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कभी कभी सोचता हूँ

(1)

कभी कभी सोचता हूँ
.........................

कभी कभी
सोंचता हूँ
हम लोग
जलते हुये
जी लेते हैं

एक सुंदर जिन्दगी
जयचन्द प्रजापति

जहाँ हम
एक अधूरी जिन्दगी
फासलों में
जी लेते है

इस मासूम
जिन्दगी का मतलब
भर दो कोमल भावों से
भर लो कोमल
हाथों से
मत रोने दो
हर घड़ी
रंगीन बनो दो
उस मुसमुसाती जिन्दगी को

कभी कभी
ख्याल आता है
कितना गुस्से में
यह जीवन
नहीं तौलती
मासूम भावों को
उठा लेती है
कठोर खंजर
कर देती है
रिश्तों को खत्म
कभी कभी
सोंचता हूँ

(2)

आओ प्रेम करें
.................

आओ प्रेम करे
कुछ ढूँढे
पल हँसी के
मुश्कान विखेरे
उनके घर
जहाँ मुश्किल से
जलते चूल्हे

जिनके घर
लाचारी है
जो ठहरे हैं
समय ने
जिनको पंख
न दे सका
जिनके ख्वाब
डेहरी पर
ताक रहें हैं
नये सूरज की लाली के लिये

कर सकते हैं
कुछ उनके लिये
भर सकते हैं
जान
उनके हौंसलों में
रफ्तार दे सकते हैं

प्रेम करों
मेरे साथियों
इन ख्वाहिशों के साथ
दो जीने का रंग
कुछ पल ही सहीं
भर दो नई किरणों से
नई आशाओं से
प्रेम का दीपक
जला दो
उन घरों में


यह रचना जयचंद प्रजापति कक्कू जी द्वारा लिखी गयी है . आप कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं . संपर्क सूत्र - कवि जयचन्द प्रजापति 'कक्कू' जैतापुर,हंडिया,इलाहाबाद ,मो.07880438226

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