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चाह है कि गीत मैं कुछ ऐसा गाता चलूँ


चाह  है  कि  गीत  मैं कुछ  ऐसा गाता चलूँ
दर्द  सारे  गोद  ले   मैं  चूमकर  दुलार  दूँ
चीखती  पुकार  सभी  मैं  गीत से  सँवार दूँ
सजल सिसकती आँख को आस की पतवार दूँ
और  उखड़ती साँस को  इक  नई रफ्तार दूँ
गीत  ऐसा  मैं चुनूँ  जग की पीड़ा  गा  सकूँ
भूपेन्द्र कुमार दवे
भूपेन्द्र कुमार दवे
चाह  है  कि  गीत  मैं कुछ  ऐसा गाता चलूँ

भटके हुए  पंथी को  मंजिल की  पुकार दूँ
मोड़ पर  ठहरे हुओं की राह भी सँवार दूँ
नक्शे-कदम  दिखते  रहें  हौसले हजार दूँ
शूल  फूल से लगें  ऐसा पथिक को तार दूँ
धूल धरती की उड़े  तब भी  मैं चलता रहूँ
चाह  है  कि  गीत  मैं कुछ  ऐसा गाता चलूँ

प्रार्थना के  पुष्प  को  पुण्य  का  श्रंगार दूँ
साधना को सफलता का  इक नव उपहार दूँ
स्वर्ग-सा सुख सबको मिले बस यह संसार दूँ
उमर की बगिया  सजे  ऐसे  सब  संस्कार दूँ
बुझते  दियों को  कुछ  रोशनी-सी  देता चलूँ
चाह  है  कि  गीत  मैं कुछ  ऐसा गाता चलूँ

प्रेम को  अमरत्व  मिले  वो निखरता प्यार दूँ
प्यार पाने का मैं  हर किसी को  अधिकार दूँ
फूल हर डाल खिलें   ऐसा चमन को प्यार दूँ
मुग्ध  हो  मधुमास भी  जब  उन्हें श्रंगार दूँ
सूखी हुई  मुस्कान में  ताजगी  भरता  चलूँ
चाह  है  कि  गीत  मैं कुछ  ऐसा गाता चलूँ

           
 यह कविता भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.      

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