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सुदूर क्षितिज के पार भी, तुम्हें देख सकता हूँ मैं....

इस छोर से उस छोर तक की
दूरी तय कर सकता हूँ मैं,
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

अपने नेत्रों से विशाल मैदानों पर अविराम दौड़ते हुए,
अनगिनत पहाड़ों को छलांगते हुए,
घनघोर बादलों में से गुज़र भीगते हुए,
संदीप श्याम शर्मा
संदीप श्याम शर्मा
आंधी, धूल-धूसरित तूफ़ान से टकराते हुए,
तुम्हारी आँखों के लाल डोरों तक को
स्पष्ट निहार सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

भीषण बिजलियों की कड़कड़ाहट,
नदी, झरनों, जल प्रपातों के शोर
और कई पक्षियों, जानवरों के कलरव
को दरकिनार कर तुम्हारे ह्रदय की धड़कन को
सुन सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

मिट्टी, बसंत-पुष्प या
केसर-चन्दन उपवन की गंध हो,
विचलित हुए बिना,
कुछ देर से बंद तुम्हारी मुठ्ठी
में आये पसीने की ख़ुशबू तक को
सूंघ सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

दूरी भी तो कम नहीं है,
क्षितिज पार तक की है,
जिस छोर पर तुम थमी हो,
जिस छोर से मैं तुम तक आना चाहता हूँ,
कुछ क़दम तुम भी इस ओर बढ़ा देती
तो जल्दी मिलते, लेकिन कोई बात नहीं,
तुम मिलन की तैयारी करो,
ह्रदय चलने तक चल सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

अभी तो देख सकता हूँ,
कि नेत्र तीक्ष्ण हैं, सक्षम हैं,
कि पहुँच सकते हैं तुम तक,
लेकिन क्या हो, भविष्य में ये धुंधला जाएं,
अँधेरा लीलने लगे दृष्ट-ज्योति को,
लेकिन तुम इंतज़ार करना,
मेरी हिम्मत और कोशिश यूँ ही रहेगी,
आत्मा भी ठीक यूँ ही रहेगी,
कि इसकी कोई उम्र नहीं, ये अमर है।
इस उम्मीद में कि मंज़िल तुम हो, तुम सुकून भी हो,
कंटीले, पथरीले रास्ते पर नंगे पैर
भाग सकता हूँ मैं,
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

एक ही ड़र है जो सत्य है, सर्वविदित है,
कि क्या हो जब अंग-इन्द्रियां साथ छोड़ दें,
ये देह साथ छोड़ दें,
कि इसकी तो उम्र तय है, ये अमर नहीं।
लेकिन इसी उम्मीद में कि
मेरा जीवन और इसका हर लक्ष्य
तुम्हारे संग ही खड़ा है, उसी ओर है।
अविरल, अविराम, अनथक चलते हुए,
हर बाधा पार कर पहुँच सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

"दूर से देख सकने का सामर्थ्य है मुझमें,
तो इस छोर से देख भी सकता था उम्र भर",
ये मत कह देना तुम कभी।
पहुँच सकता हूँ मैं तुम्हारी आँखों में से उतर,
साँसों में रमते हुए, नब्ज़ में धड़कते हुए,
तुम्हारी रूह तक भी,
यही मिलन सर्वश्रेष्ठ है,
कि यही विधि का विधान है जो तय है।
हर पीड़ा, हर व्यथा को रख किनारे
आगे बढ़ सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

महसूस कर सकता हूँ मैं
तुम्हारे मन की गति और वहाँ की चाह को भी,
जो चाहती है कि मैं समर्थ बनूँ
तुम तक पहुँचने को, तुम संग जीने को।
जब अंग-अंग प्रत्यंग, रूह को जोड़,
मिलन तय करना है हम दोनों को,
तो इस छोर से उस छोर तक की दूरी
तय कर सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।

इस छोर से उस छोर की दूरी
तय कर सकता हूँ मैं।
सुदूर क्षितिज के पार भी
तुम्हें देख सकता हूँ मैं।


यह रचना  संदीप श्याम शर्मा जी द्वारा लिखी गयी है . आप जयपुर से मैनेजमेंट में स्नातक पूर्ण कर मैनेजमेंट में स्नातकोत्तर करने को दिल्ली आये , फाइनेंस और मार्केटिंग में एम. बी. ए. करने के पश्चात् मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने लगे , लेकिन रंगमंच और साहित्य के प्रति अपनी रूचि को ज़्यादा समय तक छिपाकर नहीं रख सके  । रंगकर्म शुरू कर दिया, लगातार कर रहे है . साहित्य की विविध विधाओं में लेखन कार्य में संलग्न हैं .
संपर्क सूत्र -
संदीपश्यामशर्मा जयपुर, राजस्थान संपर्क: 9602424788, मेल: sandeepshyam.sharma@gmail.com

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