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मासूम चेहरा (भाग २ )

 प्रिया तुरंत सूटकेस में अपने कपड़े डाले और पुरे मोहल्ले में नमिता को बदनाम कर चली गई | सब को यही बताया कि "मैं दूसरे समाज की हूँ इसलिए 'सास'ने मुझे अपनाया ही नहीं,मैंने भरसक प्रयास किया,लेकिन उन्होंने हमेशा मुझ पर अत्याचार ही किया | मैंने वो भी सहे क्योंकि माँ ने तो यही सिखाया कि ससुराल ही तेरा घर है | लेकिन आज उन सभी ने मिलकर मुझे जबरदस्ती घर से धक्के देकर निकाल दिया |"
      पूरे मोहल्ले में नमिता की साख गिर गई और नमिता उसका तो जैसे घर से निकलना ही मुश्किल हो गया | वह सोचने लगी कि "मैंने तो उसे आजतक जोर से बोला तक नहीं फिर पूरी बस्ती में इसने मेरा नाम क्यों बदनाम कर दिया |" नमिता रजत से सारी बात जानना चाह रही थी लेकिन रजत को तो खूद कुछ समझ नहीं आ रहा था | रजत ने आज पहली बार ऐसे दोगले मूँह वालो को देखा था | दो दिन बाद रजत थोड़ा संयत हुआ तब अपनी माँ को सारी बात बताई | माँ से कहा "मैं गाँव वाले घर में रहने चली जाती हूँ ,मेरे और तेरे बाबूजी के कारण तेरे जीवन में तू जहर मत घोल |" 
चित्र साभार - गूगल .कॉम 
       नमिता अपने पाती के साथ गाँव चली गई | रजत जब प्रिया को लाने उसके घर पहुंचा तो वहाँ ताला पाया | कुछ समय की प्रतीक्षा के बाद दो आदमी उस ताले को खोलने लगे | रजत ने आगे बढाकर पूछा "यहाँ जो परिवार रहता था ,वह कहाँ गया |" उन दोनों ने उस परिवार से अपनी अनभिज्ञता जताई |
        रजत ने सारी  बात फोन पर अपनी माँ को बता दी | माँ भी बहुत विचलित हो गई | नमिता अपने पति  के साथ पुन: घर आ गई तथा सविता से सम्बन्ध साधा | सविता भी कहीं बाहर गई हुई थी |नमिता अपने आपको कोस रही थी | उसने सविता का मोबाइल नंबर मिलाया लेकिन वह भी स्विच ऑफ आ रहा था | प्रिया का रिश्ता सविता ने ही तो बताया था इसलिए उसे पूरा विश्वास था कि सविता के जरिये वह प्रिया के बारे में कुछ जान सकेगी | रजत का मन काम नहीं लग रहा था | उसने दफ्तर से छुट्टी ले ली और प्रिय को खोजने में मारा-मारा फिरने लगा | 
             एक दिन नमिता पास के बगीचे में विचारमग्न बैठी थी | उसी समय एक प्रौढ़ा सविता को विचारमग्न देख उसके करीब बैठ गई | वह प्रौढ़ा नमिता से बतियाने लगी किन्तु नमिता ने "हाँ हूँ" कर जवाब दिया | प्रौढ़ा ने  नमिता से पूछा "कोई गम्भीर समस्या |" नमिता ने "न" बोलकर ताल दिया | नमिता सोचती कि किसी अजनबी के साथ हमें अपनी घरेलू  बातें बाँटनी नहीं चाहिए | किन्तु प्रौढ़ा भी हार मानने वालों में नहीं थी | वह थोडा और करीब आकर कहने लगी "यदि कोई समस्या जिसका समाधान हम न निकाल पाएँ तो उसे किसी  से कहा दो हो सकता है कोई उम्मीद की किरण दिखाई दे "|
क्रमश:

यह रचना जयश्री जाजू जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं . आप कहानियाँ व कविताएँ आदि लिखती हैं . 

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