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तेरी महफ़िल में तो बेताब बहुत थे

आए तेरी महफ़िल में तो बेताब बहुत थे
जो अहले-वफ़ा वाकिफ़े-आदाब बहुत थे

अहमद फ़राज़
इस शहरे – मोहब्बत में अजब काल पड़ा है
हम जैसे सुबुक लोग भी नायाब बहुत थे

कुछ दिल ही ना माना कि सबुक–सर हों वरना
आसूदगी –ए जाँ के तो असबाब बहुत थे

मजबूर थे ले आये किनारे पे सफीना
दरिया जो मिले हमको वो पायाब बहुत थे

अब देख ये हसरत भरी उजड़ी हुई आँखें
दुनिया तेरे बारे में मेरे ख्व़ाब बहुत थे

मैं क्यों ना ‘फ़राज़’ उनकी तरह मुहर-ब–लब था
इस बात से नाखुश मेरे अहबाब बहुत थे

यह रचना अहमद फ़राज़(१९३१-२००८) जी द्वारा लिखी गयी है . आप आधुनिक उर्दू के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में गिने जाते हैं। आपकी प्रकाशित रचनाओं में खानाबदोश, ज़िंदगी! ऐ ज़िंदगी और दर्द आशोब (ग़ज़ल संग्रह) और ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में (ग़ज़ल और नज़्म संग्रह) आदि हैं . 

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