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गरीबी

गरीबी
एक जीवन का
अवसाद है
जिस घर पनपती है
वहाँ विवशता
गरीबी
गरीबी
सिसकती जिन्दगी
बन जाती है

निराशा
अवसाद
कई समस्याओं से
जुझती जिन्दगी
आने वाली पीढ़ी
बदहवास
भरी हो जाती है

आशायें
खत्म नजर आती है
नून तेल में
गाड़ी अटक सी जाती है
गरीबी में
यह तन सूख जाता है

होंठों की पपड़ी
यह बताती है
हम टूट चुके हैं
जीवन का बोझ
ढोते ढोते
उदास प्रहरी की तरह
गेट पर जिन्दगी
खड़ी नजर आती आती है

(2)

यह फासला

..............
यह फासला
जिन्दगी में
क्यों?
बहुत उदास करता है
हमारे हृदय को

क्यों लोग
कठोरता से जीते हैं
नासमझी
जयचन्द प्रजापति
जयचन्द प्रजापति
दूर कर देती है
अपनों से
खत्म करो
इन मुटावों को

बहकते कदम को
नव रूप दो
मेरे हँसी दोश्तों
लिखो
नये समय की गाथा
जीवन के सफर में

कह दो
हम रचना चाहते हैं
नई पीढ़ी
नव युग के
नव भावों को
नये उजालों की तरह
सतरंगी चालों में
नयापन
यह फासला
खत्म करना चाहता हूँ.


यह रचना जयचंद प्रजापति कक्कू जी द्वारा लिखी गयी है . आप कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं . संपर्क सूत्र - कवि जयचन्द प्रजापति 'कक्कू' जैतापुर,हंडिया,इलाहाबाद ,मो.07880438226 . ब्लॉग..kavitapraja.blogspot.com

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