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अपने कदमों में आसमान रखते हैं

जो आँखों में ख्वाब और इरादों में जान रखते हैं,
वो लोग अपने कदमों में आसमान रखते हैं..
आनंद सागर 

जिनको हालात की सख्ती में भी हंसने का हुनर आता है,
वो लोग अपनी ज़द में सारा जहान रखते हैं ..

हमारा मन्दिर और मस्जिद से वास्ता ही नहीं कोई,
एक मां है हम उसी से खुदा का गुमान रखते हैं ..

तुम होठों की चुप्पियों के मतलब लगाना छोड़ दो,
अभी खामोश हैं लेकिन हम भी जुबान रखते हैं ..

इन्सान हैं हम हमको इन्सानों से मुहब्बत है,
हम अपने दिल में दोनों गीता, क़ुरान रखते हैं ..


उसकी अस्मत पे आंच आयी तो हम सर भी कटा देंगे,
हम लहूं के हर कतरे में हिन्दोस्तान रखते हैं ..


तुम छेड़ा ना करो ऐसे हमारे वजूद को लोगों,
हम भी "सागर" हैं खुद में उफान रखते हैं ..

यह रचना आनंद सागर जी द्वारा रचित है . आप राजस्थान में इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं . आप दो पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं  जिनमें "एक आवाज" और "अधूरी तमन्नाएं" प्रमुख हैं . 

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