
वस्तुत महेंद्र सतत आस्था और जिजीविषा के कवि हैं और यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति या उपलब्धि है । नई पीढ़ी के नौजवान कवियों को महेन्द्र की कविता नया रास्ता दिखाते हुए ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का हौसला ही नहीं देती, नित नई चुनौतियों से टकराने और मृत्यु से भी दो-दो हाथ करने का साहस भी देती हैं। चिता पर बैठकर गीत गाने का बूता बिरले ही लोगों में होता है । कवि का यह साहस ही  उसकी पूँजी है और यह पूँजी कभी ख़त्म नहीं होती बल्कि उम्र  के साथ निरंतर बढ़ती जाती है। तभी  तो वह हिम्मत से कहते हैं -
" सतत आश - विश्वास के स्वर 
समय बीन पर मैं बजाता रहा हूँ!
डगर पर घिरा है अंधेरा सघन,
भयावह निखिल आज वातावरण,
घटाएँ घिरीं और गरजा गगन,
मरण की चिता फर विजय गान गाता रहा हूँ!"
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गीता दूबे, 
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता।
पता - 58a/1 प्रिंस गुलाम हुसैन शाह रोड, यादवपुर, कोलकाता-700032
मो. 9883224359






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