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आओ साहित्यकार बनें 

 साहित्यकारिता करना बहुत सरल है लेकिन ठीक ढंग से साहित्य तभी लिखा जा सकता है जब अच्छे शब्दों की रूप रेखा हो और विचारों में नवीनता हो और सादगी भरा हो भावों में, साहित्यकारिता चरम स्थान प्राप्त कर लेता है.साहित्यकार बनने का हृदय मसोस रहा है तो साहित्यकार हो गये.हृदय की विह्वलता साहित्यकारिता में आग में घी डालने जैसा है और एक ऐसा साहित्य उभरता है जो रंग चोखा कर देता है और वहाँ पर एक महान साहित्य
साहित्य लेखन
साहित्य लेखन 
चित्रण होने लगता है. तब एक ऐसी धारा फूटती है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है.
साहित्य का रस सब में नहीं फूट सकता है.इसके लिये बड़ी रगड़ करनी पड़ती है वह रगड़ जो एक महान तपस्या से कम नहीं है.मेहनत से उपजा साहित्य एक विशाल हृदय व महान संवेदना को लेकर चलती है.यह अपने आप में एक अनोखा रहस्य है.

      साहित्य का शुरूआती दौर कठिनाइयों से लबालब होता है जहाँ इस तरह का दर्द पनपता है,वह साहित्य मजा हुआ होता है वहाँ का साहित्य करूणा का भाव लिये हुये एक नई दिशा की ओर बढ़ते हुये अग्रसित होता है.गरीबो,मजलूमों,असहायों के प्रति उदार भावना एक
परिश्रमी साहित्यकार का गुण बढ़ानें में सहायक सिध्द होता है.करूणा का नुकसान साहित्य के लिये घातक है.करूणा के हानि से सही एवं न्यायप्रिय रचना की कल्पना करना दिन में सपने देखना जैसे है.साहित्य लिखने की फिराक में रहने वाला करूणा का संगम बहानें में सदैव तत्पर रहता है.यह उसका उदार चरित्र का द्योतक माना जाता है.वह एक कारगर कविता लिख सकता है.वह संवेदना के भावों को सही रूप प्रदान कर सकता है.सच्चा साहित्य सर्वगुण संपन्न  रचनाकार ही उपजाता है.वह हर परिस्थिति में डटा रहता है.भागना उसके जीवन का स्वभाव नहीं होता है.वह साहित्य के लिये तमाम समस्याओं को गले लगाता है तब वह साहित्यकारिता के पेशे को नई कीर्ति प्रदान करता है और अनवरत आगे की ओर साहित्य थाम कर मजबूती से खड़ा रहता है.

       साहित्यकारिता का पेशा हम समझते है कि यह एक असाध्य रोग है जिसको यह रोग लगता है वह उसका पीछा नहीं छोड़ता है बल्कि घुन की तरह साहित्य के अंदर तक प्रवेश कर जाता है और उसके अन्दर के सारे तत्वों को खाता है और खूब हृदय कीभावना में साहित्य का असली दर्शन करता है.ऐसे ही लोग साहित्य की भाषा,विचार,संवेदना,दया,करूणा को वास्तविक ऊँचाइयाँ को प्रदान
करते हैं.कवि बनने के लिये सारे रसों मे डुबकी लगाना चाहिये.श्रृंगार की प्रधानता होनी चाहिये,विरह की तपिश में जलना चाहिये.दर्द को आगोश में ही कल्पना करके जीना चाहिये.

   
जयचन्द प्रजापति 'कक्कू जी"
जयचन्द प्रजापति 'कक्कू जी"
 साहित्यकारिता कहीं भी जन्म ले सकती है.गरीबों के घर में भी और अमीरों के घर भी.इसके लिये पवित्र आत्मा का होना चाहिये.पवित्र आत्मा के अभाव में शुध्द साहित्य लेखन नहीं किया जा सकता है.जब महान आत्मा की प्रविष्टि होती है तो समझो कवि के गुण आ गये तब सच्ची आह निकलने लगती है.सच्चे आह से कवि में निखार आ सकता है और वियोग की विशेष अनुकम्पा रहती है.यह सोने में सुहागा की तरह है.वहाँ साहित्यकारिता में निखार आ जाता है.आजकल का साहित्यकार दूर नहीं जाता है.घर में बैठ कर भावों व विचारों को नया रंग देने में जुटा रहता है.ऐसा साहित्यकार अधपका होता है.गिरने का डर बना रहता है.उसका अस्तित्व न के बराबर है.वह साहित्य में कचरा की तरह है जिसका मोल कचरे बराबर है.वह साहित्य को पतन कीओर ले चलता है.नर्क के गर्त में ले जाता है.

      हम सभी साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि साहित्य में जो गंदगी है उसको हटाना है.साहित्यकारिता की परम्परा को और परपक्व बनाना है.सत्तू  लपेट्टू से काम नहीं बनेगा.जहाँ का साहित्यकार कमजोर है वहाँ की संस्कृति व सभ्यता का स्तर निम्नकोटि का हो जाता है.विकास की रफ्तार कमजोर हो जाती है.समाज में असहिष्णुता का उद्भव होने लगता है.फूहड़पन का बढ़ावा मिलने लगता है. साहित्यकारिता का पेशा ईमानदार प्रवृत्ति से किया गया रचना साहित्य का बाहुबल है.




यह रचना जयचंद प्रजापति कक्कू जी द्वारा लिखी गयी है . आप कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं . संपर्क सूत्र - कवि जयचन्द प्रजापति 'कक्कू' जैतापुर,हंडिया,इलाहाबाद ,मो.07880438226 . ब्लॉग..kavitapraja.blogspot.com

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