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मन की आखों की सब पट्टियां खोलिये

           
मेरी यादों की वो खिड़कियां खोलिये
कुछ पुरानी पड़ी चिट्ठियां खोलिये
हाथ अपना बढ़ाना हो मेरी तरफ
बंद हाथों की सब मुट्ठियां खोलिये
घूप इतनी कड़ी कैंसे चल पाउंगा
पास अपने हैं जो छतरियां खोलिये
वेणी  शंकर पटेल 
पेट की आग ये फिर बुझेगी तभी
बाॅधकर जो रखी रोटियां खोलिये
आसमां से भी आगे है जाना जिन्हे
उन पतंगों की सब डोरियां खोलिये
सच पे परदा यदि दिख रहा है कही
                                     

2- मैं तुम्हे अच्छी तरह पहचानता हूॅ

वक्त के साथ चलना जानता हूॅ
जिंदगी है एक दरिया मानता हूॅ
मुफ्लिशी में हो रहा एैसे गुजारा
मोड़कर पैरो को चादर तानता हूॅ
गैरों के घर पे फेंकते हैं जो पत्थर
राज भी उनके घरों के जानता हूॅ
किसी मोड़ पर छुड़ा लोगे दामन
मैं तुम्हे अच्छी तरह पहचानता हूॅ
चाॅद तारे तोड़ने की क्यंू बात करते
बाजुओं में दम है कितना जानता हूॅ
                                         

3.जिस्म के कतरे तरक विखर जायेंगे

 जिस्म के कतरे तरक विखर जायेंगे
छोड़कर शाख को हम किधर जायेंगे
मुरझाकर  कली सा  विखर जायेंगे
जंग छेड़ी तुम्ही ने ये बारूद की
जिस्म के कतरे कतरे विखर जायेंगे
गिद्ध भूखे बहुत उड़ रहे आसमां में
लाश देखी यहा कि उतर जायेंगे
है तन पर सफेदी मगर काम काले
आग उगलेंगे ये ही जिधर जायेंगे
हैं दर दर भटकते देश के नवजवां
टांगे डिग्री गलें में किधर जायेंगे
       

 यह रचना  वेणी  शंकर पटेल  ‘ब्रज’ जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं . आपकी कविता संग्रह ‘‘खत लिखना तुम’’ 2015,1986 से लगातार समाचार पत्र नव भारत ,दैनिक भास्कर,देषबंधु,राज एक्सप्रेस,स्वतंत्र मत,जबलपुर एक्सप्रेस एवं कादम्बिनी  पत्रिका में कविताओं का प्रकाषन  प्रकाषनाधीन हैं
प्रसारण - आकाषवाणी के जबलपुर केंद्र से 1996 से युववाणी,कलामे षायर एवं काव्य रस में कविताओं एवं
गजलों का प्रसारण हो चुका है .                               

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