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मान लो! बादल अगर बरसें नहीं

मान लो! बादल अगर बरसें नहीं
नीर जो उनमें भरा है, वो कहाँ ले जाएंगे
क्या करेंगे, इतने सारे नीर का
अपनी कितनी प्यास वे बुझाएंगे
बबिता 'कोकिल'
बबिता 'कोकिल' 
ये नदी, तालाब और सागर सभी
सूख कर इक रास्ता बन जाएंगे
फ़िर कहाँ तैरेंगी सारी कश्तियाँ
और प्राणी जल के भी मर जाएंगे
वृक्षों, पौंधों और सारे फूलों पर
कौन सी कविता कवि कह पाएंगे
पाप को धोएंगे हम जाकर कहाँ
घाट गंगा के नहीं रह जाएंगे
कौनसी शाखा बनेगी झूलना
पी मिलन के स्वप्न भी बह जाएंगे
कैसे खेले खेल बचपन नाव से
गीत गुड़खानी के भी खो जाएंगे
प्यास धरती की बुझेगी फिर कहाँ
जीव सब तृष्णा सहित मर जाएंगे
कल्पना ही मात्र से, है कांप जाता यह ह्रदय
बादलो! अच्छा ही होगा तुम अगर बरसो सदा!
बादलो! अच्छा ही होगा तुम अगर बरसो सदा!

बबिता कोकिल

यह रचना बबिता "कोकिल " जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी अधिकतर रचनाएं पंजाबी भाषा में हैं। पंजाब से प्रकाशित होने वाली पुस्तिका 'वक्त दे बोल' में आपकी  लिखी कविताएं एवम् ग़ज़लें प्रकाशित होती रहती हैं।आपके  कहे गए शेर, 'हिंदवी' नामक उर्दू वेबसाइट पर प्रकाशित होते रहते हैं।इसके इलावा चंडीगढ़ में 'रीडर्स एंड राइटर्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया' एवं 'अभिव्यक्ति' नामक साहित्यिक संस्थाओं से आप  जुडी हुई हैं  तथा इनके द्वारा आयोजित गोष्ठियों में निरन्तर हिस्सा लेती हैं। 'शिरोमणि पंजाबी लिखारी सभा पंजाब (रजिस्टर्ड)' द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह में आपकी ग़ज़लें भी प्रकाशित हो रही हैं।

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