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एक बार फिर

एक बार फिर उमड़ रहा है वात्सल्य
अजन्मा के प्रति
जिसे देखा तक नहीं
पहले भी कई बार
गर्भ ने आकार लिया है
बिना देखे ही उससे
घंटों बातें की है मैंने
वात्सल्य
हाथ-पांव हिलाते हुए
किलकारियां भरते हुए
अपनी ही रचना को
साक्षात देखने का स्वप्न किंतु,
अभी भी अधूरा है
हर बार ही विवश कर दी जाती हूं
अपने सामने ही
अपने सृजन को मिटते
देखती रह जाती हूं
हर बार ही
शोक मिटने से पहले ही
थोप दी जाती है
एक नई कोख
पुत्र जन्म की खुशियां
फिर से मननी शुरू हो जाती हैं
एक बार फिर से
उमर आता है वात्सल्य
अजन्मा के प्रति
जिसे देखा तक नहीं।
- तरु श्रीवास्तव


परिचय : वास्तविक नाम आरती श्रीवास्तव, तरू श्रीवास्तव के नाम से कविता, कहानी, व्यंग्य लेखन।
शैक्षणिक योग्यता : जंतु विज्ञान में एमएससी, बीजेएमसी, कथक और हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन में प्रभाकर।
कार्यानुभव :
पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2000 से कार्यरत। हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हरिभूमि, कादिम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में बतौर स्वतंत्र पत्रकार विभिन्न विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। हरिभूमि में एक कविता प्रकाशित।
दैनिक भास्कर की पत्रिका भास्कर लक्ष्य में 5 वर्षों से अधिक समय तक बतौर एडिटोरियल एसोसिएट कार्य किया। तत्पश्चात हरिभूमि में दो से अधिक वर्षों तक उपसंपादक के पद पर कार्य किया। वर्तमान में एक प्रोडक्शन हाऊस में कार्यरत।
आकाशवाणी के विज्ञान प्रभाग के लिए कई बार विज्ञान समाचार का वाचन यानी साइंस न्यूज रीडिंग किया।

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