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अनुभव ( भाग २ ) 

मैंने सोचा बहुत सोचा आखिर फैसला ये लिया कि मुझे भी अपनी प्रशंसा करना सीखना होगा | किन्तु किसी भी आदत को आप यूँ ही नहीं अपना सकते इसके लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है | मुझे इस आदत को अपने में शामिल करना बहुत कठिन लगा लेकिन मैं कोशिश करने लगी | आदत न होने के कारण जब कभी मैं ऐसा कृत्य करती अन्दर से मैं खुश न हो पाती और ये भाव मेरे चेहरे पर आ जाते मेरी जबान मेरा साथ न देती | ये स्थिति मेरे लिए और दुष्कर हो जाती | चारों ओर से लोग मेरी खिल्ली उड़ाने लगे | वे समूह मेरे सामने ही मेरी नक़ल करते मैं कुछ न कर पाती | खैर मैंने स्वयं को पहले की भांति कर लिया | लेकिन बीच-बीच में कुछ सहकर्मियों के साथ मुझे काम दिया जाता था | वे मेरे सहकर्मी काम तो मुझसे करवाते थे किन्तु उसका जिक्र नहीं करते थे और यही कारण था कि मेरी छवि और भी धूमिल होती जा रही थी और तरक्की तो नहीं के बराबर | कई बार मैं सोचती थी कि "बॉस" को मेरी मेहनत दिखाई नहीं देती | क्या वो भी सिर्फ़ अपनी तारीफ का भूखा,जो उसकी चापलूसी करता वो अच्छा और जिसमे चापलूसी का गुण न हो उसकी कोई कद्र या तरक्की नहीं |
   
जयश्री
जयश्री
जब मैं कोई कविता,कहानी या कोई सुविचार सुनती या पढ़ती जहाँ ये कह जाता है कि "लगन व् परिश्रम करने पर आपकी तरक्की निश्चित होगी "| मैं यहाँ इस बात को बदलना चाहूंगी कि "यदि आप चापलूसी कर सकते हो तो आप तरक्की पर तरक्की करते चले जाओगे |" ये मेरा अनुभव है कि बहुत कम भाग्यशाली होते है जिसे अपनी मेहनत का फल मिलता है | यदि आप झूठ नहीं बोल सकते,आप में दया है, दूसरों के दुःख से आप दुखी हो जाते हो तो ............ भगवान ही आपका रखवाला होगा क्योंकि आज के जमाने में यदि ये नैतिक गुण है तो आप का इस दुनिया में भावनात्मक शोषण होता रहेगा और आप अकेलेपान के शिकार हो जाओगे | आज की माँग है व्यवहारिक ज्ञान | इस ज्ञान से आप तरक्की प्राप्त कर सकते हो,आपके सामाजिक संबंध बढ़ते है भले ही झूठे हो किन्तु कार्यालयों में कार्य करते हुए आपको इस ज्ञान की आवश्यकता होती है |
   मैंने इस बार पक्का निर्णय ले लिया | मै अब अपने आपको और धोखा नहीं दूंगी | मैंने घर के बढे हुए खर्चों  का अवलोकन किया | बाहर जानकारी ली| यहाँ पर मैं काफी शालीन से कार्य कर रही थी इसलिए वेतन यहाँ का हर साल की बढ़ोतरी से थोडा-थोडा कर बढ़ गया था | इतना वेतन मुझे बाहर नहीं मिल रहा था | लेकिन निर्णय तो लेना था,पैसा या मन की शान्ति | मैंने शांति चुनना पसंद किया | मैंने अपने कार्यालय की शर्तों के मुताबिक मेरा काम व  समय को ध्यान में रखकर त्यागपत्र दे दिया और अपने लिए एक स्वस्थ वातावरण वाला कार्य खोजने लगी |



यह रचना जयश्री जाजू जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं . आप कहानियाँ व कविताएँ आदि लिखती हैं . 

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