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सूखी नदी 


सूखी नदी 
दरारें अनेकों 
खंडहर,
किनारे खड़े पेड़ 
बबूल के 
छोटी छोटी घासें
सूखी नदी
उदास 
उस किनारे झाड़ 
ठेंगा दिखाती
पढ़ मानो तकिया कलाम I 
सुबह 
ओस का एक भी कतरा
न डाली पेड़ पर,
शायद प्यासे रह जाते 
पंछियों के झुण्ड I 
रवि किरकिरा गुस्सा दिखाकर 
डरा,धमकाकर 
खूब हँसी लूटता 
लहराती 
पत्तियों से 
और उन पर 
सजी बैठी 
हवा की
मधुर ध्वनि से I 

यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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