3
Advertisement

                                      वो लड़की (भाग २ )

वह मेरे घर के सामने मि. मेहता के घर में रहती है | वह एक गाँव की लड़की है और मेहता के घर में में आ गई | मेहता के दूर के रिश्तेदार की यह लड़की मेहता के फैशन परस्त संयुक्त परिवार से मेल नहीं खा प् रही थी | जब भी मैंने उसे देखा अकेले देखा | मेहता के घर में उसकी उम्र के बहुत से बच्चे थे किन्तु इस लड़की के जोड़ का कोई न था या वे बच्चे इसे अपने जोड़ का न समझ पाते थे | 
           
 शीतल के बारे में मैं इतना तो जन चुकी थी कि मेहता के घर वह सिर्फ काम करने के लिए ही थी,बाकि उस परिवार को शीतल से कोई सरोकार न था | अब अक्सर वह मेरे पास आ जाती अपने खाली समय में | जब मेहता के घर में सारे लोग दोपहर को आराम कर रहे होते | मैंने उसे धीरे -धीरे पढ़ाना शुरू किया | वह मुझसे बहुत खुल चुकी थी | उसने अपनी आप बीती सुनाई |
               वह भी अपने गाँव में अपने माता-पिता के साथ खुश थी | भले ही बहुत पैसा न था किन्तु खुश थे | अचानक गाँव में आई बाढ़ ने उसके जीवन को तबाह कर दिया | उस बाढ़ में शीतल के माता-पिता का बह जाना और न मिलना शीतल के लिए बड़े कष्टकारी पल थे | बचे हुए गाँव वालों ने इस लड़की को मेहता के घर पहुंचा दिया | मेहता ने भी सहर्ष उसे रख लिया | इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं ली ,बस घर का काम कर देगी बदले में दो समय का खाना | वैसे भी परिवार बड़ा है,एक आदमी का खाना बचना कोई बड़ी बात नहीं है | 
            मिउझे मेहता जैसे सुलझे इंसान पर गुस्सा आ रहा था | उसने इस छोटी लड़की को सिर्फ अपने घर के काम के लिए रखा है | लेकिन किसी के परिवार में दखल मेरी आदत नहीं थी | इसके बावजूद मैं शीतल के लिए कुछ करना चाहती थी | वह तो अपने नाम के अनुरूप सभी पर शीतल छाया बरसा रही थी,लेकिन उसे क्या मिल रहा था | बचपन में ही प्रौढ़ता | मई अपने अंतर्द्वंद से लड़ रही थी | मुझे निर्णय करना था | 
              आज मैंने फैसला ले लिया | मई मेहता के घर पहुंची | मैंने मेहता से शीतल को गोद लेने के बारे में बात की | हाँ मैंने अपना अकेलापन शीतल के साथ बांटने का फैसला कर लिया | मेहता ने पहले तो न नुकर की किन्तु मेरे दबाव डालने से और मिडिया में मेरी पहचान होने से अंततः मान ही गए | आज मैं और शीतल | मैंने अपनी ही स्कूल में उसका दाखिला करा दिया | मैं भी उसके साथ अपने बचपन को दोबारा जी रही हूँ |
    जब भी  उसे देखती हूँ तो मेरे मन में ये विचार उमड़ता है :-- 
               गुमसुम चुपचुप थी वो लड़की,
                     चहल नहीं पहल नहीं 
                                      खामोश सी वो लड़की |
                  साज नहीं शृंगार नहीं ,
                                     सादगी की मूरत वो लड़की |
                  छल नहीं कपट नहीं,
                                     निष्कपट सी वो लड़की |
                   प्यार मुहब्बत और अपनी सी, 
                                               लगाती वो लड़की |



समाप्त 



यह रचना जयश्री जाजू जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं . आप कहानियाँ व कविताएँ आदि लिखती हैं . 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top