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आवारा बन फिरता है

इन सुनी-सुनी गलियोँ में,
दिल बंजारा बन फिरता है।
न मंजिल है पता, न डगर है पता,
बस आवारा बन फिरता है।

तेरे दरश की आस में जान-ए-वफ़ा,
मैं शाम तलक़ इंतज़ार करूँ।
तुम न आओगी, जानता हूँ,
फिर भी मैं ऐतवार करूँ।
सब लोग कहें क्यूँ तुम दिनभर,
यूँ मारा-मारा फिरता है।
इन सुनी-सुनी गलियोँ में,
दिल बंजारा बन फिरता है।

तेरी जुल्फ़ के छाँव के साये तले,
मैं सो जाऊँ एक पल के लिए।
तेरी झील सी गहरी आँखों में,
मैं खो जाऊँ एक पल के लिए।
तेरे हुश्न-ओ-इश्क़ की चाहत में,
मन बेचारा बन फिरता है।
इन सुनी-सुनी गलियोँ में,
दिल बंजारा बन फिरता है।

मेरे नींद तेरे, मेरे चैन तेरे,
मेरे दिवस तेरे, मेरे रैन तेरे।
आ जाओ जरा इठलाती हुई,
इक झलक को प्यासे नैन मेरे।
इक तेरे प्यार की खातिर दिल,
नाकारा बन फिरता है।
इन सुनी-सुनी गलियोँ में,
दिल बंजारा बन फिरता है।
न मंजिल है पता, न डगर है पता,
बस आवारा बन फिरता है।


यह रचना अजीत कुमार शर्मा जी द्वारा लिखी गयी है . आप वर्तमान में  इंदौर में भारतीय डाक विभाग के कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं। आप साहित्य लेखन में गहरी रूचि रखते हैं . 

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